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अति वृष्टि या अनावृष्टि हो,
मन गरीब का घबराता है।
एक दूजे के जैसे ही तो,
दोनों लगते हैं स्वभाव में
सूखे की सौगात एक दे,
दूजा घर दे ढहा गांव में
गांव शहर में मजदूरों के,
घर में फांका पड़ जाता है।
भाग्य जगाकर जमाखोर के,
इनको हर्ष बहुत होता है
महंगाई का साथ निभा कर,
गोदामों में जा सोता है
अन्न का दाना कंचन घर के,
बंदी गृह में रह जाता है।
पौबारा निर्दयता की हो,
पूंजीपति की बां छे खिलती
बनजर भूमि जैसी जनता,
मुस्कानों को रहे तरसती
आशा और दिलासा में ज्यों,
भूखा बच्चा सो जाता है।
धरा तृषा से कभी चिटक कर,
फटी बिवाई सी होजाती
और कभी उफना कर नदिया,
तट वर्ती जीवन खा जाती
इसपर किसान की दशा देख,
संवेदना अश्क बहता है।
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सत्येन्द्र तिवारी लखनऊ
२०,०७,२०२०
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