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ठोक जरा तू अपना भुजबल

ठोक जरा तू अपना भुजबल

अरे ओ हलधर।
ऐसे कैसे पड़ गये तुम-
राजनीति के दलदल।।
सचमुच में तुम बड़े,
भोले-भाले इंसान हो।
इसलिए तो सब ठगते-
कह भारतीय किसान हो।
जानकर दीन निर्बल।।
लोग हमदर्दी दिखाकर,
अपना काम साधता है।
तेरे लिए कब,कौन,कहां?
कुछ दुख बांचता है।
पल-पल छोड़ एक पल।।
तुम नेताओं की बात मान,
चले आए लुटाने जान।
ओ झूठ के हाय-हाय कर-
बन जाता है खुद महान।
बेहया पूर्वक तुम्हें छल।।
इनकी बातों में मत आना,
यही सब तो तुम्हें लुटते हैं।
खेत खलिहान से बुलाकर-
सरेराह तुम्हें कूटते हैं।।
छोड़ सड़क घर चल।।
ये सियासत की जाल है,
विरोधियों की चाल है।
अपना काम निकालने,
बस उपर का खाल है।
झांसे से मत मचल।।
इन्हे केवल अपनी चिंता है,
न की खेत खलिहान की।
न तुमसे इसे हमदर्दी है-
न तेरे बाद के संतान की।
खल कर रहा है छल।।
ये तेरा हल है सबका हल,
तुमसे हीं है सबका संबल।
उठा कुदारी,कर तैयारी-
धरती खोज रही है श्रमजल।
ठोक जरा तू अपना भुजबल।।
        --:भारतका एक ब्राह्मण.
       © संजय कुमार मिश्र 'अणु'
           वलिदाद अरवल (बिहार)
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