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हनुमानजी है अतुलित बल के धाम|


हनुमानजी है अतुलित बल के धाम|


पंडित श्रीकृष्ण दत्त शर्मा
अवकाश प्राप्त अध्यापक
सी 5/10 यमुनाविहार दिल्ली
मित्रों, आज श्री हनुमानजी महाराज की भक्ति करेंगे, हनुमानजी अतुलित बल के धाम है, हनुमानजी में अपना बल नहीं है, भगवान का बल विराजमान है, "जासु ह्रदय आगार बसहिं राम सर चाप धर" धनुष-बाण लेकर भगवान जिनके ह्रदय में विराजमान है, भगवान का बल भी उनके साथ विराजमान होगा कि नहीं? और अपना स्वभाव देखिये?
हम हमेशा अपने बल पर गर्व करते हैं, और श्रीहनुमानजी हमेशा भगवान के बल का गर्व करते हैं, "सो सब तब प्रताप रघुराई नाथ ना कछु मोर प्रभुताई" हनुमानजी जब भी बोलते हैं तो यही बोलते हैं कि प्रभु मेरा क्या है, मैं तो बन्दर हूँ, "कपि चंचल सबही विधि हिना" यह तो प्रभु आपकी कृपा हो गयी तो लोग बन्दरों को भी आदर देने लगे।
ऐसे अतुलित बलधाम श्रीहनुमानजी अंजनी माँ के पुत्र है, हमारे यहाँ माता का नाम पहले आता है, यह भारत की संस्कृति है, यही भारत का स्वभाव है, आपने आजकल विवाहों के निमंत्रण-पत्र देखें होंगे, निमंत्रण पत्र में भी पहले श्रीमती फिर श्री, पहले माँ का नाम, माँ का जो स्थान है भारत वर्ष में सर्वोत्तम है इसलिये हमने इस देश की धरती को भी माँ कहा है।
भारतमाता और इस देश की नहीं पूरे विश्व की धरती को माता माना है, माँ का प्रतिबिम्ब पृथ्वी माँ है, पालन करती है सबका, और इसलिये हमने भगवान की भी पूजा की है तो उसको भी हमने माँ कह कर पुकारा है, "त्वमेव माता च पिता त्वमेव" इसका कवि ने कितना सुन्दर वर्णन किया है।
तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो, तुम्ही हो बन्धूं सखा तुम्हीं हो,
तुम्हीं हो साथी, तुम्हीं सहारे, कोई न अपना सिवा तुम्हारे।
जो खिल सके ना वो फूल हम है, तुम्हारे चरणों की धूल हम है,

कृपा की दृष्टि सदा ही रखना, तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्हीं हो।
आरती भी गाते हैं तो यही गाते हैं- "मातु-पिता तुम मेरे सरन गहूँ किसकी, तुम बिनु और न दूजा आस करू जिसकी" माताओं के द्वारा ही जगत में महापुरुषों की रचना हुई है, उनके द्वारा ही हमारे देश को महापुरुष मिले हैं, माताएं बच्चों को दूध पिलाते समय, गोद खिलाते समय, भगवान से यही प्रार्थना करती हैं, "बौद्धोऽसि-शुद्धोऽसि - निरंजनोऽसि" यानी मेरा बेटा बुद्ध बने, जाग्रत बने, मेरा बेटा विकार रहित शुद्ध बने।
और मेरा बेटा माया में लिप्त न हो जायें, निर्लिप्त रहे माया से मुक्त हो, ऐसी माता में आप सुमित्रा माता का दर्शन करें, आखीर लक्ष्मणजी में त्यागमय गुण कहाँ से आयें, लक्ष्मणजी में जो भी गुण है वो माता सुमित्राजी की कृपा के कारण है, बनवास की घटना देखिये, लक्ष्मणजी प्रभु के साथ बनवास जाने के लिए आतुर हैं, प्रभु ने कहा पहले माँ से आज्ञा ले लो, लक्ष्मणजी ने कहा प्रभु आप चले तो नहीं जाएंगे? प्रभु ने कहा, नहीं जायेंगे।
लक्ष्मणजी सुमित्रामाताजी के पास गये, सुमित्राजी ने पूछा- क्या हुआ बेटा, बाजे बज रहे थे, जय-जयकार हो रही थी एकदम सब शांत हो गया, क्या बात है, मुहूर्त बदल गया क्या? लक्ष्मणजी ने कहा- माँ आपको मालूम है क्या हुआ है? अयोध्या का भाग्य फूट गया है, क्या हुआ है? श्री रामजी को चौदह वर्ष का वनवास हुआ है, प्रभु माँ जानकीजी के साथ वन को जा रहे हैं और मैं भी,
तूम फिर यहाँ क्यों आये हो, भगवानजी ने कहा है, पहले माँ से आज्ञा लेकर आओ, "माँगहुं बिदा मातु सन जाई" माता सुमित्राजी ने हिदायत के साथ जाने की अनुमति दी, कि जानकीजी और रामजी का पूरा ख्याल रखोगे, ये भारत की माताएं थीं, जिनके कारण इस देश में ब्रह्म को भी अवतार लेना पडा, कैसा देश है? क्या देश है?
जहाँ डाल डाल पर सोने की चिडिय़ाँ करती है बसेरा, वो भारत देश है मैरा।
जहाँ सत्य अहिंसा और धर्म का पग पग लगता है डेरा, वह भारत देश है मेरा।
ये धरती वो जहाँ ऋषि-मुनि जपते हरिनाम की माला, हरि नाम की माला।
यहाँ हर बालक मनमोहन हैं और राधा हर एक बाला, राधा हर एक बाला।
जहाँ सूरज सबसे पहले आकर डाले अपना डेरा,वो भारत देश है मेरा।
इस देश में माताओं का वन्दन किया है, चाहे गर्भवती माता या भूगर्भ की माता हो, माताओं के कारण इस देश का धर्म व संस्कृति जीवित हैं, जिस समय भारत मुस्लिम आक्रांताओं की चपेट में धर्म संस्कृति से विरत होने लगा, भय के कारण से यज्ञ, धर्म, जागरण, धार्मिक कथा, प्रवचन डूबने लगे, उस समय सचिमाता ने चैतन्यमहाप्रभु को तिलक करके कहा कि जाओ, इस संसार को हरिनाम का संदेश दो, धर्म को तुम्हारी आवश्यकता है।
ऐसा सुना गया कि जिस समय युद्ध समाप्त हो गया, लंका विजय के बाद प्रभु अवध को लोट रहे थे, पुष्पक विमान गनधमादन पर्वत के ऊपर से उड रहा था तो हनुमानजी ने कहा प्रभु यहां मेरी माँ निवास करती है, बहुत दिन हो गये, माँ के दर्शन नहीं हुयें, आज्ञा हो तो मैं दर्शन कर लूँ, भगवान बोले हनुमान जिस माँ ने तुम्हारे जैसे पुत्र को जन्म दिया हो उनका दर्शन करने का मन तो हमारा भी बहुत है, चलो हम भी दर्शन करेंगे।
विमान नीचे उतर आया, दौड कर हनुमानजी ने माँ को प्रणाम किया प्रभु ने भी जाकर प्रणाम किया और बोले माँ आपके दर्शन पाकर मेरे नेत्र धन्य हो गयें, माँ आपने ऐसे पुत्र को जन्म दिया, तो अंजनी माँ ने हनुमानजी से पूछा- पुत्र! कुम्भकर्ण को किसने मारा? हनुमानजी बोले, माँ, प्रभु ने मारा, अच्छा मेघनाथ को? बोले उनको लक्ष्मणजी ने मारा, अच्छा रावण को किसने मारा? बोले रावण को भगवान ने मारा।
इतना बोलना था कि अंजनी माँ क्रोध में आ गयीं और बोलीं आगे कभी मुझे मुँह नहीं दिखाना, चले जाओ, क्यों मैंने तुम्हें इसलिये दूध पिलाया था कि भगवान को श्रम करना पडे? राक्षसों का वध करने के लिए? तुने मेरे दूध को लजा दिया, अंजनी माँ के दूध में इतनी ताकत थी उसी समय गनधमादन चोटी पर जब दूध की धारा फेंकी तो गनधमादन के खण्ड खण्ड हो गए, इतना ताकतवर दूध मैंने तुम्हें पिलाया और प्रभु को श्रम करना पडा, मुझे शक्ल दिखाने की आवश्यकता नहीं है।
प्रभु हाथ जोडकर बोले, माँ क्रोध मत करो, हमने नहीं मारा कोई राक्षस, यह तो हनुमान मार मार कर अधमरा कर देते थे, हमको यश देने के लिए कहते थे, प्रभु आप इसको मुक्ति दे दीजिए मारने का काम तो श्री हनुमान ने किया है, हमको तो यश देने के लिए कहा कि प्रभु ने मारा, ऐसी माँ के गर्भ से हनुमानजी का जन्म, अंजनीपुत्र और पिता का नाम बाद में जुडा है "पवनसुतनामा" और पवन के पुत्र भी कहे गयें हैं।
जय श्री रामजी!
जय श्री हनुमानजी