"संबंधों की शाश्वत धुरी: भावना"
पंकज शर्मा
मानवीय संबंधों की प्रगाढ़ता भौतिक गणित या भविष्य की 'संभावनाओं' में नहीं, अपितु हृदय की पावन 'भावना' में निहित है। जब हम किसी रिश्ते को लाभ-हानि की दृष्टि से परखते हैं, तो उसकी आध्यात्मिक सुवास लुप्त हो जाती है। सच्चे संबंध उस अक्षय वट के समान हैं, जो केवल निस्वार्थ अनुराग के जल से सिंचित होकर युगों तक पल्लवित होते हैं। जहाँ स्वार्थ का लेशमात्र भी प्रवेश होता है, वहाँ आत्मा का सौंदर्य संकुचित हो जाता है।
दार्शनिक दृष्टिकोण से देखें तो तर्क और बुद्धि केवल संसार चला सकते हैं, किंतु हृदय केवल संवेदनशीलता से जुड़ता है। आत्मीयता के रेशमी धागे अत्यंत कोमल होते हैं; यदि उन्हें तर्क की तीक्ष्ण कसौटी पर कसा जाए, तो वे बिखर जाते हैं। अत: जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम तार्किक गणनाओं को त्यागकर आत्मीय बोध को अपनाएं, ताकि संबंधों में शाश्वत शांति और गरिमा बनी रहे।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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