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औरंगाबाद स्थापना दिवस विशेष

औरंगाबाद स्थापना दिवस विशेष

सत्येन्द्र कुमार पाठक
औरंगाबाद। बिहार के दक्षिण-पश्चिम छोर पर स्थित औरंगाबाद जिला आज अपना स्थापना दिवस मना रहा है। 26 जनवरी 1973 को गया जिले से अलग होकर एक स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई के रूप में अस्तित्व में आया यह जिला, आज अपनी ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक औद्योगिक प्रगति के अनूठे संगम के रूप में नई पहचान बना चुका है। मगध की गौरवशाली धरती और 'बिहार का चित्तौड़गढ़' कहे जाने वाले इस जिले ने पिछले पाँच दशकों में कृषि, ऊर्जा और पर्यटन के क्षेत्र में जो मुकाम हासिल किया है, वह पूरे प्रदेश के लिए एक मिसाल है।
औरंगाबाद का इतिहास प्राचीन मगध महाजनपद से जुड़ा है। मध्यकाल में शेरशाह सूरी के शासन के दौरान यह क्षेत्र 'रोहतास सरकार' का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करता था। लेकिन इस जिले की सबसे विशिष्ट पहचान इसकी 'राजपूत संस्कृति' से है। सूर्यवंशी वंश की प्रधानता और यहाँ के लोगों के अदम्य साहस के कारण इसे "बिहार का चित्तौड़गढ़" कहा जाता है। 1952 के पहले आम चुनाव से लेकर आज तक, यहाँ की राजनीतिक और सामाजिक चेतना ने राज्य की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाई है। भौगोलिक और प्रशासनिक स्वरूप में 3,389 वर्ग किलोमीटर में फैला यह जिला प्राकृतिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध है। इसके पश्चिम में सोन नदी एक प्राकृतिक सीमा बनाती है, जो यहाँ की कृषि व्यवस्था की जीवन रेखा है। प्रशासनिक दृष्टिकोण से जिला दो अनुमंडलों—औरंगाबाद सदर और दाउदनगर—तथा 11 प्रखंडों में विभाजित है। सामरिक रूप से यह जिला ग्रैंड ट्रंक रोड (NH-2/19) पर स्थित होने के कारण दिल्ली और कोलकाता जैसे महानगरों से सीधा जुड़ा हुआ है, जो इसके व्यापारिक विकास का मुख्य आधार है।
परंपरागत रूप से औरंगाबाद एक कृषि प्रधान जिला रहा है जहाँ धान और गेहूँ की प्रचुर पैदावार होती है। हालांकि, हाल के वर्षों में यहाँ के किसानों ने नवाचार की मिसाल पेश की है। आज औरंगाबाद अपनी 'स्ट्रॉबेरी' की खेती के लिए पूरे बिहार में चर्चा का विषय बना हुआ है। आधुनिक तकनीक और ड्रिप सिंचाई के माध्यम से यहाँ के किसान अपनी आय में रिकॉर्ड वृद्धि कर रहे हैं, जिससे जिला कृषि-उद्यमिता का केंद्र बन गया । औरंगाबाद की प्रगति की चर्चा तब तक अधूरी है जब तक 'नवीनगर सुपर थर्मल पावर प्लांट' का जिक्र न हो। 4380 मेगावाट की विशाल क्षमता के साथ यह संयंत्र न केवल बिहार बल्कि पूरे भारत के प्रमुख बिजली केंद्रों में से एक है। इस पावर हब ने जिले को एक औद्योगिक पहचान दी है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर सृजित किए हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट में तेजी से विकसित हो रहे जिलों में औरंगाबाद का चौथा स्थान हासिल करना, इसकी बदलती तस्वीर का सबसे बड़ा प्रमाण है।
औरंगाबाद इतिहास की राख से आधुनिकता का सूरज उगता है। बिहार के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में एक जिला ऐसा भी है, जिसे 'बिहार का चित्तौड़गढ़' कहा जाता है। मेरी यात्रा की शुरुआत इसी जिज्ञासा के साथ हुई कि आखिर मगध की इस गोद में ऐसा क्या है जो इसे राजस्थान के उस वीर भूमि की संज्ञा दिलाता है। औरंगाबाद की यह यात्रा केवल भौगोलिक भ्रमण नहीं, बल्कि समय के कई कालखंडों—पौराणिक, मध्यकालीन और आधुनिक—में एक साथ जीने जैसा अनुभव रहा है।
मेरी यात्रा का पहला पड़ाव था 'देव'। सुबह की पहली किरण जब देव सूर्य मंदिर के गुंबद पर पड़ी, तो स्वर्ण जैसा आभास हुआ। यह मंदिर स्थापत्य का एक रहस्यमयी चमत्कार है। जहाँ भारत के अधिकांश मंदिर पूर्वमुखी होते हैं, वहीं यह मंदिर 'पश्चिम मुखी' है। मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर मैंने स्थानीय बुजुर्गों से सुना कि कैसे मेवाड़ के सूर्यवंशी राजाओं ने इस भूमि को अपना घर बनाया और इसे 'चित्तौड़गढ़' जैसा स्वाभिमान दिया। मंदिर के पास का विशाल सूर्य कुंड और वहाँ की नक्काशीदार पत्थर की दीवारें राजाओं के कीर्तित्व की मूक गवाह हैं। छठ के समय यहाँ जो ऊर्जा होती है, वह किसी दिव्य उत्सव से कम नही है देव से आगे बढ़कर मैं उमगा की पहाड़ियों की ओर मुड़ा। इसे 'छोटा कोणार्क' कहा जाता है। ऊँची पहाड़ी पर चढ़ते हुए थकावट तो थी, लेकिन ऊपर पहुँचते ही जब पत्थरों को काटकर बनाए गए प्राचीन वैष्णव मंदिर दिखे, तो मन श्रद्धा से भर गया। यहाँ की हवाओं में एक प्राचीन गूँज है। इसके बाद देवकुंड की बारी थी। महर्षि च्यवन की यह तपोभूमि अध्यात्म का एक शांत कोना है। यहाँ के कुंड का पानी और आसपास का परिवेश आज भी उस ऋषि परंपरा की याद दिलाता है जिसने भारत को आयुर्वेद और ज्ञान का प्रकाश दिया ।जब मैं दाउदनगर पहुँचा, तो परिवेश बदल चुका था। सोन नदी के किनारे बसा यह शहर मुग़ल सेनापति दाऊद खान की याद दिलाता है। यहाँ का पुराना किला (गढ़) अब जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है, लेकिन इसकी दीवारें आज भी उस दौर की सैन्य रणनीतियों की गवाही देती हैं। दाउदनगर के बाजारों में घूमते हुए मुझे ओबरा की उन कालीनों की याद आई, जो कभी समरकंद और बुखारा के बाजारों की होड़ करती थीं। यहीं पास में जाम्भोर का क्षेत्र है। यह कभी एक शक्तिशाली परगना हुआ करता था। जाम्भोर की गलियों में घूमते हुए ऐसा लगता है जैसे आप इतिहास के किसी पुराने पन्ने को हाथ में लिए हुए हों। यहाँ की मिट्टी में मध्यकालीन सामंतवाद और मुगलिया प्रशासनिक ढांचे की परतें आज भी महसूस की जा सकती हैं।
मेरी यात्रा के बीच में आद्री नदी एक सहयात्री की तरह मिली। इस नदी के किनारे बसे गाँवों में जीवन आज भी धीमा और मधुर है। गोह और रफीगंज के बीच का इलाका कृषि की संपन्नता का क्षेत्र है। गोह की ग्रामीण राजनीति और रफीगंज की व्यावसायिक गहमागहमी के बीच आद्री नदी एक शांत सूत्र की तरह बहती है।
यहीं मुझे भृगुरारी जाने का अवसर मिला। पौराणिक कथाओं के अनुसार महर्षि भृगु की इस भूमि पर एक अजीब सी शांति है। यहाँ के खेतों में काम करते किसानों की आँखों में अब एक नई चमक है—यह चमक है 'स्ट्रॉबेरी' की खेती की। परंपरागत धान-गेहूँ से हटकर यहाँ के किसानों ने जो आर्थिक क्रांति की है, वह वाकई काबिल-ए-तारीफ
यात्रा का अंतिम और सबसे प्रभावशाली पड़ाव था अम्बा और नवीनगर। अम्बा में सतबहिनी मंदिर के दर्शन कर जब मैं नवीनगर की ओर बढ़ा, तो क्षितिज पर विशाल चिमनियां दिखाई देने लगीं। नवीनगर सुपर थर्मल पावर प्लांट (NTPC) को देखना एक अलग ही रोमांच था। जहाँ देव मंदिर में प्राचीन ऊर्जा का वास है, वहीं नवीनगर में आधुनिक भारत की औद्योगिक ऊर्जा का जन्म हो रहा है। हज़ारों मेगावाट बिजली पैदा करने वाला यह विशाल संयंत्र बताता है कि औरंगाबाद अब पिछड़ा जिला नहीं, बल्कि बिहार की अर्थव्यवस्था का 'पावर हाउस' है। यहाँ की मशीनों की गड़गड़ाहट में विकास का एक नया संगीत सुनाई देता
यात्रा के दौरान मेरी मुलाकात कुछ स्थानीय पत्रकारों और साहित्यकारों से हुई। औरंगाबाद के साहित्यक व समकालीन के संपादक डॉ सुरेन्द्र प्रसाद मिश्र ने मुझे ' समकालीन जवाबदेही' पत्रिका 2025 की दो प्रतियां भेंट की। औरंगाबाद जैसे छोटे शहर से ऐसी गुणवत्तापूर्ण समकालीन पत्रिका का निकलना सुखद आश्चर्य था। यह पत्रिका साबित करती है कि यहाँ के लोग केवल इतिहास की गौरवगाथा नहीं गाते, बल्कि वर्तमान की विसंगतियों पर सवाल भी पूछते हैं। ।यह बौद्धिक चेतना शायद डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह (अनुग्रह बाबू) की ही देन है। पोइवां गाँव में जन्मे इस महापुरुष की स्मृतियाँ पूरे जिले में बिखरी पड़ी हैं। उन्होंने ही औरंगाबाद को वह वैचारिक नींव दी, जिस पर आज का आधुनिक जिला खड़ा है।


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