भीड़ में भी मन अकेला
अरुण दिव्यांशआया तो था मैं अकेला ,
यहाॅं मिला मानव मेला ।
मेले में भी है ठूसमठूसी ,
भीड़ में भी मन अकेला ।।
बाहर देखा मानव मेला ,
अंदर में विचार का खेला ।
मन दिल का मल्लयुद्ध ,
विचारों का है ठेलमठेला ।।
एक मंदिर में मन व दिल ,
मंदिर में विचार रेलमरेला ।
विचारों का भी होता भीड़ ,
भीड़ में भी मन अकेला ।।
मन दिल विचारों का दौर ,
छिड़ता मन दिल में बहस ।
जीत जाता जब यह दिल ,
फैसला मिलता है सरस ।।
विचारों के इस भीड़ में ,
मन पड़ गया ये अकेला ।
सोच समझ कर है चलना ,
जब आए युवा का बेल ।।
बत्तीस दाॅंत के बीच यह ,
जीभ हो जाता है अकेला ।
विचारों के इस दौर में भी ,
यह मन न बनाया चेला ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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