Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

थका हारा सांझ जैसा

थका हारा सांझ जैसा 

सत्येन्द्र तिवारी लखनऊ
थका हारा सांझ जैसा मन
रहा नीरस बांच जैसा
मन।

समर्पित होकर लूटे
मन भाव अक्सर
कामनाओं को मिले
चुभते हुए शर
     किसे परखे ,
     जांच जैसा मन।

अब नहीं है चाह
वासंती लगन की
चन्द्र मुख की चांदनी
वाले सगुन की
    बुझ गया है ,
     आंच जैसा मन।

समिरण की मृदु,
सुहानी रागिनी के
पावसी बौछार,
घन में दामिनी के
     कहां थिरके,
     नांच जैसा मन।

लाख अब मौसम,
करे मनुहार आकर
प्रतीक्षा के हुए खंडित
अब सभी अक्षर
    बहुत चिटका,
     कांच जैसा मन।
,,,,,,,,,,.     ,,,,,,,,    ,,,,,,,,,

सत्येन्द्र तिवारी लखनऊ

दिव्य रश्मि केवल समाचार पोर्टल ही नहीं समाज का दर्पण है |

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ