स्वस्तिक और स्वस्तिक-चिन्ह- सदैव कल्याणकारी
- योगेन्द्र प्रसाद मिश्र (जे. पी. मिश्र)
सनातन धर्म अनुष्ठानों में स्वस्ति चिह्न की उपस्थिति हमें प्राय: मिल जाती है। खोज करने पर पता चलता है कि यह एक कल्याणकारी चिह्न है, जो हमारी पौराणिक पूजा-पद्धति की देन है। अधिक खोजने पर यह भी पता चलता है कि स्वस्तिक को केवल भारत में ही नहीं उन्नत कहे जानेवाले विदेशों में भी अपनाया गया है। चीन, जापान, इंगलैण्ड, जर्मनी, ग्रीस, टर्की, तजाकिस्तान, अमेरिका में भी यह सौभाग्य-सूचक के रूप में प्रचलित है। जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने तो नाजी-ध्वज में वामावर्त स्वस्तिक प्रतीक चिन्ह के रूप में लहराया था। आखिर, भारत का यह प्राचीन चिह्न सुदूर विदेश में कैसे अपनाया गया। इस संबंध में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की रचित 'भारत भारती' की ये पंक्तियां याद आ जाती हैं -
'संसार में जो कुछ जहाँ फैला प्रकाश-विकास है,
इस जाति की ही ज्योति का उसमें प्रधानाभास है' ।।
- अतीत खण्ड/69।।
तो आयें देखें यह स्वस्तिक या स्वस्तिक चिह्न क्या है?
"स्वस्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्न अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। 'सु' का अर्थ अच्छा, 'अस' का अर्थ 'सत्ता' या 'अस्तित्व' और 'क' का अर्थ 'कर्त्ता' या करने वाले से है। इस प्रकार 'स्वस्तिक' शब्द का अर्थ हुआ 'अच्छा' या 'मंगल' करने वाला। 'अमरकोश' में भी 'स्वस्तिक' का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं - 'स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध' अर्थात् 'सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।' इस प्रकार 'स्वस्तिक' शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना निहित है। 'स्वस्तिक' शब्द की निरुक्ति है - 'स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः' अर्थात् 'कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है।
राखी में स्वस्तिक
स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएँ अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएँ आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती हैं। इसे 'स्वस्तिक' कहते हैं। यही शुभ चिह्न है, जो हमारी प्रगति की ओर संकेत करता है। दूसरी आकृति में रेखाएँ पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुड़ती हैं। इसे 'वामावर्त स्वस्तिक' कहते हैं। भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है। जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही 'वामावर्त स्वस्तिक' अंकित था। ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सिद्धान्त सार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है। उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है।
मंगलकारी प्रतीक चिह्न
स्वस्तिक अपने आप में विलक्षण है। यह मांगलिक चिह्न अनादि काल से सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त रहा है। अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक को मंगल- प्रतीक माना जाता रहा है। विघ्नहर्ता गणेश की उपासना धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ भी शुभ लाभ, स्वस्तिक तथा बहीखाते की पूजा की परम्परा है। इसे भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान प्राप्त है। इसीलिए जातक की कुण्डली बनाते समय या कोई मंगल व शुभ कार्य करते समय सर्वप्रथम स्वस्तिक को ही अंकित किया जाता है।
स्वस्तिक मंत्र या स्वस्ति मन्त्र शुभ और शांति के लिए प्रयुक्त होता है। स्वस्ति = सु + अस्ति = कल्याण हो। ऐसा माना जाता है कि इससे हृदय और मन मिल जाते हैं। मंत्रोच्चार करते हुए दर्भ (कुश) से जल के छींटे डाले जाते थे तथा यह माना जाता था कि यह जल पारस्परिक क्रोध और वैमनस्य को शांत कर रहा है। स्वस्ति मन्त्र का पाठ करने की क्रिया 'स्वस्तिवाचन' कहलाती है।
ॐ स्वस्ति न: इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
गृहनिर्माण के समय स्वस्तिक मंत्र बोला जाता है। मकान की नींव में घी और दुग्ध छिड़का जाता था। ऐसा विश्वास है कि इससे गृहस्वामी को दुधारु गाएँ प्राप्त हेती हैं एवं गृहपत्नी वीर पुत्र उत्पन्न करती है। खेत में बीज डालते समय मंत्र बोला जाता था कि विद्युत् इस अन्न को क्षति न पहुँचाए, अन्न की विपुल उन्नति हो और फसल को कोई कीड़ा न लगे। पशुओं की समृद्धि के लिए भी स्वस्तिक मंत्र का प्रयोग होता था जिससे उनमें कोई रोग नहीं फैलता था। गायों को खूब संतानें होती थीं।
यात्रा के आरंभ में स्वस्तिक मंत्र बोला जाता था। इससे यात्रा सफल और सुरक्षित होती थी। मार्ग में हिंसक पशु या चोर और डाकू नहीं मिलते थे। व्यापार में लाभ होता था, अच्छे मौसम के लिए भी यह मंत्र जपा जाता था जिससे दिन और रात्रि सुखद हों, स्वास्थ्य लाभ हो तथा खेती को कोई हानि न हो।
पुत्रजन्म पर स्वस्तिक मंत्र बहुत आवश्यक माने जाते थे। इससे बच्चा स्वस्थ रहता था, उसकी आयु बढ़ती थी और उसमें शुभ गुणों का समावेश होता था। इसके अलावा भूत, पिशाच तथा रोग उसके पास नहीं आ सकते थे। षोडश संस्कारों में भी मंत्र का अंश कम नहीं है और यह सब स्वस्तिक मंत्र हैं जो शरीररक्षा के लिए तथा सुखप्राप्ति एवं आयुवृद्धि के लिए प्रयुक्त होते हैं।
तुर्की के मशहूर शहर टोय में एक बार खुदाई के दौरान ऐसे बर्तन मिले थे जिन पर स्वस्तिक के निशान थे। कहा जाता है कि हिटलर ने भी अपने झंडे पर स्वस्तिक के निशान का इस्तेमाल किया था।
स्वस्तिक एक ऐसा चिह्न है जिसे खुशहाली और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। वैसे तो हिन्दू धर्म में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत स्वस्तिक का प्रतीक बनाकर ही की जाती है। मान्यताओं के अनुसार इस चिह्न को भगवान श्रीगणेश, सूर्य और ब्रह्मांड का भी प्रतीक माना गया है। लेकिन हैरान करने वाली बात तो ये है कि इस चिह्न को भारत के अलावा कई अन्य देशों में भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इन सब के बीच क्या आप जानते हैं कि पवित्र स्वस्तिक चिह्न को भारत के अलावा किन-किन देशों में इस्तेमाल किया जाता है? साथ ही हिटलर ने इस चिह्न को क्यों अपनाया था? यदि नहीं! तो आगे हम इसे जानते हैं।
दरअसल संस्कृत में स्वस्तिक शब्द का अर्थ सौभाग्य होता है। हजारों वर्षों से इस चिह्न का प्रयोग हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग करते आ रहे हैं। हालांकि अलग-अलग देशों में होने की वजह से इसके नामों में भी भिन्नता देखने को मिलती है। चीन में इसे वान, जापान में मांझी, इंगलैंड में फिल फोट, जर्मनी में हेकेन ग्रीस, और ग्रीस में टेट्राकुलस के नाम से जाना जाता है। वहीं कुछ देशों में इस चिह्न को उल्टा भी उपयोग में लिया जाता है और उसे स्वस्तिक कहा जाता है। तजाकिस्तान की आबादी मुस्लिम है। इस देश में स्वस्तिक को राष्ट्र चिह्न में से एक माना जाता है। साथ ही अमेरिका के प्रसिद्ध ब्रांड कोका-कोला ने भी स्वस्तिक का इस्तेमाल अपने प्रोडक्टस पर किया था।
कहा जाता है कि हिटलर ने भी अपने झंडे पर स्वस्तिक के निशान का इस्तेमाल किया था। प्रेम और सौभाग्य के प्रतीक रहे स्वस्तिक का उपयोग हिटलर ने गलत कामों के लिए किया। इसलिए आज जर्मनी में इस चिह्न पर पाबंदी लगी है। इसके अलावा अमेरिकी लेखक स्टीफन हेलार्ड ने स्वस्तिक और उसके महत्व को बताते हुए एक किताब लिखी जिसका नाम The Swastika
(A symbol beyond Redemption) है। इतिहासकारों की यदि मानें तो जब यूरोपीय लोग भारत आए थे तब वो इस निशान के सकारात्मक प्रभाव से काफी प्रभावित हुए। इस तरह वे लोग इस चिह्न को भारत के बाहर ले गए और इस्तेमाल में लाने लगे।
स्वास्तिक का चिन्ह
किसी भी शुभ कार्य को आरंभ करने से पहले हिन्दू धर्म में स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर उसकी पूजा करने का महत्व है। मान्यता है कि ऐसा करने से कार्य सफल होता है। स्वस्तिक के चिन्ह को मंगल प्रतीक भी माना जाता है। स्वस्तिक शब्द को ‘सु’ और ‘अस्ति’ का मिश्रण योग माना जाता है। यहां ‘सु’ का अर्थ है शुभ और ‘अस्ति’ से तात्पर्य है होना। अर्थात् , स्वास्तिक का मौलिक अर्थ है ‘शुभ हो’, ‘कल्याण हो’।
शुभ कार्य
यही कारण है कि किसी भी शुभ कार्य के दौरान स्वस्तिक को पूजना अति आवश्यक माना गया है। लेकिन असल में स्वस्तिक का यह चिन्ह क्या दर्शाता है, इसके पीछे ढेरों तथ्य हैं। स्वस्तिक में चार प्रकार की रेखाएं होती हैं, जिनका आकार एक समान होता है।
चार रेखाएं
मान्यता है कि यह रेखाएं चार दिशाओं - पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण की ओर इशारा करती हैं। लेकिन हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह रेखाएं चार वेदों - ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद की प्रतीक हैं। कुछ यह भी मानते हैं कि ये चार रेखाएं सृष्टि के रचनाकार भगवान ब्रह्मा के चार सिरों को दर्शाती हैं।
चार देवों का प्रतीक
इसके अलावा इन चार रेखाओं की चार पुरुषार्थ, चार आश्रम, चार लोक और चार देवों यानी कि भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश (भगवान शिव) और गणेश से तुलना की गई है। स्वस्तिक की चार रेखाओं को जोड़ने के बाद मध्य में बने बिंदु को भी विभिन्न मान्यताओं द्वारा परिभाषित किया जाता है।
मध्य स्थान
मान्यता है कि यदि स्वस्तिक की चार रेखाओं को भगवान ब्रह्मा के चार सिरों के समान माना गया है, तो फलस्वरूप मध्य में मौजूद बिंदु भगवान विष्णु की नाभि है, जिसमें से भगवान ब्रह्मा प्रकट होते हैं। इसके अलावा यह मध्य भाग संसार के एक धुर से शुरू होने की ओर भी इशारा करता है।
सूर्य भगवान का चिन्ह
स्वस्तिक की चार रेखाएं एक घड़ी की दिशा में चलती हैं, जो संसार के सही दिशा में चलने का प्रतीक है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यदि स्वस्तिक के आसपास एक गोलाकार रेखा खींच दी जाए, तो यह सूर्य भगवान का चिन्ह माना जाता है। वह सूर्य देव जो समस्त संसार को अपनी ऊर्जा से रोशनी प्रदान करते हैं।
बौद्ध धर्म में स्वस्तिक
हिन्दू धर्म के अलावा स्वास्तिक का और भी कई धर्मों में महत्व है। बौद्ध धर्म में स्वास्तिक को अच्छे भाग्य का प्रतीक माना गया है। यह भगवान बुद्ध के पग चिन्हों को दिखाता है, इसलिए इसे इतना पवित्र माना जाता है। यही नहीं, स्वस्तिक भगवान बुद्ध के हृदय, हथेली और पैरों में भी अंकित है।
जैन धर्म में स्वस्तिक
वैसे तो हिन्दू धर्म में ही स्वस्तिक के प्रयोग को सबसे उच्च माना गया है लेकिन हिन्दू धर्म से भी ऊपर यदि स्वस्तिक ने कहीं मान्यता हासिल की है तो वह है जैन धर्म। हिन्दू धर्म से कहीं ज्यादा महत्व स्वस्तिक का जैन धर्म में है। जैन धर्म में यह सातवं जिन का प्रतीक है, जिसे सब तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ के नाम से भी जानते हैं। श्वेताम्बर जैनी स्वस्तिक को अष्ट मंगल का मुख्य प्रतीक मानते हैं।
हड़प्पा सभ्यता में स्वस्तिक
सिंधु घाटी की खुदाई के दौरान स्वस्तिक प्रतीक चिन्ह मिला। ऐसा माना जाता है हड़प्पा सभ्यता के लोग भी सूर्य पूजा को महत्व देते थे। हड़प्पा सभ्यता के लोगों का व्यापारिक संबंध ईरान से भी था। जेंद अवेस्ता में भी सूर्य उपासना का महत्व दर्शाया गया है। प्राचीन फारस में स्वस्तिक की पूजा का चलन सूर्योपासना से जोड़ा गया था, जो एक ध्यान देने योग्य तथ्य है।
विश्व भर में स्वस्तिक
विभिन्न मान्यताओं एवं धर्मों में स्वस्तिक को महत्वपूर्ण माना गया है। भारत में और भी कई धर्म हैं जो शुभ कार्य से पहले स्वस्तिक के चिन्ह का इस्तेमाल करना जरूरी समझते हैं। लेकिन केवल भारत ही क्यों, बल्कि विश्व भर में स्वस्तिक को एक अहम स्थान हासिल है।
जर्मनी में स्वस्तिक
यहां हम विश्व भर में मौजूद हिन्दू मूल के उन लोगों की बात नहीं कर रहे जो भारत से दूर रह कर भी शुभ कार्यों में स्वस्तिक को इस्तेमाल कर अपने संस्कारों की छवि विश्व भर में फैला रहे हैं, बल्कि असल में स्वस्तिक का इस्तेमाल भारत से बाहर भी होता है। एक अध्ययन के मुताबिक जर्मनी में स्वस्तिक का इस्तेमाल किया जाता है।
जर्मनी के नाज़ी
वर्ष 1935 के दौरान जर्मनी के नाज़ियों द्वारा स्वस्तिक के निशान का इस्तेमाल किया गया था, लेकिन यह हिन्दू मान्यताओं के बिलकुल विपरीत था। यह निशान एक सफेद गोले में काले ‘क्रास’ के रूप में उपयोग में लाया गया, जिसका अर्थ उग्रवाद या फिर स्वतंत्रता से सम्बन्धित था।
अमरीकी सेना
लेकिन नाज़ियों से भी बहुत पहले स्वस्तिक का इस्तेमाल किया गया था। अमरीकी सेना ने पहले विश्व युद्ध में इस प्रतीक चिह्न का इस्तेमाल किया था। ब्रितानी वायु सेना के लड़ाकू विमानों पर इस चिह्न का इस्तेमाल 1939 तक होता रहा था।
जर्मन भाषा और संस्कृत में समानताएं
लेकिन करीब 1930 के आसपास इसकी लोकप्रियता में कुछ ठहराव आ गया था, यह वह समय था जब जर्मनी की सत्ता में नाज़ियों का उदय हुआ था। उस समय किए गए एक शोध में बेहद दिलचस्प बात निकल कर सामने आई। शोधकर्ताओं ने माना कि जर्मन भाषा और संस्कृत में कई समानताएं हैं। इतना ही नहीं, भारतीय और जर्मन दोनों के पूर्वज भी एक ही रहे होंगे और उन्होंने देवताओं जैसे वीर आर्य नस्ल की परिकल्पना की।
स्वस्तिक का आर्य प्रतीक के रूप पर बल
इसके बाद से ही स्वस्तिक चिन्ह का आर्य प्रतीक के तौर पर चलन शुरू हो गया। आर्य प्रजाति इसे अपना गौरवमय चिन्ह मानती थी। लेकिन 19वीं सदी के बाद 20वीं सदी के अंत तक इसे नफ़रत की नज़र से देखा जाने लगा। नाज़ियों द्वारा कराए गए यहूदियों के नरसंहार के बाद इस चिन्ह को भय और दमन का प्रतीक माना गया था।
चिह्न पर प्रतिबंध
युद्ध ख़त्म होने के बाद जर्मनी में इस प्रतीक चिह्न पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और 2007 में जर्मनी ने यूरोप भर में इस पर प्रतिबंध लगवाने की नाकाम पहल की थी। माना जाता है कि स्वस्तिक के चिह्न की जड़ें यूरोप में काफी गहरी थीं।
प्राचीन ग्रीस के लोग
प्राचीन ग्रीस के लोग इसका इस्तेमाल करते थे। पश्चिमी यूरोप में बाल्टिक से बाल्कन तक इसका इस्तेमाल देखा गया है। यूरोप के पूर्वी भाग में बसे यूक्रेन में एक नेशनल म्यूज़ियम स्थित है। इस म्यूज़ियम में कई तरह के स्वस्तिक चिह्न देखे जा सकते हैं, जो 15 हज़ार साल तक पुराने हैं।
लाल रंग ही क्यों
यह सभी तथ्य हमें बताते हैं कि केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के कोने-कोने में स्वस्तिक चिन्ह ने अपनी जगह बनाई है। फिर चाहे वह सकारात्मक दृष्टि से हो या नकारात्मक रूप से। परन्तु भारत में स्वस्तिक चिन्ह को सम्मान दिया जाता है और इसका विभिन्न रूप से इस्तेमाल किया जाता है। यह जानना बेहद रोचक होगा कि केवल लाल रंग से ही स्वस्तिक क्यों बनाया जाता है?
लाल रंग का सर्वाधिक महत्व
भारतीय संस्कृति में लाल रंग का सर्वाधिक महत्व है और मांगलिक कार्यों में इसका प्रयोग सिन्दूर, रोली या कुमकुम के रूप में किया जाता है। लाल रंग शौर्य एवं विजय का प्रतीक है। लाल रंग प्रेम, रोमांच व साहस को भी दर्शाता है। धार्मिक महत्व के अलावा वैज्ञानिक दृष्टि से भी लाल रंग को सही माना जाता है।
शारीरिक व मानसिक स्तर
लाल रंग व्यक्ति के शारीरिक व मानसिक स्तर को शीघ्र प्रभावित करता है। यह रंग शक्तिशाली व मौलिक है। हमारे सौर मण्डल में मौजूद ग्रहों में से एक मंगल ग्रह का रंग भी लाल है। यह एक ऐसा ग्रह है जिसे साहस, पराक्रम, बल व शक्ति के लिए जाना जाता है। यह कुछ कारण हैं जो स्वस्तिक बनाते समय केवल लाल रंग के उपयोग की ही सलाह देते हैं।"
स्वस्तिक संबंध में बहुत सी बातें हैं, पर उसके लिए इस आलेख में पर्याप्त स्थान नहीं है। हमरा उद्देश्य यही है कि हमारे धार्मिक-सांस्कृतिक अनुष्ठान का अपरिहार्य बने स्वस्तिक और स्वस्तिक-चिह् की कल्याणकारी महिमा से हम और परिचित हो जायें!
स्वस्ति भवते!
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योगेन्द्र प्रसाद मिश्र: अर्थमंत्री-सह-कार्यक्रम संयोजक, बिहार-हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन, पटना 800003.नि. मीनालय, केसरीनगर, पटना - 800024.
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