क्या इसी दिन के लिए रियासतों का विलय हुआ था?
1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब देश सैकड़ों रियासतों में बँटा हुआ था। इन रियासतों के शासकों ने राष्ट्र की एकता, स्थिरता और अपने नागरिकों के बेहतर भविष्य के लिए अपनी-अपनी रियासतों का भारत संघ में विलय किया। यह निर्णय किसी दबाव से नहीं, बल्कि एक वृहद राष्ट्र-निर्माण की भावना से प्रेरित था। उस समय यह विश्वास था कि लोकतांत्रिक भारत सभी समाजों को समान अवसर, सम्मान और न्याय प्रदान करेगा।
परंतु आज, लगभग आठ दशकों बाद, यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वास्तव में वही भारत बना, जिसकी कल्पना उन पूर्वजों ने की थी?
आज देश में लोकतंत्र के नाम पर जिस प्रकार की व्यवस्था कार्य कर रही है, वह कई बार एक नए प्रकार के राजतंत्र जैसी प्रतीत होती है—जहाँ सत्ता कुछ विशेष समूहों, विचारधाराओं और संस्थाओं तक सीमित होती जा रही है। जो समाज कभी शासन, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक नेतृत्व में अग्रणी था, वह आज स्वयं को शोषित, उपेक्षित और अपराधबोध में जकड़ा हुआ महसूस कर रहा है।
SC/ST Act, UGC जैसे कानून और संस्थाएँ मूल रूप से सामाजिक न्याय और संतुलन के लिए बनाई गई थीं। किंतु व्यवहार में, इनके दुरुपयोग की शिकायतें लगातार बढ़ी हैं। एक बड़ा वर्ग यह महसूस करता है कि उसे बिना सुने, बिना परखे, केवल उसकी सामाजिक पहचान के आधार पर दोषी ठहराया जा रहा है। क्या यह न्याय है? क्या यह वही समानता है, जिसका वादा संविधान ने किया था?
यह भी विचारणीय है कि जिन रियासतों ने अपनी सत्ता छोड़ी, उन्होंने ऐसा अपने वंशजों को कमजोर, असुरक्षित और आत्मग्लानि में जीने के लिए नहीं किया था। उन्होंने सोचा था कि एक मजबूत राष्ट्र में हर वर्ग सुरक्षित होगा, सम्मान के साथ आगे बढ़ेगा और उसकी ऐतिहासिक भूमिका को नकारा नहीं जाएगा।
आज जब लोकतंत्र की आड़ में कुछ वर्गों को स्थायी अपराधी और कुछ को स्थायी पीड़ित के रूप में स्थापित किया जा रहा है, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या सामाजिक समरसता की जगह सामाजिक विभाजन को बढ़ावा दिया जा रहा है?
रियासतों का भारत में विलय कोई साधारण राजनीतिक समझौता नहीं था; यह एक ऐतिहासिक त्याग था। यदि उस त्याग का प्रतिफल आज अपमान, असुरक्षा और निरंतर शोषण के रूप में मिल रहा है, तो असंतोष का जन्म लेना स्वाभाविक है। यह असंतोष देश तोड़ने की भावना नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और न्याय की माँग है।
आज आवश्यकता है आत्ममंथन की—सरकार, संस्थानों और समाज सभी को यह सोचना होगा कि क्या हम वास्तव में एक न्यायपूर्ण लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं या केवल सत्ता-संतुलन के नए रूप गढ़ रहे हैं। इतिहास गवाह है कि जिस समाज की आवाज़ को लंबे समय तक दबाया जाता है, वह एक दिन प्रश्न पूछता ही है।
और शायद आज वही दिन है, जब यह पूछा जाना चाहिए—
क्या इसी भविष्य के लिए हमारे पूर्वजों ने अपनी रियासतों का विलय किया था?
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