मकड़जाल
जय प्रकाश कुवंर
चौरासी लाख योनियों में जीव के भटकने के बाद बड़े भाग्य से उसका जन्म मानव योनि में इस पृथ्वी पर होता है। मानव योनि में जन्म पाना जीव के अनेकों जन्मों के पुण्य का फल होता है। मानव रूप में जन्म ग्रहण करने के बाद जीवन जीने के लिए मानव को दो रास्ते मिलते हैं। एक साधु संयासी के रूप में जीने का जीवन और दूसरा सांसारिक मानव के रूप में जीने का जीवन।
साधु संयासी वह व्यक्ति होता है जिसने जन्म ग्रहण के बाद सांसारिक मोह माया, इच्छाओं और बंधनों को त्याग दिया है और ब्रह्मचर्य का जीवन बिताता है। वही सांसारिक या गृहस्थ वह व्यक्ति होता है जो संसार के रिश्तों नातों, कर्तव्यों, भौतिक सुखों और दुनियादारी में लिप्त रहता है। एक तरफ जहाँ संयासी त्याग और वैराग्य का प्रतीक है, वहीं दुसरी तरफ सांसारिक या गृहस्थ सांसारिक लगाव तथा बहुत सारी जिम्मेदारियों का प्रतीक है।
सांसारिक जीवन को अक्सर कहते सुना जाता है कि यह एक मकड़जाल है, जिसका ताना बाना मानव खुद रचता या बनाता है और उसी में उलझ कर उसके जीवन का अंत हो जाता है। तो आखिर यह मकड़जाल क्या है जिसकी संज्ञा मानव के गृहस्थ या सांसारिक जीवन से दी जाती है।
मकड़जाल मकड़ी द्वारा बनाया गया वह रेशमी जाल है, जिसे वह खुद बनाती है, उसमें रहती है, प्रजनन करती है, और छोटे मोटे कीड़ों को अपने आहार के लिए उसमें फंसाती है। यह जाल हल्का, लचीला और बहुत मजबूत होता है, जिसे मकड़ी अपने पेट से एक तरल पदार्थ निकाल कर अपने पैरों के माध्यम से रेशमी जाल के रूप में बुनती है। बाद में वह तरल पदार्थ ठोस धागानुमा बन जाता है। और मकड़ी का जाल कहलाता है। इस तरह मकड़ी का यह जाल उसके शिकार, भोजन और मकड़ी परिवार के जीवित रहने की प्रक्रिया का प्रमुख हिस्सा बना रहता है और मकड़जाल कहलाता है। मकड़ी के जाल की यह प्रक्रिया सब कुछ करते और सहते हुए चक्राकार यों ही चलती रहती है।
ठीक उसी प्रकार सांसारिक व्यक्ति जन्म के बाद अपना घर बनाता है, शादी ब्याह करता है और अपने घर में ही रहकर सदा सुख दुख के चक्र में रहते हुए अपने बाल बच्चों के लिए सारा सांसारिक कर्म करता है। वह धर्म कर्म, पूजा अर्चना, व्रत उपवास आदि करता है। शुद्ध तथा अशुद्ध वैदिक तरीके से अपना परिवार बढ़ाता है। पाप पुण्य, तथा धर्म अधर्म से इस संसार को भोगता है। वह अपना कर्तव्य करते हुए परिवार में रहता है परन्तु कर्तव्य पथ से पलायन नहीं करता है। वह इसी में ईश्वर को भी ढूंढता है और उन्हें भजता है।
सांसारिक आदमी अपने परिवार के लिए जीता है और आध्यात्मिक रूप धारण कर दुनिया के सोच में भी मग्न हो जाता है। हर आदमी सांसारिक जीवन को छोड़कर संयासी नहीं बन सकता। ऐसा करने पर संसार या श्रृष्टि का ताना बाना टुट जाएगा।
मानव जीवन में सांसारिक आदमी गृहस्थ संयासी कहलाता है। वह पारिवारिक जीवन में रहते हुए संयास के सिद्धांतों का भी पालन करता है। वह न तो प्रतिष्ठा का लोभ रखता है और न किसी से द्वेष रखता है। मकड़ी के जैसा मानव भी यही परिवारिक जीवन में मकड़जाल बुनता है और उसी में फंसा रहकर उसके जीवन का अंत हो जाता है।
और सबसे बड़ी बात यह है कि मानव के सांसारिक जीवन के मकड़जाल की प्रक्रिया भी मकड़ी की तरह यों ही चलती रहती है।
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