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शंकराचार्य की नाराजगी

शंकराचार्य की नाराजगी

लेखक मनोज मिश्र इंडियन बैंक के अधिकारी है|

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी रूठ गए हैं। संगम के तट पर बने अपने शिविर के सामने ही धरने पर बैठ गए हैं। जिस स्नान को आम आदमी अपना भाग्य समझता है वे उस स्नान को संगम के तट पर बैठ कर भी नहीं कर रहे हैं। शायद भाग्य इसे ही कहते हैं। पिछले 6 दिनों से उन्होंने स्नान नहीं किया है, पहले तो अन्न जल भी त्याग दिया था पर अब खा पी रहे हैं। पता नहीं अपना नित्य संध्यावंदन कैसे कर पा रहे हैं। महाराज जी की सेवा में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दिलो जान से समर्पित होकर लगी है। जिन अखिलेश की सरकार ने उनपर लाठियां बरसाई थीं वे अभी सबसे बड़े खैरख्वाह बने हुए हैं। पुनः जिस कांग्रेस ने कांची पीठ के शंकराचार्य को चलती पूजा में पुलिस से उठवा लिया था वह अभी उनकी शान में कसीदे पढ़ रही है। हम कह सकते हैं कि जिंदगी भी अजीब है पर गिरगिट को शर्मा देने वाले राजनीतिज्ञ खुले में खेल रहे हैं। हमारे शंकराचार्य प्रकांड विद्वान हैं। चारों वेद और 108 उपनिषदों का अध्ययन किया है, दंड धारी हैं, ब्रह्मचारी भी हैं यानी शंकराचार्य की पात्रता की सभी शर्तों को पूरा करते हैं लेकिन एक जगह चूक जाते हैं। अपना अहम नहीं छोड़ पाते हैं। सिर्फ 50 मीटर की दूरी उनको पैदल चलने के लिए कहा गया था पर वे तैयार नहीं हुए। बोले नहीं पालकी से ही जायेंगे। प्रशासन के मन मे मुख्यमंत्री का भी डर था। अभी पिछले ही साल कुम्भ में इसी मौनी अमावस्या के दिन हुई भगदड़ में 35 से ज्यादा श्रद्धालुओं की जान चली गयी थी इस बार वे कोई भी गलती करने के लिए तैयार न थे। धक्का मुक्की हुई बैरियर टूटे तो प्रशासन ने भी प्रतिघात किया। कुछ श्रद्धालुओं की पिटाई हुई तो कुछ को घसीटा गया। पर महाराज जी टस से मस नहीं हुए। जिन शंकराचार्य ने इन पीठों की स्थापना की थी उन्होंने कभी भी अपने लिए पालकी का उपयोग नहीं किया पर ये तो आधुनिक शंकराचार्य हैं वे पालकी छोड़ नहीं सकते। इस मामले में एक दूसरा पहलू भी है। सरकार स्वयं योगी जी नहीं पर अपने मंत्रियों को तो उनका मान रखने के लिए भेज सकते थे। स्वयं भी आकर उनकी यह बाल हठ छुड़वा सकते थे पर यह हुआ नहीं। कारण रहा कथित शंकराचार्य का बड़बोलापन। उन्होंने योगी जी को औरंगजेब कह डाला था। पर फिर भी मेरा मानना है कि पहल होनी ही चाहिए थी। यहां सरकार को अपना तेवर नरम करना चाहिए था। वस्तुतः सरकार के उप मुख्यमंत्री ने शंकराचार्य की चरण वंदना करते हुए उनसे स्नान करने का आग्रह किया था पर सरस्वती जी को यह सब जबानी जमा खर्च लगा अब उनका हठ योगी जी के त्यागपत्र से नीचे शांत नहीं होगा।
वैसे अविमुक्तेश्वरानंद का पिछला रिकॉर्ड कोई साधु का नहीं है। जन्होने राम मंदिर के उद्घाटन तक का विरोध किया था और उसके प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल नहीं हुए थे। वे योगी सरकार केंद्र सरकार पर हमले बोलते ही रहते हैं। 370 का हटना उनको पसंद नहीं आया। योगी उनको योगी नहीं लगते पर उनके लाठी से पिटवाने वाले अखिलेश अभी करीबी बने हुए हैं। अतीक अहमद की हत्या की न्यायिक जांच की मांग कर डाली। गौ रक्षा को मुद्दा बनाने की कोशिश की जबकि यही समाजवादी और कांग्रेसी अटल बिहारी जी के समय मे तन कर विरोध में आ गए थे जब उन्होंने गौ हत्या पर बिधेयक लाने की कोशिश को थी। भारत के सनातन धर्म को बदनाम करने वाले इस महात्माओं की अक्ल को ठिकाने लगाने की जरूरत है। इतने दिनों से सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ याचिका है पर फैसला नही हुआ है। अदालतों की यही कच्छप गति इन जैसे लोगों को प्राण देती है और विवाद सुलझ नहीं पाते हैं। यही विवाद सनातन को उपहास का पात्र भी बनाती है।
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