जिन्दगी की धूप में
डॉ रामकृष्ण मिश्रजिन्दगी की धूप में
जलता रहा यौवन
जो दिखा वह अर्ध-
मूर्छित- सा ,बुझा सा- मन।।
क्या पता कब साँस का
इतिहास मुह खोले।
विकृति की अधिवर्जना
पर भी जरा बोले।।
हवा में भी नाभि तक
संवेदना होती।
तड़फडा़ता है तभी
आकाश का आँगन।।
चतुर्दिक मँडरा रहे
विष- व्याल से जो लोग
ढूँढ़ते हैं दंश के सुंदर
अकारण योग।
कौन पर है अपर किसको
कहा जा सकता।
सब हमारे साथ हैं
बस दृश्य के पावन।।
कहाँ तक फैली रहेगी
शोख विकृतियाँ
मुस्कुराने की जगह
खो गयीं सुकृतियाँ।।
वेदनाएँ छीजती हैं
भाव का आवेग
मुखौटों में भी छिपा रहता नहीं आनन।।
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