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जाग-जाग अब जाग

जाग-जाग अब जाग

'वेंटीलेटर' में गयी,
अर्थ व्यवस्था आज।
शब्दों की बाजीगरी,
बनी कोढ़ में खाज।।

पहले से ही थी यहाँ,
हालत बड़ी खराब। 
घर बैठी सब डिग्रिया , 
ढूंढ रही हैं 'जाब'।।

महंगाई बेचैन हो,
ढूँढे रोटी दाल। 
बड़े-बड़ो कीआजकल,
उधड गयी है खाल।।

स्वयं लगाई आग तो,
कौन बुझाए आग।
अच्छी खासी साख थी,
लगा दिया है दाग।। 

ऑख बंद करके यहाँ,
गाई अब तक फाग।
खेत न चुग जाएं कहीं,
जाग-जागअब जाग।।
            *
~जयराम जय 
'पर्णिका',11/1,कृष्ण विहार   
कल्याणपुर कानपुर-208017(उ प्र)
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