गयाजी की मिठाइयाँ
डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी'गया' केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक जीती-जागती संस्कृति है जिसे पूरी दुनिया मोक्ष-धाम के रूप में जानती है। यह अपने निवासियों के लिए 'गयाजी' है। इस शहर की पहचान केवल विष्णुपद मंदिर या फल्गु नदी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी असली आत्मा यहाँ की बेमिसाल मिठाइयों, यहाँ की ठेठ बोली 'मगही' और यहाँ की भूल-भुलैया जैसी पुरानी नुकिली गलियों में बसती है। वैसे तो बिहार का खान-पान अपने आप में विशिष्ट है। मिथिला की मेहमानवाजी तीनों लोकों में विख्यात है । लेकिन जब बात गया की आती है, तो यहाँ की पाक-कला एक अलग ही पहचान बनाती है । गयाजी अपनी पारंपरिक और स्वादिष्ट मिठाइयों के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है। यहाँ की मिठाइयाँ न केवल स्वाद में बेहतरीन हैं, बल्कि ये बहुत दिनों तक खराब भी नहीं होतीं। ये मिठाइयाँ केवल चीनी और मावे का मिश्रण नहीं हैं; वे मौसम, परंपरा और कारीगरी का संगम हैं।मौसम के अनुसार यहाँ का स्वाद भी बदलता रहता है ।
वैसे तिलकुट को गयाजी की आत्मा कहा जाता है ।सचमुच गयाजी की पहचान अगर किसी एक खाद्य पदार्थ से होती है, तो वह है 'तिलकुट'। यह केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि गया की सर्दी का 'सिग्नेचर' है। जैसे ही अक्टूबर-नवंबर की हल्की ठंड दस्तक देती है, गया की 'रमना रोड', 'टेकारी रोड' और 'कोयरी-बारी' जैसे इलाकों में एक विशेष ध्वनि गूंजने लगती है—"धम... धम... धम"। यह आवाज उन कारीगरों के हथौड़ों की होती है जो तिल और चीनी/गुड़ के मिश्रण को कूट-कूटकर उसे एक खस्ता रूप दे रहे होते हैं।
गया का तिलकुट मशीन से नहीं बनता ,हाथ की कुटाई ही इसकी खूबी है। गरम चाशनी में भुने हुए तिल को मिलाया जाता है और फिर उसे तब तक कूटा जाता है जब तक कि वह बिल्कुल हल्का और भुरभुरा न हो जाए। गया के तिलकुट की विशेषता उसका 'खस्तापन' है। इसे मुंह में डालते ही बिना दांतों की मेहनत के यह घुल जाता है।
यहाँ दो प्रकार के तिलकुट मिलते हैं—चीनी वाला (सफेद) और गुड़ वाला (सुनहरा/भूरा)। गुड़ वाले तिलकुट में सोंधापन होता है जो गाँव की मिट्टी की याद दिलाता है, जबकि चीनी वाला तिलकुट अपनी चमक और कुरकुरेपन के लिए प्रसिद्ध है।
यह मकर संक्रांति का राजा कहा जाता है ।14 जनवरी (मकर संक्रांति) के दिन गया गयाजी का तिलकुट विशेष रूप से खाया जाता है। वैसे तो गया का रमना रोड तिलकुट के लिए बहुत प्रसिद्ध है,लेकिन अब इसका स्थान टिकारी रोड ने ले लिया है ।
गया का तिलकुट मशीन से नहीं बनता। इसकी खूबी ही इसकी हाथ की कुटाई है। गरम चाशनी में भुने हुए तिल को मिलाया जाता है और फिर उसे तब तक कूटा जाता है जब तक कि वह बिल्कुल हल्का और भुरभुरा (Crispy) न हो जाए। गया के तिलकुट की विशेषता उसका 'खस्तापन' है। इसे मुंह में डालते ही बिना दांतों की मेहनत के यह घुल जाता है।
यहाँ दो प्रकार के तिलकुट मिलते हैं—चीनी वाला (सफेद) और गुड़ वाला (सुनहरा/भूरा)। गुड़ वाले तिलकुट में सोंधापन होता है जो गाँव की मिट्टी की याद दिलाता है, जबकि चीनी वाला तिलकुट अपनी चमक और कुरकुरेपन के लिए प्रसिद्ध है।
यह मकर संक्रांति का राजा कहा जाता है ।14 जनवरी (मकर संक्रांति) के दिन गयाजी का तिलकुट विशेष रूप से खाया जाता है। वैसे तो गया का रमना रोड तिलकुट के लिए बहुत प्रसिद्ध है,लेकिन अब इसका स्थान टिकारी रोड ने ले लिया है ।
देश-विदेश में बसे गयावासी अपने रिश्तेदारों से 'गया का तिलकुट' मंगवाना नहीं भूलते। यह केवल मिठाई नहीं, एक भावना है जिसे 'सौगात' के रूप में भेजा जाता है।
दूसरा प्रसिद्ध मिठाई है अनरसा
अनरसा शाही स्वाद का प्रतीक माना जाता है।
तिलकुट अगर राजा है, तो 'अनरसा' गया की मिठाइयों का वजीर है। सावन और भादो के महीनों में जब बारिश की फुहारें पड़ती हैं, तब अनरसा का असली स्वाद निखरता है।
यह चावल के आटे, तिल, चीनी और खोया (मावा) से बनता है।
अन्य जगहों का अनरसा चावल के आटे, सफेद तिल और चीनी का बना होता है । इसका आकार चिपटा होता है ।पहले यहाँ भी देहातों में ऐसा ही अनरसा मिलता था ।परंतु गयाजी के अनरसे का स्वाद कुछ और ही होता है । यह चावल के आटे, तिल और चीनी के खोल में मावा भरकर बनाया जाता है ,इसलिए ऊपर से कुरकुरा और अंदर से नरम होता है। खोया भरा अनरसा यहाँ बहुत प्रसिद्ध है।यह वर्षात के दिनों का विशेष संदेश है ।लेकिन इसे लंबे समय तक स्टोर नहीं किया जा सकता ।
जब आप इसे तोड़ेंगे तो अंदर से निकलती भाप और खोये की महक आपको मंत्रमुग्ध कर देगी ।
लाई
सादगी में मिठास देखना हो तो गयाजी की लाई का क्या कहना ! यह गर्मी के मौसम के लिए बहुत मशहूर है। यह यह मुख्य रूप से चीनी और खोया मिलाकर बनाई जाती है जो खाने में बहुत रसीली और मुलायम होती है ।गर्मी की शाम में लाई भंडार की रामदाने की लाई जब केवड़ाजल छिड़क कर परोसा जाता है तो उसके आगे छप्पन भोग तुच्छ लगता है । गया में लाई मुख्य रूप से दो चीजों की बनती है—'खोभी' (एक प्रकार का फूला हुआ चावल जैसा दाना) और 'रामदाना'। खोभी की लाई आकार में बड़ी और चपटी होती है, जो गुड़ की चाशनी से बंधी होती है। यह बहुत ही हल्की और सुपाच्य होती है ।
पेड़ा
गया जी का केसरिया पेड़े का क्या कहना !यहाँ का केसरिया पेड़ा भी बहुत प्रसिद्ध है। यह शुद्ध दूध (खोया) और केसर से बनाया जाता है। गया के पास टेकारी और हिसुआ का पेड़ा भी काफी लोकप्रिय है। वैसे निश्चलगंज का पेड़े को मगध की शान कहा जाता है ।
हालांकि पेड़ा देवघर का भी प्रसिद्ध है, लेकिन गया के विष्णुपद मंदिर के आसपास और 'टेकारी' का पेड़ा (केसरिया पेड़ा) अपना अलग स्थान रखता है। यह पेड़ा सूखा और दानेदार होता है।इस पेड़े का स्वाद अद्भुत होता है ।एकबार खा लेने पर मन बार बार खोजता है ।
लौंगलत्ता
गया के पून साव का लौंगलता मुँह में नहीं फूटा तो गया आना सार्थक बहीं माना जाता । यह बिहार की सबसे पसंदीदा और रसीली मिठाइयों में से एक है। गया में इसे बहुत शौक से खाया जाता है। यह रसीली और मीठी होती है।इसके बाहरी आवरण को मैदे से बनाया जाता है। इसके अंदर खोया (मावा), चीनी और मेवे का मिश्रण भरा जाता है।
मैदे की परत को मोड़ा जाता है, तो उसे खुलने से रोकने के लिए बीच में एक लौंग लगा दी जाती है। इसी कारण इसका नाम 'लौंगलता' पड़ा।
इसे घी में तलने के बाद चाशनी में डुबोया जाता है। यह बाहर से कुरकुरी और अंदर से रस से भरी होती है। अगर आप इसे गरमा-गरम खाएँ, तो इसका स्वाद दोगुना हो जाता है।
खाजा:
गया का 'खाजा' (सिलाव के खाजा के समान ही, लेकिन अपनी शैली में) अपनी परतों और रसभरी बनावट के लिए जाना जाता है।
खाजा मैदे को घी में लपेट कर बार बार बेला जाता है ,इससे इसपर कई परतें आ जाती हैं । पहले यह सिर्फ मीठा ही होता था परंतु अब तो यह खाजा
नमकीन भी बनने लगा है
. नाश्ते की संस्कृति: कचौड़ी, जलेबी
गया की मिठाइयों की चर्चा तब तक अधूरी है जब तक यहाँ के नमकीन और मीठे नाश्ते की बात न हो। गया की सुबह की शुरुआत 'कचौड़ी सब्जी' और 'जलेबी' से होती है। यहाँ की जलेबियाँ मोटी और रसीली होती हैं।कचौड़ियाँ कई प्रकार की बनती हैं । सादी कचौड़ी घुघनी (चने की शब्जी) के साथ परोसी जाती है तो कहीं सत्तु भरकर ,कहीं दाल भरकर ,कहीं आलू भरकर -तरह तरह के श्वाद वाली मिलेती है ।
सत्तू
दोपहर के समय 'सत्तू का शरबत' गया जी की दुपहरी वाली गरमी का पर्याय है ।हरेक चौक - चौराहे पर चरपहिया ठेले पर लाल चुनरी ओढ़े बड़े बड़े घड़े में पानी भरे सत्तुवाले मिल जाते हैं । सत्तु मे कई प्रकार के नमक ,नीबू का रस ,मिर्चा और यह पूछ कर -प्याज डालेळ नऽ ,प्याज के टुकड़े भी डालते हैं ।इससे यह शर्वत स्वादिष्ट तो होता ही है , गरमी के लिए स्वास्थ्यरक्षक भी हो जाता है ।
'लिट्टी-चोखा'
यहाँ के स्ट्रीट फूड लिट्टी चोखा है। गया की लिट्टी को कोयले की आँच पर सेककर, घी में डुबोकर, बैंगन के चोखे और हरी मिर्च की चटनी के साथ परोसा जाता है ।आज के फास्ट फूड को मुँह चिढ़ाता यह स्वाद ही गया का असली स्वाद है। लिट्टी खाने में कुरकुरा तो लगता ही है ,नए खाने वाले आश्चर्य करते हैं कि सत्तु इस गोलाकार में कैसे अन्दर चला गया । लेकिन आजकल गया जी में दक्षिण भारतीय व्यंजन ,जैसे -इडली ,मोमो,मसालडोसा आदि भी प्रचूरता से मिलने लगे हैं ।
पीठा
पीठा एक प्रसिद्ध मगही भोजन है जो पूष के दिनों में बनाया जाता है ।नए चावल के आँटे में तिल - गूड़ भरकर ,आलू का मसालेदार चोखा भरकर,दाल को शब्जीनुमा स्वादिष्ट बना भरकर ,खोवा आदि भरकर बनाया जाता है ।इसे वाष्प में सिद्ध किया जाता है ।मगही पीठा का स्वाद ऐसा होता है कि एकवार खाने के बाद रसना रोज - रोज मांगती है ,लेकिन इसके लिए फिर एक वर्ष तक इंतजार करना पड़ता है ।
खिचड़ी - चोखा
गया की खिचड़ी पहले बहुत प्रसिद्ध थी लेकिन इसे राष्ट्रीय पहचान मिल जाने से इसपर गया का अधिपत्य नहीं रहा । गया की खिचड़ी मैं चाबल की आधी मात्रा दालों की होती है ।दालों में मसूर ,मूंग,उरद ,कुलथी के अतिरिक्त अरहर भी होती है ।इनके अतिरिक्त सामयिक शब्जियाँ ;जैसे -गोभी,मटर, गाजर ,कद्दु(लौका) आदि होता है । लोक कहावत के अनुसार -
खिचड़ी के चाय इयार
चोखा पापड़ घी अँचार ।
का होना अनिवार्य होता है ।ऊपर से गाय का शुद्ध घी आवश्यक होता है ।इसका सीधा सा अर्थ है कि गया लोग मिठाइयों के साथ साथ नमकीन -जायकेगार व्यंजनों के भी शौकीन होते हैं ।
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