रथ सप्तमी: ब्रह्मांड के 'महाप्राण' भगवान सूर्य का जन्मोत्सव
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय संस्कृति में सूर्य केवल एक तारा नहीं, बल्कि साक्षात 'नारायण' हैं। वे काल के नियामक हैं, वेदों के चक्षु हैं और संपूर्ण चराचर जगत के ऊर्जा पुंज हैं। माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि, जिसे हम 'रथ सप्तमी' या 'सूर्य जयंती' के रूप में मनाते हैं, भारतीय पंचांग का वह स्वर्णिम दिन है जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है। वर्ष 2026 में यह पर्व एक नए उत्साह के साथ मनाया जा रहा है, क्योंकि हाल के वर्षों में 'सौर ऊर्जा' और 'प्राकृतिक चिकित्सा' के प्रति वैश्विक चेतना में भारी वृद्धि हुई है।
आदिदेव भगवान सूर्य का प्राकट्य: जब प्रकाश ने जन्म लिया है। 'मत्स्य पुराण' और 'भविष्य पुराण' के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में जब चारों ओर शून्य और अंधकार था, तब महर्षि कश्यप और अदिति के संयोग से भगवान मार्तंड (सूर्य) का प्राकट्य हुआ। रथ सप्तमी वही पावन तिथि है जब सूर्य देव ने अपने स्वर्णिम रथ पर सवार होकर ब्रह्मांड की पहली किरण बिखेरी थी। उनका रथ केवल एक वाहन नहीं, बल्कि समय का एक वैज्ञानिक स्वरूप है। इस रथ में केवल एक पहिया है, जो एक संवत्सर (वर्ष) का प्रतीक है। इसमें सात घोड़े जुते हुए हैं, जो न केवल सप्ताह के सात दिनों को दर्शाते हैं, बल्कि श्वेत प्रकाश के भीतर छिपे सात रंगों (बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल) का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। इस रथ के सारथी 'अरुण' हैं, जो स्वयं प्रकाश के अग्रदूत हैं।
सतयुग से कलियुग तक की विरासत रथ सप्तमी का इतिहास मानव सभ्यता के चारों युगों की गवाही देता है। सतयुग में यह पर्व शुद्ध चेतना का उत्सव था। उस काल के ऋषि-मुनि अपनी आंतरिक कुंडलिनी शक्ति को सूर्य की किरणों से जाग्रत करते थे। त्रेतायुग में सूर्य पूजा 'शक्ति' का प्रतीक बनी। भगवान श्री राम, जो स्वयं सूर्यवंशी थे, उन्होंने रावण पर विजय पाने के लिए इसी शक्ति की उपासना की थी। अगस्त्य मुनि द्वारा उन्हें दिया गया 'आदित्य हृदय स्तोत्र' आज भी सूर्य उपासना का सबसे शक्तिशाली मंत्र माना जाता है। द्वापरयुग में यह पर्व 'करुणा और उपचार' से जुड़ा। जब भगवान कृष्ण के पुत्र सांब को दुर्वासा ऋषि के शाप से कुष्ठ रोग हुआ, तब उन्होंने इसी सप्तमी तिथि पर सूर्य देव की आराधना कर काया-कल्प प्राप्त किया।
कलियुग में, जहाँ समय का अभाव है, रथ सप्तमी 'श्रद्धा और दान' का महापर्व बन गया है। आज यह पर्व हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने की याद दिलाता है। रथ सप्तमी को 'आरोग्य सप्तमी' भी कहा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, “आरोग्यं भास्करादिच्छेत्” अर्थात् आरोग्य की इच्छा सूर्य से करनी चाहिए। आधुनिक विज्ञान भी अब यह मान चुका है कि सूर्य की किरणें केवल विटामिन-डी का स्रोत नहीं हैं, बल्कि वे हमारे मानसिक स्वास्थ्य (सेरोटोनिन का स्तर) और हार्मोनल संतुलन के लिए भी अनिवार्य हैं। सूर्योदय के समय स्नान करने का विशेष विधान है। मान्यता है कि सात 'एरुक्कई' (मदार या आक) के पत्तों को सिर और कंधों पर रखकर स्नान करने से शरीर की नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकल जाती है और त्वचा रोगों में लाभ मिलता है। यह प्रक्रिया एक तरह की 'थर्मल हीलिंग' और 'क्रोमोथेरेपी' का प्राचीन भारतीय स्वरूप है।
आंध्र प्रदेश अरसावल्ली का राजकीय उत्सव में रथ सप्तमी का सांस्कृतिक गौरव दक्षिण भारत में और अधिक बढ़ा है। आंध्र प्रदेश सरकार ने दिसंबर 2024 में रथ सप्तमी को आधिकारिक तौर पर 'राज्य त्योहार' घोषित किया। श्रीकाकुलम जिले में स्थित अरसावल्ली सूर्य देव मंदिर इस दिन श्रद्धा का केंद्र बन जाता है। यहाँ सूर्य की पहली किरण सीधे गर्भगृह में स्थित प्रतिमा के चरणों को स्पर्श करती है, जो प्राचीन भारतीय वास्तुकला और खगोल विज्ञान का एक अद्भुत उदाहरण है। तीन दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं, जो यह दर्शाता है कि आधुनिक भारत आज भी अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
रथ सप्तमी केवल धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि ऋतु चक्र का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस समय सूर्य 'उत्तरायण' की अपनी यात्रा में उत्तर-पूर्व की ओर अग्रसर होते हैं। यह वसंत के आगमन का उद्घोष है। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक, किसान इसे नई फसल की तैयारी और समृद्धि के त्योहार के रूप में मनाते हैं। कई राज्यों में आँगन में रथ की रंगोली बनाई जाती है और मिट्टी के पात्र में दूध उबाला जाता है, जिसे सूर्य की किरणों के नीचे 'प्रसाद' के रूप में तैयार किया जाता है। कलियुग में उपासना की आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में रथ सप्तमी की पूजा सरल लेकिन अत्यंत प्रभावशाली है। तांबे के पात्र में जल, लाल चंदन, गुड़ और अक्षत मिलाकर सूर्य को अर्पित करना हृदय रोग और नेत्र ज्योति के लिए श्रेष्ठ माना गया है। मंत्र शक्ति: 'ॐ सूर्याय नमः' या 'ॐ घृणि सूर्याय नमः' का जाप मानसिक एकाग्रता बढ़ाता है। गुड़, गेहूं, तांबा और लाल वस्त्र का दान दरिद्रता का नाश करने वाला माना गया है ।
आज जब दुनिया ऊर्जा संकट और मानसिक तनाव से जूझ रही है, तब 'रथ सप्तमी' जैसा पर्व हमें समाधान की ओर ले जाता है। यह हमें सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य बिना रुके, बिना थके संपूर्ण विश्व को जीवन प्रदान करता है, उसी प्रकार हमें भी निष्काम कर्म करना चाहिए। रथ सप्तमी का यह महापर्व हमें अपनी जड़ों, अपने स्वास्थ्य और अपने पर्यावरण के प्रति सचेत होने का आह्वान करता है। यह केवल एक कैलेंडर की तिथि नहीं, बल्कि स्वयं को ऊर्जावान बनाने का एक 'रिचार्ज डे' है। आइए, इस रथ सप्तमी पर हम अपने भीतर के अज्ञान को मिटाकर ज्ञान के सूर्य को प्रतिष्ठित करें। रथ सप्तमी का मुख्य केंद्र: अरसावल्ली (आंध्र प्रदेश), कोणार्क (ओडिशा), मोढेरा (गुजरात) , देव , गया , पंडारक , बलिगांव , बेलाउर ( बिहार ) झारखण्ड , आदि राज्य है।
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