"चाह से चेतना तक"
पंकज शर्मा
असीम आवश्यकता प्रकृति का स्वाभाविक प्रवाह है, जो हमारे जीवन को संतुलन एवं निरंतरता प्रदान करता है। वह हमें सिखाती है कि जितना आवश्यक है, उतना ही पर्याप्त भी है। हमारी नदियों का बहाव, वृक्षों का फलन, श्वास का आवागमन—सब बिना संग्रह की आकांक्षा के घटित होते हैं। आवश्यकता, जब विवेक से जुड़ी रहती है, तब वह विकास का माध्यम बनती है, बोझ नहीं।
परंतु चाह जब तृष्णा में रूपांतरित होती है, तब चेतना पर धुंध छा जाती है। तृष्णा आत्मा को बाह्य उपलब्धियों में उलझाकर भीतर के सत्य से दूर कर देती है। प्रेरणा इसी में है कि मनुष्य चाह को पहचाने, उसे साधे और उससे ऊपर उठकर चेतना की ओर अग्रसर हो—क्योंकि मुक्त वही है, जो कम में भी पूर्ण को अनुभव कर सके।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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