हम कौन थे, क्या हो गए, और क्या होंगे अभी?
लेखक कमलेश पुण्यार्क ' गुरूजी'
सम्माननीय सूर्यांशगण ! सादर नमस्कार ।
विविध सम्बोधनात्मक औपचारिकताओं और अलंकारों से बिलकुल परे हटकर, मैं एक नये सम्बोधन के साथ आप बन्धुओं के समक्ष कुछ संदेश देना चाहता हूँ । आशा है मेरे विचारों का आप अन्यथा न लेते हुए, किंचित गम्भीरता पूर्वक विचार और चिन्तन करेंगे, साथ ही मेरी अल्पज्ञता और धृष्टता को क्षमा करेंगे, तथामेरे दुर्विचारों का परित्याग करते हुए,सदविचारों पर अमल और पहल अवश्य करेंगे ।
भूत का स्मरण,भविष्य का अनुमान और वर्तमान पर चिन्तन करते हुए,कविवर गुप्तजी की ये पंक्तियां प्रायःयाद आने लगती हैं- हम कौन थे क्या हो गए और क्या होंगे अभी ।आओ विचारें बैठ कर, हम समस्यायें सभी ।।
और इससे सुदूर पूर्व कथित श्रीआद्यशंकर की ताड़ना पूर्ण चक्षुश्मीलन-शलाका - कस्त्वं,कोऽहं,कुत आयातः...अथवाकस्यत्वं कः आयातस्त्वं चिन्तय यदिदं भ्रातः...।
और विचारने को विवश हो जाते हैं कि क्या हम वही सूर्यांश हैं, जिन्हें किसी प्रकार के प्रज्ज्वालक की आवश्यकता नहीं पड़ती थी ! फूंक मारते ही प्रलयंकारी अग्नि प्रकट हो जाता था?
जी हां,सूर्यांश । सूर्यवंश नहीं ।अंश और वंश में आकाश-पाताल सा अन्तर है । वंश यानी मैथुनी सृष्टि से उत्पन्न और अंश यानी सीधे “मूल” का ही एक हिस्सा । ध्यान रहे- हम सभी मगगणश्रीसूर्यनारायण के अंश हैं,वंश कदापि नहीं ।दूसरी बात ये कि हम भूदेव नहीं हैं । हम दिव्यदेव हैं । किसी युग्म से मैथुनी उत्पत्ति नहीं हुयी है हमारी । इस जम्बूद्वीप के हम मूलनिवासी भी नहीं हैं । हमारा मूल स्थान शाकद्वीप है, जो सप्तद्वीपों में सर्वोपरि है, दिव्य है । हम अद्भुत शक्ति सम्पन्न हैं । सृजन-पालन और संहार की समस्त शक्ति हमारे भीतर सन्निहित है । केन्द्रित है ।
किन्तु बिडम्बना ये है कि हम ये सब कुछ विसार चुके हैं, गंवा चुके हैं । और इससे भी बड़ी विडम्बना ये है कि दादाजी वाला हाथी तो मर गया है, परन्तु उसकी सांकल आज भी लिए हुए झनकारते फिर रहे हैं। आत्मश्लाघा और मिथ्या दम्भ का उद्घोष करते थक नहीं रहे हैं ।और सच कहें तो ये दम्भघोष भी गलत ढंग से गलत बात के लिए कर रहे हैं,क्यों कि ये रहस्य भी हमें ज्ञात नहीं है- कि किस मूल क्रिया केलिए हम पधारे थे यहां ।
आधी बात तो हमें पता है कि कुष्ट-व्यथित श्रीकृष्ण पुत्र साम्ब ने आग्रह पूर्वक आमन्त्रित किया था,क्यों कि भूदेवों से रवि-स्थापन कार्य सम्पन्न नहीं हो पा रहा था । किन्तु इस मूल बात को भी तोड़-मरोड़ कर प्रचारित-प्रसारित करते हैं कि साम्ब की चिकित्सा हेतु हम यहां आये, यानी कि हम शाकद्वीपीय आयुर्विज्ञान (आयुर्वेद) के ज्ञाता हैं । किन्तु यहां भी समझ में भारी भूल है । वस्तुतः हम दिव्यजन्मा सूर्यांश सर्योपासक हैं, और सूर्यतन्त्र में निष्णात हैं । सूर्यतन्त्र से ही साम्ब को रोगमुक्त किया गया,न कि वनस्पतितन्त्र से । हम प्राणविद्या के साधक हैं । हम सृष्टिविज्ञान के ज्ञाता हैं । सिर्फ आयुर्वेदज्ञ कहलाना तो हमारी तौहीनी है । आयुर्वेद तो हमारी घुटी में मिला है । और ज्योतिष- वो तो सूर्यतन्त्र का एक कण मात्र है ।
परन्तु अद्यतन सत्य ये है कि हमारी भी स्थिति आज वैसी ही हो चुकी है,जैसी स्थिति महर्षिगौतम शापित भूदेवों की हुयी थी । वे गौतम के साथ छल करने के कारण तेजहीन हुए थे और हम अपने संस्कारों को त्यागकर(भुलाकर)निश्चेज होगए हैं और निरन्तर होते जा रहे हैं। किसी ने बिलकुल सही कहा है—जिह्वादग्धा परान्नेन करौ दग्धौ प्रतिग्रहात् । मनोदग्धं परस्त्रीभिः कार्यं सिद्धिः कथंभवेत् ।।
एक गुप्तदान स्वीकारने मात्र से हमारी उर्ध्वगमिताशक्ति विलीन हो गयी थी । योगेश्वर श्रीकृष्ण को आशीष देने वाले हमारे वरदहस्त आज नित्य पसरे हुए हैं निकृष्ट यजमानों के आगे दान लेने हेतु । हमारी रसना का मूल रस सूख चुका है । जिह्वा दग्ध हो चुकी है परान्न और श्राद्धान्न भक्षण करते-करते । सविता, सावित्री और गायत्री- ये सब निर्बीज से हो गए हैं हमारे लिए ।
यूँ तो सतयुगादि कालों में भी मेरा आना-जाना हुआ करता था जम्बूद्वीप में । द्वीपान्तर यात्रायें बड़ी सहज थी हमारे लिए । किन्तु स्थायी तौर पर या कहें अन्तिम रुप से श्रीकृष्ण पुत्र साम्ब के रविस्थापनयज्ञ का आचार्यत्व हेतु हम आमन्त्रित किये गये । गरुड़-वाहित होकर यहां पधारे और भूलोक के कल्याणार्थ हमें आग्रह पूर्वक यहीं वसा लिया गया ।
ये सब तो इतिहास की बातें हैं, जो भूत के गर्त की हैं । किन्तु जो वर्तमान है, वो गम्भीर विचार का विषय है और भविष्य तो सर्वाधिक चिन्ताजनक । क्यों कि एक ओर हमारी संस्कारहीनता दिनोंदिन ह्रासोन्मुख है, तो दूसरी ओर सामाजिक स्थिति भी अल्पसंख्यक और बहुविचारधारा वाली हो चुकी है । बातें तो हम समाजिक एकता और जागरण की करते हैं, किन्तु दुःखद बात ये है कि तराजू पर मेढक बैठाने और तौलने की कवायद भर हो कर रह जाता है । सेवा और कार्य गौंण हो जा रहा है, पद-मर्यादा मुख्य । आसन्दियाँ बढ़ाने के चक्कर में एकता और अखंडता की आहुति पड़ रही है । विचारों का छौंका भी लग रहा है ।
मेरे प्यारे मगबन्धुओं !परिवार बड़ा होना हर्ष की बात है । और बड़े परिवार में अपरिहार्य रुप से कमरों की संख्या बढ़ायी जानी चाहिए । उससे भी काम न चले तो छत और मंजिलें भी बढ़ा लेनी चाहिए अपने भव्य भवन में, किन्तु ध्यान रहे- बीच में दीवारें खड़ी करके आँगन की मर्यादा और अस्तित्व को नष्ट करने की धृष्टता न की जाए । इसे मेरा सन्देश नहीं, प्रत्युत आग्रह पूर्वक निवेदन समझें ।
एक और निवेदन आपसे करना चाहूँगा- जैसा कि संस्कारहीनता के कुछ कारण ऊपर गिनाये गए । उन सबका यथासम्भव पालन करने का दृढ़ संकल्प लेना होगा । सबसे पहले श्राद्ध और दान का परित्याग करें, साथ ही बच्चों को समय पर उपनयनादि क्रिया-संस्कारित करके, संध्या-गायत्री की ओर उन्मुख करायें । चौबीस घंटे में से पैंतालीस मिनट, वो भी न हो सके तो चौबीस मिनट मात्र अपने लिए दें और फिर इतना ही बच्चों के लिए भी त्याग करें । वस्तुतः ये आपका त्याग नहीं,प्रत्युत संचय है- इसे आत्मसात करें ।
संध्या-गायत्री की अनिवार्यता बता कर,श्राद्ध-भोजन और दान-ग्रहण का परित्याग बताकर, मैंये नहीं कहता कि पुराने डर्रे पर आ जायें । समयानुकूल रोजगारोन्मुखी उच्च शिक्षा (डॉक्टर, ईन्जीनियर,वैरिस्टर...) अवश्य बनायें अपनी भावी पीढ़ी को, ताकि उन्नतशील देशों से कदम मिलाकर ही नहीं, आगे जाकर दिखावें । कुछ ऐसी ही व्यथा, विडम्बना और समाधान की चर्चा मैंने अपनी शोधपुस्तिका- पुण्यार्कमगदीपिका में की है । मेरा निवेदन है कि एक बार उसे अवश्य पढ़ें और उसपर मन्थन करें । आपके भीतर सोयी पड़ी सूर्यशक्ति को पुनर्जागृत कराना मेरा अभीष्ट है । उस शक्ति को जगावें । उस चिनगारी को ज्वाला में परिवर्तित होने का अवसर दें । फिर देखें- विश्व आपके सामने नतमस्तक कैसे नहीं होता है ! ध्यान रहे- आपके भीतर की शक्ति सृजन , पालन और विनाश तीनों शक्तियों से ओतप्रोत है । इसे लोककल्याण की दिशा में केन्द्रित करें,विखण्डन और विनाश की दिशा में कदापि नहीं । अस्तु ।
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