बारात,जनवासा और शामियाना
जय प्रकाश कुवंर
भारतीय समाज के गाँव देहात में पहले माता पिता द्वारा तय किया गया लड़का लड़की का शादी ही प्रचलित था, जिसे आज कल अरेंज्ड मैरिज के नाम से जाना जाता है। साधारणतया एक ही गाँव के समान बिरादरी वाले लड़का लड़की में शादी व्याह नहीं होता था। अतः स्वाभाविक रूप से उनके गावों में कुछ दूरी का फासला होता था। शादी व्याह के लिए भी उन दिनों गर्मी का महीना यानि मई जून ही उपयुक्त होता था, क्योंकि उस समय किसानों के साथ फसल बुवाई कटाई का कोई झंझट नहीं रहता था और गांवों में बरात टिकाने के लिए खेत खलिहान भी खाली रहते थे।
एक बार लड़का लड़की के अभिभावकों द्वारा उनकी शादी तय कर लेने के बाद तथा छेंका तिलक की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद निर्धारित शुभ दिन पर लड़के के गाँव घर से लड़की के गाँव घर बारात जाती थी। बारात में लड़का पक्ष के घर वाले, गाँव वाले, रिश्तेदारों एवं पवनी पसारी तथा नाच बाजा वालोँ आदि को मिला कर हर हाल में लगभग २००-२५० लोग हो जाया करते थे। हांलाकि उन दिनों बारात में शामिल होने के लिए हाथी, घोड़ा, बैलगाड़ी, साईकिल और पैदल चलना छोड़ कर और कोई साधन नहीं था, फिर भी गाँव देहात के लोग उत्साहित होकर बारात में शामिल होते थे।
शादी के दिन अपने गाँव से चलकर बारात लड़की के गाँव पहुंचने और दरवाजा लगने तथा द्वार पूजा की रस्म पुरा होने के बाद बारात जनवासा में चली जाती थी। जनवासा के लिए उन दिनों उस गाँव के खाली मैदान अथवा खेत आदि में मोटे कपड़े का सिला हुआ शामियाना लगता था, जिसे बांस के मोटे डंडो द्वारा खड़ा किया जाता था। अपने हैसियत तथा संभावित बारातियों की संख्या के अनुसार लड़का पक्ष वाले शामियाना भाड़ा पर लेकर खड़ा करवाते थे। गाँव देहात में उन दिनों ५२ चोप ( बांस की बल्ली) वाला शामियाना सबसे बड़ा माना जाता था, जिसके नीचे २००-२५० लोग बैठ सकते थे।
फिर शामियाना में नाच गान का महफ़िल सजाने के लिए उसे झाड़फानूस से सजाया जाता था और रोशनी के लिए शामियाने में बड़े बड़े पेट्रोमैक्स लगाये जाते थे, क्योंकि उन दिनों गाँव देहात में बिजली की व्यवस्था नहीं थी। इस प्रकार से बारातियों का जनवासा सजता था और लोग नाच गाना देख सुनकर आनंदित होते थे। बाराती रात को शामियाना में ठहरते और दरी, गलिचे, कालिन आदि पर आराम करते और सोते थे।
साधारणतया लड़का पक्ष के गाँव घर से चल कर आयी हुई बारात लड़की के गाँव घर पर एक रात ही ठहरती थी, जिसे एक राता बारात कहा जाता था। इस एक दिन रात में ही शादी व्याह आदर सत्कार सब हो जाया करता था। लेकिन कुछ बड़े घरानों और बड़े हैसियत वाले लड़का लड़की के परिवारों की बारात दो रात टिकती थी, जिसे दो राता बारात कहा जाता था। हांलाकि शादी व्याह तो पहले ही रात को हो जाया करती थी, लेकिन दो दिन रात बारातियों का खुब हाव भगत, आदर सत्कार तथा तरह तरह का खिलान पिलान होता था। दो रात के अगले सुबह लड़का लड़की और बारातियों की बिदाई होती थी।
आज कल गाँव से लेकर शहर तक शामियाना का जगह मैरिज हांल ने ले लिया है और शामियाना का रिवाज खत्म हो चला है। कुछ जगह शामियाना के जगह टेन्ट सजाये जाते हैं। गाँव देहात तथा शहर सभी जगह बिजली लग जाने से अब पेट्रोमैक्स तो अतीत का वस्तु बन कर रह गया है। नयी पीढ़ी के बच्चे तो शायद प्रकाश के लिए पेट्रोमैक्स का नाम सुनकर अचंभित हो जांयेंगे। अब तो नयी पीढ़ी के लिए जनवासा सजना भी कौतुहल का ही विषय है, क्योंकि गाँव देहात से लेकर शहर तक लोग बारात में जाते हैं, तथा बारात दरवाजा लगने के बाद खाना खाकर अपनी अपनी सवारी से अपने गाँव घर रात में ही लौट आते हैं।
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