Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

सूने घर राह देखते अपनों की

सूने घर राह देखते अपनों की

सूनी पड़ी हवेलियां अब जर्जर सी हुई वीरान 
राह देखती अपनों की सब गलियां सुनसान 

वो भी क्या लोग सब दरियादिली में जीते थे 
ठाठ बाट शान निराली घूंट जहर का पीते थे 

दो पैसे ना सही मन में प्रेम का सिंधु उमड़ता था 
आपस में था प्रेम सलोना दिनों दिन बढ़ता था 

वक्त ने करवट बदली जब सब चले गए परदेस 
घर हवेली सब सुने हो गये पीछे छूटा प्यारा देश

पलक पावडे बिछा आज तकती राहें अपनों की 
कब आएंगे वारिस मेरे सारी बातें कोरी सपनों सी

खंडहर सी हालत हुई ना जाने कहां वो खो गए 
धन की लालसा ले गई अब परदेसी वो हो गये

जो जमीन से जुड़े हुए कभी कभार आ जाते थे 
हवेली के दरवाजे भी खुश होकर खुल जाते थे 

नई पीढ़ियों को अब तो शहरों की रंगत भा गई
 दुर्दशा में मकान पड़े अपनापन महंगाई खा गई

रमाकांत सोनी सुदर्शन
नवलगढ़ जिला झुंझुनू राजस्थान
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ