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जब सत्ता प्रश्नों से डरने लगे, तब इतिहास करवट लेता है

जब सत्ता प्रश्नों से डरने लगे, तब इतिहास करवट लेता है

डॉ. राकेश दत्त मिश्र
इतिहास का सबसे बड़ा भ्रम यही रहा है कि सत्ता स्वयं को स्थायी समझ लेती है। जैसे ही कोई शासन यह मान लेता है कि उसकी कुर्सी प्रश्नों से ऊपर है, उसी क्षण उसके पतन की उलटी गिनती शुरू हो जाती है। मगध नरेश घनानंद का इतिहास केवल अतीत नहीं है—वह हर उस सत्ता के लिए चेतावनी है, जो आलोचना को अपराध और प्रश्न को षड्यंत्र मानने लगती है।

“इस दुष्ट ब्राह्मण की चोटी पकड़कर सभा से बाहर कर दो”—
यह वाक्य सत्ता के आत्मघाती अहंकार का घोष था। यह वह क्षण था जब राज्य ने विवेक से नाता तोड़ लिया और बल को ही नीति मान लिया। इतिहास गवाह है—जिस दिन सत्ता ज्ञान को अपमानित करती है, उसी दिन उसका नैतिक अंत हो जाता है।

जिसे बाहर फेंकने का आदेश दिया गया, वह व्यक्ति नहीं था—वह विचार था। और विचार को अपमानित किया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता। चाणक्य अपमानित हुए, पर उसी अपमान ने चन्द्रगुप्त को जन्म दिया।
चन्द्रगुप्त तुरंत नहीं बनता, पर अनिवार्य होता है

सत्ता परिवर्तन कोई तात्कालिक घटना नहीं होती। चन्द्रगुप्त उसी दिन तैयार नहीं हुआ था। उसे समय लगा—
दस वर्ष, पंद्रह वर्ष, शायद पच्चीस वर्ष।
अन्याय जब व्यवस्था का स्थायी चरित्र बन जाता है, तब परिवर्तन धीरे-धीरे समाज की कोख में पलता है। सत्ता को तब भ्रम रहता है कि सब शांत है, जबकि भीतर लावा पक रहा होता है।

मगध में भी यही हुआ। नन्द वंश का पतन किसी एक युद्ध का परिणाम नहीं था, वह वर्षों के अहंकार, अन्याय और जनविरोध का निष्कर्ष था। अमात्य राक्षस जैसे लोग, जो राज्य के प्रति निष्ठावान थे, सब कुछ देखते रहे—पर जब सत्ता स्वयं अंधी हो जाए, तब भीतर का विवेक भी अपंग हो जाता है।
आज की सत्ता और वही प्राचीन मानसिकता

आज सत्ता का चेहरा बदला है, पर प्रवृत्ति वही है। जब शासन—

नैतिकता से रिक्त हो जाता है,


नौकरशाही निरंकुश और संवेदनहीन हो जाती है,


और निर्णय समाज की आत्मा को दरकिनार कर दिए जाते हैं—

तब UGC बिल जैसे निर्णय सामने आते हैं। तब वेदपाठी ब्राह्मणों को चोटी पकड़कर घसीटने जैसी घटनाएँ केवल संभव ही नहीं, बल्कि “सामान्य” बना दी जाती हैं।

यह किसी एक वर्ग या समुदाय का प्रश्न नहीं है। यह भारत की बौद्धिक आत्मा पर सीधा हमला है। यह उस परंपरा का अपमान है, जिसने इस देश को सोचने, तर्क करने और प्रश्न उठाने का साहस दिया।
प्रश्न सत्ता को सबसे अधिक डराते हैं

लोकतंत्र में प्रश्न शक्ति होते हैं, पर जब सत्ता लोकतांत्रिक नहीं रह जाती, तब वही प्रश्न उसे शत्रु प्रतीत होते हैं। चेताने वाले लोग देशद्रोही दिखने लगते हैं। आलोचना में षड्यंत्र की गंध आने लगती है। समर्थन और विरोध की सूची बनती है, पर सत्य की कोई जगह नहीं बचती।

सत्ता तब यह भूल जाती है कि इतिहास में हर परिवर्तन की शुरुआत प्रश्नों से ही हुई है। जो सत्ता प्रश्नों को कुचलती है, वह असल में अपने भविष्य को कुचल रही होती है।
UGC बिल: सुधार या दमन का औजार?

आज शिक्षा, शोध और अकादमिक स्वतंत्रता को “नियंत्रण” के नाम पर जकड़ा जा रहा है। UGC जैसे संस्थानों को बौद्धिक मार्गदर्शक के बजाय सत्ता का अनुशासनात्मक औजार बनाया जा रहा है। यह वही मानसिकता है, जिसने कभी चाणक्य को सभा से बाहर घसीटने का आदेश दिया था।

जब शिक्षा सत्ता की अनुचर बन जाती है, तब राष्ट्र बौना हो जाता है।
इतिहास दोहराता नहीं, चेतावनी देता है

मगध में भी सत्ता परिवर्तन एक या दो वर्षों में नहीं हुआ था। वहाँ भी सत्ता को लगता रहा कि सब नियंत्रण में है। लेकिन इतिहास नियंत्रण से नहीं, न्याय से चलता है। कालचक्र किसी के आदेश से नहीं रुकता।

आज भी वही कालचक्र चल रहा है। यह सम्पादकीय किसी व्यक्ति, दल या सरकार के विरुद्ध नहीं है—यह सत्ता के अहंकार के विरुद्ध अंतिम चेतावनी है।

जो सत्ता यह मान लेती है कि वह प्रश्नों से ऊपर है, उसे यह स्मरण रखना चाहिए—

चन्द्रगुप्त आज भी जन्म ले सकता है।
वह अचानक नहीं आता,
पर जब आता है, तो इतिहास बदल देता है।

कालचक्र अटल है।
और जो उसे अनदेखा करते हैं, वे इतिहास में चेतावनी बनकर दर्ज होते हैं।
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