बेटी का घर कौनसा है
कहते है कि बेटी का मायका माँ से ही होता है। पहले भी कहते थे और आज भी कहा रहे है सिर्फ बदला है तो कहने का अंदाज। यदि घर में बेटी का जन्म हो जाए तो कुछ लोग इसे लक्ष्मी पार्वती दुर्गा और भी नामों से पुकारते है और कुछ लोग लड़की को बोझ और हेय की दृष्टि से देखते है और कोसते है। पर एक बात पहले भी सभी कहते थे और आज भी कह रहे है की बेटी तो पराया धन होती है। ये प्रश्न मुझे बहुत ही चुभता है इसलिए आज मैं इस विषय को लेकर लिख रहा हूँ। भरे पूरे और आज के पड़े लिखे परिवार में जन्म लेने पर भी बेटी को पराया धन कहना क्या उचित है? हमारा अपना खून होकर, जो हमारे साथ 20-25 सालों तक रहने के उपरांत भी हम उसे घर में पराया धन कहते हुए कई मौको पर बोलते है क्या आप इस बात से सहमत है की वो आपका खून होकर भी पाराई है और बेटा कुल का दीपक है। इतिहास भी गवाह है की माँ बाप और भाईयों की रक्षा में बहिन बेटियों ने अहिम भूमिका निभाई है। आज का और पहले का समाज आधुनिक युग को तो अपना रहा है परंतु बेटियों के बारे में अपनी सोच नहीं बदल पाया है, बाकी तो सब कुछ बदल गया है। माँ बाप बेटे बहू एक साथ हर अंदाज में रहते हुए सुख शांति की बाते करते है। परंतु व्यवहारिक जीवन में सच्ची बात से मुँह मोड़ लेते है। क्या माँ बाप और भाई का फर्ज बेटी की शादी होने तक अपना होता है, और फिर पराया क्या। एक बेटी की पीढ़ा को क्या कोई कभी समझ पाया है की जन्म आपके कुल में लिया फिर भी आप उसे पराया कहते है और तू तो किसी की अमानत है हमारे घर में ये कहते है। आपने कभी सोचा की ये बातें आपकी बेटी को कितनी चुभती होंगी, पर वो अपने मुख से ऊफ तक नही करती और आप सभी के सुख दुख की भागीदार बनती है। जब तक घर में रहती है घर एक मन्दिर की तरह रहता है, दादी दादा माँ बाप भाई आदि का ख्याल कितना रखती है पर फिर भी वो पराई ही है। जबकि वो दो कुलों को सभालती है शादी के पहले माँ बाप का और बाद मे पति का, फिर भी उसे दोनों कुलों के लोग पराया घन ही कहते है। सुसराल में सभी कहते है पराये घर से आई है, मायके में कहते है की पराया घन है। अखिकार क्या बेटी का खुद का कोई घर द्वारा होता है या नहीं। हर पीढ़ा को सहती है फिर भी ऊफ नहीं करती। क्या बेटियों के भाग्य में सिर्फ ये पराया धन शब्द ही लिखा है। अखिकार हमारा ये आधुनिक और वैज्ञानिक समाज क्या बेटियों के बारे में पूर्व वाली ही विचारधारा रखता है या उसे बेटे के जैसा समझने के बारे में अब सोचता है। आपके विचार और राय का हमें इंतजार रहेगा, की बेटी ही हमारा बेटा है उसे पराया धन न कहकर दो कुलों का कर्तव्य और दयितव्य कहे जो दोनों कुलों में अपनी अहिम भूमिका निभाती है और दोनों घरों को अपना समझती है। एक खानदान को कुल दीपक देती है तो एक को लक्ष्मी का रूप।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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