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सरस्वती पूजा- आस्था, अनुशासन और आत्ममंथन का दिवस

सरस्वती पूजा- आस्था, अनुशासन और आत्ममंथन का दिवस

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

आज सरस्वती माता का जन्मदिवस, अर्थात सरस्वती पूजा है। परंपरा से यह दिन ज्ञान, विवेक, वाणी, संगीत और संस्कार की आराधना का पर्व माना जाता है। यह अध्यात्म का वह उत्सव है जहाँ मनुष्य अपनी बुद्धि को शुद्ध करने, अपने आचरण को मर्यादित करने और अपने जीवन को ज्ञानमय बनाने का संकल्प लेता है। किंतु आज की सुबह से ही जब चारों ओर कान फोड़ू संगीत, शोर-शराबा और अव्यवस्थित हंगामा सुनाई देता है, तो मन में एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है—क्या यही धार्मिक आस्था है, या आस्था के नाम पर उसका खिलवाड़?

माँ सरस्वती श्वेत वस्त्रों में, वीणा धारण किए, शांत और सौम्य स्वरूप में विराजमान हैं। उनका प्रतीक ही शांति, संतुलन और संयम है। वे न तो उन्माद की देवी हैं और न ही अराजकता की। फिर ऐसा कैसे संभव है कि उन्हीं की पूजा के दिन ध्वनि प्रदूषण, अशिष्ट गीतों और उग्र प्रदर्शन को धार्मिक आस्था का नाम दे दिया जाए? क्या यह हमारे भीतर की श्रद्धा का पतन नहीं दर्शाता?

धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य को अनुशासित, संवेदनशील और समाजोपयोगी बनाना है। पूजा-पाठ, व्रत-त्योहार और उत्सव इसी उद्देश्य की पूर्ति के साधन हैं। जब साधन ही साध्य को नष्ट करने लगें, तब आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है। आज सरस्वती पूजा के अवसर पर जिस तरह की गतिविधियाँ देखने-सुनने को मिलती हैं—तेज डीजे, अश्लील गीत, ट्रैफिक अवरोध, ध्वनि की सीमा का उल्लंघन—वे न केवल कानून और सामाजिक मर्यादा के विरुद्ध हैं, बल्कि स्वयं देवी सरस्वती के स्वरूप का अपमान भी हैं।

धार्मिक आस्था का अर्थ दूसरों को असुविधा पहुँचाना नहीं है। किसी की पढ़ाई, किसी की बीमारी, किसी की वृद्धावस्था—इन सब पर शोर का क्या प्रभाव पड़ता है, इस पर हम शायद ही विचार करते हैं। ज्ञान की देवी की पूजा के दिन यदि छात्र पढ़ न सकें, बीमार चैन से सो न सकें और सामान्य नागरिक परेशान हों, तो यह कैसी विडंबना है?

यह भी सत्य है कि उत्सव में उल्लास होता है, आनंद होता है। किंतु आनंद और उन्माद में अंतर है। आनंद वह है जो सबको जोड़ता है, और उन्माद वह जो दूसरों को चोट पहुँचाता है। सरस्वती पूजा का आनंद पुस्तक-पूजन में, संगीत की मधुर साधना में, बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में और सामूहिक प्रार्थना में निहित है—न कि शोर और शक्ति-प्रदर्शन में।

आज आवश्यकता है कि हम धर्म को दिखावे से निकालकर आत्मा से जोड़ें। आयोजकों, युवाओं और समाज के प्रबुद्ध वर्ग को यह समझना होगा कि आस्था का प्रदर्शन नहीं, आचरण होता है। प्रशासन की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है, पर उससे अधिक महत्त्वपूर्ण है हमारी स्वयं की जिम्मेदारी। कानून से पहले विवेक काम करे—यही सच्ची पूजा है।अंततः सरस्वती माता से यही प्रार्थना है कि वे हमें सही और गलत में भेद करने की बुद्धि दें। हमें यह समझने की शक्ति दें कि धर्म का मार्ग शांति, संयम और संवेदना से होकर जाता है, शोर और अराजकता से नहीं। यदि हम इस संदेश को आत्मसात कर सकें, तभी सरस्वती पूजा का वास्तविक अर्थ सिद्ध होगा—अन्यथा यह आस्था के नाम पर एक खोखला उत्सव बनकर रह जाएगा।
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