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जात ही बैरी जात के

जात ही बैरी जात के


नुस्ख निकाला करते हैं सब छोटी-छोटी बात के ।
हो जाते हैं सबसे बढ़कर जात ही बैरी जात के ।।

जड़ को खोद सुखाने लगते हरे-भरे हर पेंड़ को ।
पूजा करने लग जाते हैं झरे डाल के पात के ।।

अपनों की छोटी गल्ती को बड़ी बताया करते हैं ।
होती है परबाह नहीं गैरों के पड़ते लात के ।।

सगे हितैषी के ऊपर ही दम्भ दिखाने लगते हैं ।
बात-बात में थाह लगाते हैं उसकी औकात के ।।

जीवन भर का अपनों का सब किया कराया धो देते ।
बिक जाते बेमोल शत्रु के छोटे से सौगात के ।।

सनी प्यार से अपनों की हर बात बुरी अब लगती है ।
दुश्मन भी चलते हैं उनसे चाल खूब शह-मात के ।

जलते रह जाते जीवन भर पाते हैं चितचैन नहीं ।
मारे कभी न उठ पाते फिर औरों के आघात के ।।

कवि चितरंजन 'चैनपुरा' , जहानाबाद, बिहार, 804425
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