होते हैं गुनाह यूँ ही, अक्सर इस जमाने में,
उम्र बीत जाती है, किसी रूठे को मनाने में।खो जाती हैं खुशियाँ, इसी जद्दोजहद में,
फूलों का कत्ल हुआ, पत्थर को बचाने में।
इश्क़ के जाल में फँसते देखा मासूमों को,
भोली सूरत पर मर जाते हैं लोग अन्जाने में।
मेरी वफ़ा पर उन्हें यक़ीं, अब तक न हुआ,
उम्र बिता दी ज़ालिम ने, हमें आज़माने में।
सोच समझ पहचान कर किसी को आश्रय देना,
अक्सर धोखा मिलता है ग़ैर को अपनाने में।
पर्यावरण के पैरोकार जो बने फिरते हैं,
वृक्षों को काट डालते हैं, घर सजाने में।
अ कीर्तिवर्धन
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