ऋषि आस्तीक की शिक्षा
हमारी भारतीय शिक्षा ऋषियों की तपस्या से उद्भुत नवनीत है। इसका संबंध धर्म एवं आचरण से जुड़ा हुआ है ।यह आचरण एवं धर्म सुखमय जीवन एवं मंगलमय राष्ट्र की चेतना स्थापित करते है ।ॠषि मंत्रों के द्रष्टा हुआ करते थे ,इससे मंत्रों के अक्षरों, वर्णों एवं उच्चारण के प्रभाव को देखा भी था और समझा भी था ।यह परंपरा से चली आ रही विद्या आज भी उसी रूप में स्थापित है । कमी है साधकों की,जिसके कारण शिक्षा ने आज अपना रूप-स्वरूप बदल लिया है और अर्थ -व्यवहार से ऐसा चिपक गया है कि जीवनदायिनी शिक्षा जीवननिर्वाहिनी शिक्षा हो गई है। शिक्षा के नाम मात्र के दर्शन से लोग अपने आप को धन्य धन्य कर रहे हैं ।शिक्षा हमें विनीत बनाती है, मानव एवं अन्य प्राणियों के असली रूप को दर्शाती है ,जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कराती है ।
लेकिन आज -
मातु-पिता बालकन्ही बुलावहीं।
उदर भरै सोई धर्म सिखावहीं॥ ने ऐसा जड़ पकड़ लिया है कि ॠषियों के ज्ञान और उनकी शिक्षा की आत्मा तड़प रही है ।उसी ऋषि परंपरा के जगदालु और मानसा के पुत्र नाग लोक के महाबली ऋषि थे -आस्तीका। महा विषधारी तक्षक उनके मामा हुआ करते थे ।मानसा नागकन्या थी जो गर्भावस्था में ही कैलाश चली गई थी। भगवान शंकर ने उसे ज्ञान उपदेश दिया था जिसके कारण इनका नाम आस्तिक पड़ा ।इन्होंने गर्भावस्था में ही उस उपदेश को ग्रहण किया था और बाद में सामवेद की शिक्षा भार्गव ऋषि से तथा मृत्युंजय मंत्र की शिक्षा भगवान शंकर से ली। शिक्षा समाप्त कर अपनी माता के साथ पुनः अपने आश्रम में लौट आए। इधर जन्मेजय महाराज ने अपने पिता महाराज परीक्षित के सर्पदंश से मृत्यु के कारण सभी सर्पों को मारने हेतु नागदाह यज्ञ आरंभ कर दिया ।जगतकारु ने अपने भाई तक्षक को बचाने के लिए अपने पुत्र आस्तिक से सहायता मांगी। ऋषि आस्तीक ने जन्मेजय महाराज के पास जाकर अपनी मधुरी बाणी से उन्हें मोह लिया ।प्रसन्नतावस उन्होने ॠषि आस्तीक से वरदान मांगने को कहा ,परन्तु ॠषि ने वरदान समय पर मांगने की बात कही। यज्ञ तो निर्बाध गति से चल ही रहा था ।कार्कोट नामक एक सर्प ने शिव की आराधना आरंभ कर दी और महाकाल राजा के पास जाकर उनसे अपनी रक्षा की गुहार लगाई । महाकाल आशुतोष हैं, इसलिए उन्होने कार्कोट को बचा लिया । इधर तक्षक देवराज इद्र के शरण में चला गया ।इससे मंत्रों का प्रभाव उन पर नहीं पड़ रहा था ।महाराज ने इसका कारण ॠत्वीकों से पूछा तो उन्होंने बताया कि वह इंद्रासन से इस प्रकार चिपका हुआ है कि इन्द्रासन हिल जाने के बाद भी वह उसे छोड़ नहीं रहा। तब राजा ने इंद्रासन सहित आवाहन करने की आज्ञा दी ।तब ऋत्वीकों ने इंद्र सहित तक्षक को मंत्र के प्रभाव से बुला लिया, परंतु कोई उपाय नहीं देख महाराज इंद्र ने तक्षक को अपने उत्तरीय में से निकालकर पुनः लौट गए। तक्षक अग्निकुंड में गिरने ही वाला था कि उसी समय महर्षि आस्तीक ने जन्मेजय से वरदान मांग लिया -नागदाह यज्ञ बंद कराया जाए ।राजा पूर्व से ही प्रतिबद्धित थे, इसलिए उन्होंने नागदाह यज्ञ को बंद करवा दिया और तक्षक सकुशल लौट गया । यह नागदाह यज्ञ आज के महाराष्ट्र के नागदा में हुआ था ।
भारत में यह नाग मंत्र की परंपरा इतनी गंभीर रही है कि मंत्रों के प्रभाव से सर्पों के बिष को समाप्त किया जाता था ,आज भी वह परंपरा कहीं न कहीं जवित है। प्रमाण तो यहां तक है कि 27 घंटे पूर्व मृत घोषित सर्पदंशी को बचाया जा सका है ।अब इस मंत्र की परंपरा प्रायः लुप्त हो रही है । यह प्राचीन परंपरागत शिक्षा के लिए संक्रांति काल है जबकि बाहर विदेशों में यह मंत्र पनप रहा है ,यह शिक्षा वहां उत्कर्ष पा रही है ।कई लोग ऐसे आज भी हैं जो हाथ की तलहथी को पृथ्वी पर रगड़ कर बता देते हैं कि अमुक व्यक्ति को सांप ने दंशित किया है या नहीं या सिर्फ भ्रम भय ही है । अगर किया है तो विष की मात्रा कितनी है आज इस परंपरागत शिक्षा को पुनः जीवित करने की आवश्यकता है और युवकों को इसमें आगे बढ़कर हाथ बढ़ाना चाहिए
डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी
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