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दादाजी का हरा-भरा रहस्य

दादाजी का हरा-भरा रहस्य

सत्येन्द्र कुमार पाठक
गरमी की छुट्टियाँ थीं और सारे बच्चे दादाजी के गाँव में इकट्ठे हुए थे। शहर की भागदौड़ से दूर, गाँव का दालान उनकी पसंदीदा जगह थी। शाम होते ही, दादाजी अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर बैठ जाते और बच्चे उनके इर्द-गिर्द सिमट जाते। आज भी ऐसा ही था।
दिव्यांशु, आठ साल का, दादाजी की गोद में आराम से लेटा था, जैसे वह दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना हो। तीन साल का नटखट प्रियांशु दादाजी के गले में बाँहें डाले, अपनी तोतली बातें सुना रहा था। वहीं सात साल का शशांक और ग्यारह साल की आंषिका दादाजी से ढेरों सवाल पूछने को तैयार बैठे थे। सबसे छोटी, दो साल की बुच्चन, अक्सर दूर कहीं अपने खिलौनों में मगन रहती थी, पर आज वह भी कुछ खास करने वाली थी।
"दादाजी," आंषिका ने बात शुरू की, "आज स्कूल में हमने पढ़ा कि पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं। पर यहाँ तो इतने सारे पेड़ हैं, हमें इनकी चिंता क्यों करनी चाहिए?"
शशांक ने भी सिर हिलाया, "हाँ दादाजी, और हमारे घर में तो नल से कितना सारा पानी आता है, फिर सब लोग कहते हैं पानी बचाओ, पानी बचाओ। नदियाँ क्यों सूख रही हैं?"
दादाजी मुस्कुराए। उनकी आँखों में बच्चों के लिए असीम प्यार और उनके सवालों के लिए गर्व था। "मेरे नन्हें जिज्ञासुओं," उन्होंने प्यार से कहा, "पेड़ और नदियाँ सिर्फ धरती के लिए ही नहीं, बल्कि हमारे लिए भी बहुत ज़रूरी हैं। सोचो, अगर जंगल न हों तो बारिश कैसे होगी? बारिश नहीं होगी तो नदियों में पानी कहाँ से आएगा? और पानी नहीं होगा तो हम क्या पिएंगे, खेती कैसे करेंगे?"
प्रियांशु ने बीच में ही कहा, "हमारा आम का पेड़ कितना अच्छा है, दादाजी! उस पर कितने मीठे-मीठे आम लगते हैं!"
"बिल्कुल सही कहा मेरे राजा," दादाजी बोले, "और सोचो, अगर आम का पेड़ न हो तो हम मीठे आम कैसे खाएँगे? पेड़ हमें फल देते हैं, सब्ज़ियाँ देते हैं, ठंडी हवा देते हैं और सबसे ज़रूरी, साँस लेने के लिए शुद्ध हवा देते हैं।"
तभी, बुच्चन धीरे-धीरे दादाजी की ओर बढ़ी। उसके एक छोटे से हाथ में एक मिट्टी से सना हुआ गमला था, जिसमें एक छोटा सा पौधा लगा था, और दूसरे हाथ में थोड़ी सी गीली मिट्टी। वह मुश्किल से अपना संतुलन बनाए थी। अपनी तोतली आवाज़ में वह बोली, "दादजी... देखो! ये... ये पौधा... पानी दो ना!"
दादाजी की आँखें खुशी से चमक उठीं। उन्होंने बुच्चन को गोद में खींच लिया। बुच्चन ने अपना छोटा सा पौधा और मिट्टी दादाजी को दिखाते हुए कहा, "मैंने... मैंने लगाया... दादाजी... बड़ा होगा?" पूरा दालान बच्चों की खिलखिलाहट से गूँज उठा। दादाजी ने प्यार से बुच्चन के गाल पर हाथ फेरा और बाकी बच्चों की ओर देखते हुए बोले, "देखो बच्चों, ये नन्हीं बुच्चन हमें कितनी बड़ी बात सिखा रही है। हर पौधा एक उम्मीद है। हर बूंद पानी एक जीवन है।" उन्होंने समझाया, "जितना प्यार और देखभाल हम इस छोटे से पौधे को देंगे, उतना ही यह बड़ा होगा और हमें फल-फूल देगा। ठीक वैसे ही, हमें अपनी धरती माँ का ख्याल रखना चाहिए। पेड़ लगाने चाहिए, पानी बचाना चाहिए और नदियों को साफ रखना चाहिए।" आंषिका और शशांक को अपनी बात का जवाब मिल गया था। दिव्यांशु और प्रियांशु भी बुच्चन के नन्हे पौधे को बड़े ध्यान से देख रहे थे। दादाजी को लगा जैसे आज उन्हें विश्व की सारी खुशियाँ मिल गई हों। उनके बच्चे सिर्फ सवाल ही नहीं पूछ रहे थे, बल्कि उन सवालों के जवाबों को अपनी छोटी-सी दुनिया में उतारने को भी तैयार थे। उन्हें विश्वास हो गया कि उनकी विरासत – प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान – इन नन्हें हाथों में सुरक्षित है। यही तो था दादाजी का सबसे बड़ा और हरा-भरा रहस्य!


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खुशियों का दालान
दादा की गोदी प्यारी, खुशियों की है फुलवारी,
दालान सजा है बच्चों से, छाई है रूनक भारी।
नन्हे हाथों में है माटी, मन में ज्ञान की प्यास,
पेड़, परिंदे, नदियाँ प्यारी, जीवन का विश्वास।
गोद में लेटे दिव्यांशु जी, दादा का दुलार पाते,
कंधे पर प्रियांशु बैठे, मीठी बातें सुनाते।
आंषिका और शशांक पूछें, "नदियाँ क्यों हैं बहती?"
दादा जी मुस्काकर बोलें, "धरती हमसे ये कहती-
पेड़ लगाओ, जल को बचाओ, जीवन को महकाओ।"
डगमग चलती बुच्चन आई, लेकर नन्हा पौधा,
एक हाथ में मिट्टी उसके, मन में कोमल श्रद्धा।
तोतली बोली में वो कहती, "दादा! जल है लाना,
प्यासा पौधा छोटा सा मेरा, इसको हरा बनाना।"
देख के बच्चों का ये प्रेम, दादा जी निहाल हैं,
सारे जग की खुशियाँ पाईं, धन्य ये भविष्य काल है।


( सीख: बड़ों का स्नेह और प्रकृति के प्रति बच्चों का जुड़ाव ही एक सुंदर समाज की नींव रखता है। )




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