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हेराइले गुण चाहे मरले गुण

हेराइले गुण चाहे मरले गुण:-श्री ज्योतिन्द्र मिश्र

माँ की यह कहबी थी । अक्सर अपनी पारिवारिक अहमियत को समझाने , विशेषकर बाबूजी की उपस्थिति में यह फकरा हारी हुई मनः स्थिति में बोलती थी ।परिवार में यही सब सुनते समझते मैं भी जबान हुआ था । इसी भाव भूमि को मैंने आगे चलकर जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल में यूँ सुना और समझा :-

मिल जाये तो माटी है
खो जाए तो सोना है
मानव जीवन के इस सहज मनोविज्ञान ने फिलवक्त रोजमर्रे में शामिल नींबू को सोना बना दिया है । कभी प्याज गायब तो कभी नींबू लापता। जब चीजें गायब हो जाती है तब उसकी आदत और कीमत समझ मे आने लगती है । तब उस खोई हुई चीजों का , चूक गए अवसरों का , टूट गयी सांसों का मलाल होने लगता है । जब तक ये पास में रहें ,साथ में रहें , आपकी चर्या में रहें आप इनकी इज्जत नहीं करते ।आपको इनके अनुपस्थित हो जाने का जरा भी अनुमान नहीं होता । अपुन के लिए तो ये दोनों गद्य और पद्य की तरह हैं । इनकी अनुपस्थिति हमे असहिष्णु होने को विवश करता है । जी चाहता है देश ही छोड़ दूं। कभी मादा वादी सरकार में गद्य गायब तो वादा वादी सरकार में पद्य का पलायन । कौन बुद्धिजीवी रहना चाहेगा गद्य और पद्य के बिना । गद्य में जहां परत दर परत प्याज की तरह कहानियां गढ़ने का सुख है वही नेमुआ ने तो पद्य के श्रृंगार रस में अपना भरपूर स्पेस बनाया है । उन्नत होते उरोजों को नेमुआ उठान से उपमा देने में कौन ऐसा कवि होगा जो चूक गया होगा । ऐसे नेमुआ को छूने का सुख , तोड़ने का सुख और निचोड़ने का सुख किस नव सिखुआ कवि को नहीं मिला होगा । आप अगर बचपन में नीमू तोड़ने में असफल रहे हों तो यकीन मानिए आप कितना भी छंद ज्ञान भेजे में भर लीजिये । नेमुआ वाला रस के अभाव में आपकी कविता रसहीन ही रहेगी।
इस नींबू के लिए बचपन में अपुन ने भी बड़ा रिस्क उठाया था । सातवी में मिडिल स्कूल दिग्घी में पढ़ते थे । स्कूल परिसर में नींबू का पेड़ था । गुच्छा का गुच्छा लटका रहता था । कांटे भी थे ।ठाकुर साहब के बेटे द्वय को तोड़ते हुए देखा तो मेरी भी लालच बढ़ गयी। मैंने भी आठ दस तोड़ कर हाफ पैंट की धोकड़ी भर ली। बड़े मजे से घर चला गया । दूसरे दिन स्थानीय भूतपूर्व जमींदार ठाकुर महेश्वरी प्रसाद सिंह जी ( अब स्वर्गीय ) ने अपने सुपुत्र द्वय के बयान पर मेरे विरुद्ध नींबू चुराने का आरोप दायर कर दिया । तब दिग्घी में पुलिस फाँरी ( शिविर) हुआ करती थी जिसमे एक जमादार और पांच बंदूकधारी रहा करते थे। आरोप तो मुझ पर गठित था लेकिन केयर ऑफ गार्जियन में मेरे बड़े बाबूजी का नाम था। कांटे की चुभन अब महसूस हुई। थाना में हम दोनों हाजिर हुए । नाबालिग मानकर केवल उठा बैठी कराई गई । बड़े बाबूजी से हलफनामा लिखाया गया कि आइंदा उनका भतीजा नींबू नहीं तोड़ेगा । शिविर के जमादार साहब ने समझाया कि मिडिल स्कूल कमिटी के वे सर्वे सर्व हैं । उनकी कृपा के बिना कोई टीचर बहाल नहीं होता । यह पूरा कैम्पस उन्हीं के आधीन है इसलिए तुम नींबू नहीं तोड़ सकते हो । आइंदा ऐसा करोगे तो हाजत में बंद कर दूंगा।
खैर , जो हुआ सो हुआ । लेकिन नींबू की लत कहाँ छूटने वाली।
लगी रह गयी । नींबू में बहुविध सुख है महाराज। अनिर्वचनीय आनन्द है प्रभु । इसके कई प्रकार हैं । नेपाली नींबू , कागजी नींबू, जमेरी नींबू , गगरा नींबू । अब आपको जो पसंद हो ।संतरा भी नींबू की आभिजात्य गोत्री है।
मध्यम वर्गीय जन गण को कागजी ही भाता है । मिथिला के मीन भक्षी जमेरी पर कुछ ज्यादा ही फिदा है । माछेर झोल में जमेरी की दो चार बूंद उन्हें परमानंद को उपलब्ध करा देता है ।।
लेकिन लेमन टी वाले बुद्धिजीवियों को तो कागजी ही चाहिए ।
जब से देशी चिकित्सकों ने दूध की चाय न पीने की सलाह दे डाली तब से नैतिक परहेज के लिए नींबू की चाय को ही मॉर्निंग टी में शामिल कर लिया । सेवा मुक्त होने पर तो हर ओहदेदार ले मैन हो जाता है ।इसलिए ले मैन के लिए ले मन टी ही एकमात्र सहारा है। पिछले दो महीने से जब मोहतरमा यह कह कह कर मूड खराब कर देती हैं कि नींबू नहीं है तो जी करता है अभी देश छोड़ कर चला जाऊँ या फिर आत्म हत्या ही कर लूँ । बताइए जनाब यह कोई देश है ? इस नींबू के लिए हम जेल जाते जाते बचे । पिता की प्रतिष्ठा गई । बच्चों की खातिर दूध की चाय छोड़ दी । हम एक कप लेमन टी भी नहीं ले सकते ।आखिर क्या कर रही है सरकार । कहाँ ले गई नींबू । पता ही नहीं चलता कि नींबू कौन तोड़ रहा है ।कौन निचोड़ रहा है । यह तो ऐसा देश है साहब कि नजर दोष से बचाने के लिए अपने अपने दरबाजे पर हम सात सात नींबू और मिर्ची लटका देते थे । बाबा का बुलडोजर भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता था । आखिर ई नेमुआ गई कहाँ । सारे निचोड़ निपुण टी व्ही चैनल भी चुप हैं।इस खामोशी का कारण क्या है । कोई तो बताओ ।चुप क्यों हो । इस महामौन के पीछे कोई राज है क्या ??
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