थका हारा सांझ जैसा
सत्येन्द्र तिवारी लखनऊ
थका हारा सांझ जैसा मन
रहा नीरस बांच जैसा
मन।
समर्पित होकर लूटे
मन भाव अक्सर
कामनाओं को मिले
चुभते हुए शर
किसे परखे ,
जांच जैसा मन।
अब नहीं है चाह
वासंती लगन की
चन्द्र मुख की चांदनी
वाले सगुन की
बुझ गया है ,
आंच जैसा मन।
समिरण की मृदु,
सुहानी रागिनी के
पावसी बौछार,
घन में दामिनी के
कहां थिरके,
नांच जैसा मन।
लाख अब मौसम,
करे मनुहार आकर
प्रतीक्षा के हुए खंडित
अब सभी अक्षर
बहुत चिटका,
कांच जैसा मन।
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सत्येन्द्र तिवारी लखनऊ
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