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मुल्क़ की ख़ातिर मिटे कुछ नौजवाँ ऐसे भी थे

मुल्क़ की ख़ातिर मिटे कुछ नौजवाँ ऐसे भी थे

मुल्क़ की ख़ातिर मिटे कुछ नौजवाँ ऐसे भी थे।
पत्थरों  पर  दर्ज   हैं  गहरे  निशाँ  ऐसे  भी थे।

हिन्द की बगिया पे छायी थी कभी काली ख़िज़ाँ,
खून  से  सींचा  चमन  कुछ  बागबाँ  ऐसे भी थे।

ज़ुल्म  की आँधी  के आगे हर ज़ुबाँ खामोश थी,
बन गए  सबकी  ज़ुबाँ कुछ बे-ज़ुबाँ  ऐसे भी थे।

तोप  के  गोले  भी  हँस कर  झेलती थी झोपड़ी,
नींव जिनकी हिल गयी थी कुछ मकाँ ऐसे भी थे।

जिनके हिस्से में नहीं आयी थी 'रवि' की रौशनी,
इन्क़लाबी  गूँज  के  कुछ  आसमाँ  ऐसे  भी थे।
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(रवि प्रताप सिंह,कोलकाता,8013546942)
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