कवियों का सिरमौर हूँ
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किसमें हिम्मत है जो कह दे,
' मैं कविता का चोर हूँ।'
कवियों का सिरमौर हूँ आखिर,
कवियों का सिरमौर हूँ।
कुछ कवियों की कविता को मैं,
रूप नया दे देता हूँ।
कुछ शब्द बदलकर कविताओं के,
मैं अपनी कह लेता हूँ।
' नाना पुराण ' की बातें कहकर,
तुलसी कवि बन जाता है।
' तुलसी की चौपाई ' कहकर,
हर जन उसे सुनाता है।
तो फिर चोर हुआ मैं कैसे,
समझ नहीं मैं पाता हूँ!
शब्द बदलकर 'दूसरों की कविता' मैं अतः सुनाता हूँ।
मेरे मुँह पर कोई तो कह दे,
' कविता का चोर ' हूँ-
कवियों का सिरमौर हूँ आखिर,
कवियों का सिरमौर हूँ।
बड़े-बड़े मंचों पर जाकर,
मैं ही कविता पढ़ता हूँ।
' श्रद्धेय ' समझते जो मुझको,
ऐसे कवियों को गढ़ता हूँ।
फर्क नहीं पड़ता मुझको,
ग़र चोर मुझे तुम कहते हो।
देख मुझे मंचों पर तुम,
बस ईर्ष्या करते रहते हो।
जितनी ईर्ष्या करते तुमसब,
उतना ही मैं बढ़ता हूँ।
तुम जैसे निर्बल जन से मैं,
नहीं कभी भी लड़ता हूँ।
सच है, छुटभैये कवियों का,
एकमात्र मैं ठौर हूँ-
कवियों का सिरमौर हूँ आखिर,
कवियों का सिरमौर हूँ।
-मिथिलेश कुमार मिश्र 'दर्द'
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