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दश अवतार

दश अवतार (कविता)

धर्म प्राण देश मेरा महान है।।
जहां बामन से विराट बन,बांधा बलि को।
किया मानमर्दन पदच्युत,आततायी,क्रुर,छली को।
देखो अधरो पर मुस्कान है।१।
जहां परसुराम ने मारा था,सहस्रार्जून  विश्व विजयी को।
छिनकर बांटा था धन जन में- दिया दंड दुर्जन जयी को।।
नामोनिशान मिटाया त्राण है।२।
जब प्रलय समुद्र में बह रहा था,सभ्यता, संस्कृति, संस्कार।
बढ़ने लगा विद्वेष, वैमनस्य,बचाया वेद, विद्या धर मीन अवतार।
सृष्टि पर किया उपकार महान है।३।
बढ़ता रहा अत्याचार बार बार,धंसने लगी धरा पाताल में।
तब सुकर रूप धारण कर के,भेजे थे विधर्मी को काल के गाल में।
दशो दिशाओं में फैला गुणगान है।४।
सत्य सनातन को दिखाकर कृपाण,जो दिखाता रहा गुमान।
गर्जन कर दुर्जन कहता कौन भगवान?नरहरि रूप धर हर लिए प्राण।
असत्य पर सत्य का टिका अनुष्ठान है।५।
दर्प से दमकता था,भाल दिक्  दिगंत,पदाघात से कांपने लगता था अनंत।
राक्षस का कर्म किया करता था नीच,राम रूप लेकर किया अंत।
नर रूप धारी बना भगवान है।६।
शस्य श्यामल धरा हुई जब उजाड़,जड और चेतन में मचा हाहाकार।
राजकुमार होकर उठा लिया हल,धरती पर लाए बसंती बहार।
यदुकुल उद्भव का ये महादान है।७।
गर्वित था उर्मी धारण कर रत्न,देव दानवों मंथन किया।
कच्छप रूप धरे सुमेरू को पीठ पर,चौदह भुवन को रत्न दान किया।
सुमेरु जिसके पीठ पर ये के समान है।८।
वेदों के आश्रय ले हिंसा हुई बली,धर्म कर्म हीन हुई जिह्वा छली।
जीवों पर रोष था जोकि निर्दोष था,देख अनाचार करूणा की धार चली।
यही सत्य अहिंसा बुद्ध का ज्ञान है।९।
एक हाथ खप्पर दूजा में कटार,अशुभ भेष हृदय विदारक हुंकार।
जिधर अनीति अनाचार देखता वह,कदम बढ़ाता उधर करने प्रतिकार।
ये कराल कलिकाल का अभियान है।१०।
    ---:भारतका एक ब्राह्मण.
     ©संजय कुमार मिश्र 'अणु'
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