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“मानसिक उपनिवेश का घाव”

“मानसिक उपनिवेश का घाव”

✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
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. अंग्रेज़ गए, पर छोड़ गए
दिलो-दिमाग का रिसता घाव,
हमने तिथि को त्याग दिया
पकड़ लिया खाली भाव।


आ गया नशे की रात लिए
डिस्को में डगमग चाल,
मिट गया ब्रह्ममुहूर्त संग
सनातन संस्कृति बेमिसाल।


मध्यरात्रि को संस्कृति कहें
भोर का भजन बेकार,
जो जागे सूरज से पहले
वह ठहरा नीरा बुद्धू यार।


उत्तर-दक्षिण में उलझ गए
जात-पात धर्म का विवाद,
शैव-वैष्णव में बँट गया
सनातन का सत्य-प्रसाद।


वेद-पुराण को कौन पढ़े
संस्कृत किसके पास?
पवित्र नदियों में डुबकी ले
कहां किसमें श्रद्धा-विश्वास?


सबसे सस्ता एक ही मिला
शराब से भरा प्याला,
सबसे महँगा खो दिया
प्रखर बुद्धि का उजियाला।


अहम से मत बाँधो इसे
मत रखो पश्चिम की शान,
जीवन में अब तो उतारो,
सनातन का शाश्वत ज्ञान।
मौलिक रचना
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