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हिमालय की छांव में शब्द-साधना: भारत-नेपाल साहित्यिक अंतर्संबंध

हिमालय की छांव में शब्द-साधना: भारत-नेपाल साहित्यिक अंतर्संबंध

सत्येन्द्र कुमार पाठक
जब आप काठमांडू की घाटी में प्रवेश करते हैं और पशुपतिनाथ के मंदिर परिसर में बागमती की मंद-मंद बहती जलधारा को देखते हैं, तो आपको अहसास होता है कि भारत और नेपाल के बीच की सीमा केवल मानचित्र की एक लकीर है। यहाँ हवाओं में केवल देवदार की खुशबू नहीं, बल्कि देवनागरी के अक्षरों की गूँज है। बागमती के इसी पावन तट पर जब नेपाल और भारत के मूर्धन्य साहित्यकारों की टोली बैठी, तो चर्चा का विषय कोई राजनीतिक संधि नहीं, बल्कि वह 'साझा प्राण-तत्व' था जो सदियों से गंगा और बागमती के बीच प्रवाहित हो रहा है। यह संस्मरण उस अटूट भाषाई और साहित्यिक सेतु की कहानी है, जो पशुपतिनाथ से विश्वनाथ (वाराणसी) तक और जनकपुर की प्राचीन गलियों से दिल्ली के साहित्यिक गलियारों तक फैला हुआ है। रामायण और महाभारत का प्रभाव में भारत और नेपाल का साहित्यिक संबंध किसी आधुनिक समझौते की उपज नहीं है; इसकी जड़ें त्रेता और द्वापर युग की कथाओं में निहित हैं। चर्चा के दौरान नेपाल के विद्वानों ने बड़े गर्व से कहा कि जनकपुर केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि वह केंद्र है जहाँ से भारतीय और नेपाली संबंधों का 'महाकाव्य' शुरू होता हैजिस प्रकार भारत में गोस्वामी तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' के माध्यम से राम को जन-जन का आराध्य बनाया, ठीक उसी प्रकार नेपाल के आदिकवि भानुभक्त आचार्य ने 'भानुभक्त रामायण' की रचना कर नेपाली लोकमानस को एक नई पहचान दी। पशुपतिनाथ के तट पर हुई चर्चा में यह बात उभरकर आई कि भानुभक्त ने केवल अनुवाद नहीं किया, बल्कि नेपाली समाज को एक भाषाई सूत्र में पिरोया, जिसकी प्रेरणा के स्रोत भारतीय अध्यात्म ही थे । महाभारत और विभिन्न पुराणों का प्रभाव नेपाल के लोकसाहित्य और शास्त्रीय साहित्य पर समान रूप से है। काठमांडू की कलाकृतियों से लेकर वहाँ के नाटकों तक, भारतीय पौराणिक नायकों की उपस्थिति दोनों देशों के 'साझा नायकत्व' को दर्शाती है। देवनागरी: लिपि की एकता और भाषाई आत्मीयता का नेपाल और भारत के बीच सबसे बड़ा पुल देवनागरी लिपि है। यह केवल लिपि नहीं, बल्कि एक विजुअल पहचान है। काठमांडू, वीरगंज, और विराटनगर के बाज़ारों में घूमते हुए आपको कभी यह महसूस ही नहीं होता कि आप किसी दूसरे देश में हैं।
हिंदी और नेपाली का सह-अस्तित्व: नेपाल के तराई क्षेत्रों, विशेषकर वीरगंज, विराटनगर और धनुषा (जनकपुर) में हिंदी की उपस्थिति अत्यंत गौरवशाली है। यहाँ हिंदी केवल संचार की भाषा नहीं, बल्कि साहित्यिक सृजन का माध्यम भी है। कई नेपाली लेखकों ने हिंदी में अपनी उत्कृष्ट कृतियाँ रची हैं, और भारतीय लेखकों ने नेपाली परिवेश को अपनी कहानियों में उतारा है। बनारस: शिक्षा और साहित्य का संगम: ऐतिहासिक रूप से बनारस (वाराणसी) नेपाली विद्वानों के लिए ज्ञान का सर्वोच्च केंद्र रहा है। नेपाल के आधुनिक साहित्य का सूर्योदय बनारस की गलियों और वहां के छापाखानों से हुआ। कई शुरुआती नेपाली पत्रिकाएँ बनारस से ही प्रकाशित हुईं, जिसने दोनों देशों के बीच एक 'बौद्धिक प्रवास' को जन्म दिया। हिंदी साहित्य के: छायावाद और प्रगतिवाद बागमती के तट पर हुई उस साहित्यिक गोष्ठी में एक गहरा विश्लेषण हुआ—कैसे भारतीय हिंदी साहित्य के आंदोलनों ने नेपाली लेखकों को प्रेरित किया। नेपाली साहित्य के स्तंभ देवकोटा को 'नेपाल का निराला' कहा जाता है। उनकी कविताओं में जयशंकर प्रसाद की दार्शनिकता और सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की विद्रोही चेतना का अद्भुत संगम मिलता है। उनका महाकाव्य 'मुनामदन' भारतीय पाठकों के बीच भी उतना ही लोकप्रिय है, क्योंकि वह प्रेम और विरह की उस वैश्विक भाषा में बात करता है जो सीमाओं को नहीं मानती। नेपाल में मगही , बज्जिका , भोजपुरी , अंगिका , मैथिली , हिंदी , नेपाली भाषाएं बोली जाती है ।
छायावाद और प्रगतिवाद में 1930 और 40 के दशक में भारत में जो छायावादी लहर उठी, उसकी गूँज नेपाल के आधुनिक कवियों में स्पष्ट सुनाई देती है। प्रकृति चित्रण, रहस्यवाद और फिर उसके बाद मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित प्रगतिवादी साहित्य—ये दोनों देशों के समांतर विकास की कहानियाँ हैं। आज भी, समकालीन नेपाली कविता में मुक्तिबोध और अज्ञेय के प्रयोगों की झलक देखी जा सकती ह
इस संस्मरण का एक महत्वपूर्ण पक्ष वह नेपाली साहित्य है जो भारत की सीमाओं के भीतर रचा जा रहा है। बिहार , दार्जिलिंग, सिक्किम, असम, मेघालय और उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में नेपाली भाषा केवल बोली नहीं जाती, बल्कि वहाँ इसका समृद्ध साहित्य फल-फूल रहा है। संस्थागत योगदान: दार्जिलिंग में स्थित 'नेपाली साहित्य सम्मेलन' ने नेपाली भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। चर्चा में लक्खीदेवी सुंदास, गुप्त प्रधान, घनश्याम नेपाल, और डॉ. कविता लामा जैसे नामों का उल्लेख बड़े सम्मान के साथ किया गया। इन साहित्यकारों ने भारतीय नेपाली साहित्य को एक स्वतंत्र और सशक्त पहचान दी है। इनके लेखन में कंचनजंघा की शीतलता भी है और भारतीय समाज की जटिलताओं का यथार्थ चित्रण है। नवीन पौडेल, राजकुमार क्षेत्री और डॉ. गोमा देवी जैसे विद्वानों ने आलोचना की जो परंपरा विकसित की है, वह नेपाली साहित्य को वैश्विक मानदंडों पर परखने का कार्य कर रही ह
साहित्यकारों के उस समूह ने 'विराटनगर घोषणापत्र' की प्रासंगिकता पर भी चर्चा की। यह घोषणापत्र केवल एक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक प्रतिज्ञा है कि दोनों देशों के साहित्यकार राजनीतिक उतार-चढ़ाव से ऊपर उठकर अपनी साझा संस्कृति की रक्षा करेंगे। समय-समय पर आयोजित होने वाले 'भारत-नेपाल साहित्य महोत्सव' (जैसे वृंदावन और काठमांडू में आयोजित महोत्सव) इन संबंधों को नई ऊर्जा देते हैं। इन आयोजनों में न केवल वरिष्ठ साहित्यकार, बल्कि नई पीढ़ी के युवा कवि भी भाग लेते हैं, जो सोशल मीडिया के माध्यम से एक-दूसरे की कविताओं पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं। आज के दौर में ब्लॉग्स, पॉडकास्ट और ई-पत्रिकाओं ने काठमांडू और दिल्ली के बीच की दूरी को समाप्त कर दिया है। बागमती के तट पर उस चर्चा का समापन देवकोटा की उन अमर पंक्तियों से हुआ, जो भारत और नेपाल के साझा दर्शन का सार हैं: "क्षेत्रीको छोरो यो पाउ छुन्छ, घिनले छुँदैन" "मानिस ठूलो दिलले हुन्छ, जातले हुँदैन" यह पंक्तियाँ चिल्ला-चिल्ला कर कहती हैं कि हम भले ही अलग-अलग देशों के नागरिक हों, लेकिन हमारी मनुष्यता और हमारी संवेदना एक है। भारतीय उपनिषदों का 'वसुधैव कुटुंबकम' का भाव नेपाली साहित्य की रग-रग में दौड़ रहा है। जब पशुपतिनाथ की आरती समाप्त हुई और बागमती के जल में सहस्त्रों दीपकों की लौ झिलमिलाने लगी, तो ऐसा लगा मानो हर दीपक एक शब्द हो, जो भारत और नेपाल की साझी विरासत की कहानी कह रहा हो। यह संस्मरण केवल अतीत की याद नहीं है, बल्कि भविष्य का एक रोडमैप है। भारत और नेपाल का साहित्यिक संबंध 'अनादि' है और 'अनंत' भी। यह वह हिमालयी धारा है जिसे कोई अवरोध रोक नहीं सकता। हमारी कहानियाँ एक हैं, हमारे दुख-सुख एक हैं, और सबसे बड़ी बात—हमारे शब्द एक हैं। जब तक देवनागरी अक्षरों का यह वैभव बना रहेगा, भारत और नेपाल की यह साहित्य यात्रा बिना रुके, बिना थके अनवरत चलती रहेगी। भारत और नेपाल के बीच की उस अदृश्य लेकिन सबसे मजबूत शक्ति यानी 'साहित्य' को समर्पित है। यह हमें याद दिलाता है कि जब राजनीति थक जाती है, तब साहित्य ही वह रास्ता दिखाता है जहाँ से आपसी प्रेम का नया सवेरा होता है।


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