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इतना भी आसान कहाँ है?

इतना भी आसान कहाँ है?

अ कीर्ति वर्द्धन

सुबह सवेरे जल्दी उठना, इतना भी आसान कहाँ है,
सर्द सुबह में घूमने जाना, इतना भी आसान कहाँ है?
कभी पिया न पानी लेकर, हमने चाय बनाई नहीं,
चाय बनाकर रोज पिलाना, इतना भी आसान कहाँ है?
शादी की बातें सोच सोच कर, लड्डू फूटा करते मन में,
शादी करके जीवन यापन, इतना भी आसान कहाँ है?
रोज़ सवेरे सामानों की, फ़ेहरिस्त हमें मिल जाती है,
कम आय में घर चलाना, इतना भी आसान कहाँ है?
पत्नी की फ़रमाइश हमको, सुरसा मुख सी लगती हैं,
सुखमय जीवन जीना यारों, इतना भी आसान कहाँ है?
नये दौर में बच्चे हमको, खंडहर पुराना बतलाते हैं,
कदमताल बच्चों संग करना, इतना भी आसान कहाँ है?
हम जीते रिश्तों की खातिर, रिश्तों पर सब क़ुर्बान,
रिश्तों में रस बन कर जीना, इतना भी आसान कहाँ है?
तन्हाई का दौर चल रहा, सब कुछ है पर तन्हा सब,
संवादों की मरहम लगाना, इतना भी आसान कहाँ है?


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