कर्मफल
झूठे शान में दांत निपोते हैं।
पर अंदर ही अंदर रोते हैं
अपने कर्मों का फल पाते हैं।
साथ किसी का मिलता नहीं,
सब से जुदा जुदा वो रहते हैं।
चित्रगुप्त उलटते जब पन्ने खाते के,
निकलते जाते साक्ष्य पापों के।
तुम पापी हो, बड़ा आत्मघाती हो,
सज्जनता के बलात्कारी हो।
लूट,खसोट, हत्या और मक्कारी ,
दुर्गुण बड़ा है सत् कर्मों पर भारी।
मिथ्या अहंकार तुम्हारी है पहचान,
मान न सम्मान बिन बुलाये मेहमान।
कर्मफल तुम्हारा यही बताता है,
व्यर्थ में रोता और चिल्लाता है।
बचालो हमें अब बद्दी नहीं करूँगा,
बन संयासी सदा सत्काम करूँगा।
करूँगा सम्मान सभी मेहमान का,
करूँगा सुमिरन सदा हरि नाम का।
✍️ डॉ रवि शंकर मिश्र "राकेश "
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