हमर बेटा कन्ने हे।(मगही कहानी)
मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
गयाजी के पितरपख मेला आज से शुरु होये वाला है।हर साल करमा एकादशी के पहिलहीं से विसुनपत के इलाका लेले सौंसे शहर में बिजली बत्ती के चकाचौंध देखाई देवे लग हल।चमहला, विसुनपत, चाँदचौरा, नौआगढ़ी, घुघरीटांड़ बाईपास सगरो के दुकान सज जा हल।सब घाट पर साफ सफाई भी होवे लग हल।सड़क पर दिनभर नगर निगम के सफाई करमचारी झाड़ू बहाड़ू करैत नजर आवे लग हल।रिक्सा ,टेंपु के भी संख्या बढ़ जा हल।गाँव देहात से भी गरीब मजदूर ,पिण्डा करवे वालन पंडीजी भी शहर में आके के पितरपख कमाये ला जुटे लग हलन।माला फूल बेचेवाला ,खेलौना बेचेवाला भी सड़क के किनारे किनारे अपन दोकान सजा के बैठ जा हलन।पुनपुन से लेके गयाजी तक ई पितरपख में ढेर लोग के रोजगार मिल हल।एकरे नाम पर कैगो गरीब ठेला वाला,खोमचा वाला,माली,मजदूर,रिक्सावाला,टेंपुवाला,नौआ,बरहामन सब एने ओने से कर्जा भी ले ले हलन कि पितरपख कमा के लौटा देब।केतनन के तो बेटी के बिआह,बिमारी के इलाज, लैकन के स्कूल के फीस भी रुकल रह हल कि पितरपख बाद सब काम हो जायेत।घर दुआर भी गिरैत पड़ैत रह हल ओकर मरम्मत पी पितरपख कमा के करे के हिसाब पहिलहीं से बैठ जा हल।ई साल भी एही होल।बकि सरकार कोरोना के नाम पर पितरपख मेला न होवे देवे के एलान करके सबके उमीद पर पानी फेर देलक।सबके सब चिताने पड़ल हथ।केतनन के हालत तो मरे जिये होल हे।मेला होत न।यात्री आवत न।कमाई कैसे होवत।जे करजा लेली हे ओकरा कैसे भरब।बेटी के बियाह ठीक होयल अब कट जायेत।घर दूरा भी गिरे पर तैयार हे ।कहीं गिर गेल त रहब कहाँ।लैकन के पढ़ाई भी फीस न चुकावे से रुक जायेत।अब तो लग हे कि दुनु टाईम के खाये पर भी आफत होयेत।काहे कि जेकरा भिर तनी मनी जगहो जमीन हे ओकरो बेचहीं पड़त।आखिर करजा कैसे चुकायेब।सबकोई मिल के रोज अखबार में बेयान भी देईत ही बकि ई जिद्दी धरमविरोधी सरकार कुछ सुने ला तैयारे न हे।ई तो धरम के भी मजाके बनैले हे।आऊ न बनल तो लाखों बरिस के चलल आवैत पिण्डदान के परमपरा पर भी रोक लगाके औनलाइन पिण्डदान लगी हौआ खड़ा कैले हे।एकर देखादेखी केतनन आउ भी बजार लगा के बैठल हथ अदमी के लूटे ला।औनलाइन पिण्डदान के नाम पर सुनैत ही कि एक दिन लगी दस हजार बीस हजार के भी पैकेज बनल हे।ई धरम के काम में पैकेज का होव हे ई हमरा न बुझायल।हम तो सुनैत आवै थी कि "श्रद्धया दीयते दानम् तद्धर्मस्य प्रसाधनम्"।पितरपख में भी तो यही लागू होव हे।श्रद्धा से जे कैल जाये ओकरे श्राद्ध कहल जा हे।आऊ ऊ श्रद्धा हमर तोहर मन में होव हे।अपने से जे काम अपन हाँथ से कैल जाहे ओकरे फल भी मिल हे।काहे कि ई हमर मन के श्रद्धा से होव हे।सब पुराण ,आऊ सनातन धरम के जेतना भी ग्रंथ हे ओकरा में अपन पूर्वज के पिण्डदान बेटा चहे बेटी के अपन हाँथ से करे लागी बतावल गेल हे।ई आजकल के नौसिखुआ विदवान का जनी कौन शास्त्र में औनलाइन पिण्डदान, पूजापाठ पढ़ लेलन हे।अपन मनगढ़ंत बात के परचारो भी खूबे करैत हथ।सरकार के का हे ओकरा तो जनता के भोट से मतलब रह हे।खाली चुनाव के समय गोल गोल बतिया के जनता के उल्लू बना के भोट बटोरे ला रह हे।पितर के कोप का होव हे एकरा से ओकरा का मतलब।जब भोगे लग हे तब भले फिर गयाजी आउ गयाश्राद्ध इयाद आव हे।बनल काम बिगड़े लग हे,बेटा बेटी के बिआह चहे बाल बच्चा होये में परेशानी, नोकरी होये में देरी,लगल नोकरी,बेपार सब जब ठप पड़े लग हे तब गयाजी आके श्राद्ध आउ पिण्डदान सब बुझाये लग हे।जब विधायकी,मंत्रीपद सब छिनाये लग हे तब पितरन के इयाद आवे लग हे।खैर अब तो जे होये ला हल ऊ हो गेबे कयल बकि एने पितरन तो गयाजी आ गेलन हे।काहे कि उनका ई सबसे का लेना देना।ऊ तो सूक्ष्म रूप हथ।ई करोना उनकर का बिगाड़त।बकि हाँ ऊ इहाँ आज पुनपुन घाट पर बैठल अपन बेटा बेटी के इंतजार जरूर करैत हथ कि कोई भी आके दू चुल्लु पानी आउ पिण्डा देके हमरा तृप्त करे।बिहान से गयाजी में भटकतन।खोजतन कि हमर बेटा कन्ने हे ।बकि इहाँ अपन आल औलाद के न पाके निराश होयतन।ई औनलाइन दलाल के तो जानथ न।एकरा में जे उनकर बेटाबेटी फँसतन उनका तो ई पितरन के कोप भोगहीं पड़त।काहे कि ई कहाउत बड़ी दिन से सुनैत आवैत ही कि"देव माने त माने पितर न माने"।देउता के पूजा में तनीमनी ऊंचनीच भले चल जाहे।बकि पितर के पूजा बड़ी कठिन चीज हे।सरधा में तनिको कमी इनका पसंद न हे।कारण ई हे कि एही पितर जब जिंदा रह हथ त अपन बेटा बेटी के साज संभार में अपन औकात से जादे कोशिश कर हथ।उनकर जिंदगी के ई एगो अरमान रह के कि हमरा मरला पर एही बेटाबेटी गयाजी में जाके अपन हाँथ से पिण्डा पानी देत।अगर हम ई काम अपने से न करके औनलाइन चहे केकरो माध्यम से कराव ही त उनका बड़ी तकलीफ़ होयेत आउ ऊ जरुर करोध में सराप देतन।जेकर फल हमर बाल बच्चा के भोगे पड़त।सोच जरा ,अगर हमरा जनम के बाद माये बाप हमरो कहीं रख के छोड़ देतन हल,औनलाइन हमर परवरिश के व्यवस्था कर देतन हल त हम आज ई दिन देखती हल।अपन बाप माय के पहचानबो करती हल।कोई परिवार के जानती हल।हो सक हे हम बचबो न करती हल।बकि ई उनकर कोमल प्यार के स्पर्श आउ उनकर हमरा परती जे सरधा भाव हल ओकरे फल हे कि हम समाज के बीच मे ही।कटु मधु अनुभव करैत ही।अईसहीं हमरा भी अपन पितरन पर सरधा रख के गयाजी में आके जे कम बेसी बने अपन हाँथ से अपन पितरन ला कुछ करे के चही।ई ओनलाइन पिण्डदान के फेर में अपना ई जनम से लेके अगिला जनम तक बिगाड़े के कोशिश न करे के चही।ई लुटेरवन के अपन रस्ता पर वापस भेज देवे के जरुरत हे।हमनी के ई वैज्ञानिक शास्त्रीय परम्परा हे एकर निरवाह करे के हे।राम जी अयोध्या के राजा हलन,युधिष्ठिर भी हस्तिनापुर के राजा हलन,आउ तो आउ जे सब संसार के बनौलन ऊ ब्रह्मा जी भी ई गयाजी में आके अपन हाँथ से पिण्डदान कैलन हे।अगर चहतन हल ई सब भी अपन अदमी भेज के नौकर चाकर से भी ई काम करा सक हलन।बकी ऊ अपने अएलन।एकर शास्त्रीय परमान हे।दुनिया के सब तीरथ से महान गयाजी के बतावल गेल हे।शास्त्र कह हे कि पितरन के मन में ई भाव होव हे कि हमर कुल में ढेर सा संतान होवे।जेकरा से कोई भी गयाजी जाके हमनी के सराध सरधा से करे।ई चलते हमनी के भी चही कि पितरन के ई मनकामना गयाजी में आके हमनी पुराबी उनकर आशीर्वाद ग्रहण करके अपन कुल खनदान के आगे बढाबी।
...........मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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