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खुल के बोलS आखिर बात बसल का हौ तोर मनमा में !(मगही कविता)

खुल के बोलS आखिर बात बसल का हौ तोर मनमा में !

खुल के बोलS आखिर बात बसल का हौ तोर मनमा में !
सबसे बड़का बैरी हमहीं हियो तोर जहनमा में !

हमरा तो कुछ समझ न अयलो जड़-फुनगी के ओर अउ छोर ।
पता न हरदम हाय ! रहS ह फूलल कउन गुमनमा में !

धनकुबेर ह अपना लागी हमरा ला तू का कयलS   ?
अनका ला जे काम न आयल आग लगे ऊ धनमा में ।।

अपने तो दुर्योधन बनके दुर्ग बचाबे में रहलS  !
भेज के खुश ह हमनी के तू पाण्डव जइसन वनमा में ।।

गामा बनल फिरइथS अब तू काहे लागी दोसर पर !
गरबइया भर मास न बचलो अपने सूखल तनमा में ।।

फुँफकारित ह फन फइलैले विषधर बनके काहे ला  !
क्षण भर में ही शांत हो जयबS सनकल ह जे शनमा में ।।

चूनल-बिछल चाउर जइसन कइसन साफ बिछन्छल हल ।
सोंचS केकरो का मिललो कंकड़ मिलबे से चनमा में !

हड़प नारायण अपने होके सबके रखलS भुक्खे पेट ।
अनकर हिस्सा हड़प के खायल न हक लगतो खनमा में ।

दोसर के जारे'-खोरे में खुद चितचैन गँवा देलS  !
सुत्तल रहलS अपने सबदिन तेल डाल के कनमा में ।।

सुबह के भूलल शाम में लौटल कभी भुलायल न कहबे ।
खोजS अभियो राज छिपल जे चितरंजन के गनमा में ।।

कवि चितरंजन 'चैनपुरा' , जहानाबाद, बिहार, 804425
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