आशीर्वचन
“ दिव्यरश्मि” के पाठकों को
कमलेश पुण्यार्क का सादर अभिवादन।
बड़े हर्ष की बात है कि आज दिनांक २८मई २०२०ई. को धर्म,
अध्यात्म और संस्कृति का संवाहक “दिव्यरश्मि ”अपने जीवन के छठे पायदान पर दिव्य आलोक
विखेरते हुए सुदृढ़ पग बढ़ा लिया है। स्पष्ट है कि इसके संस्थापक-सम्पादक से लेकर
सभी कार्यकर्तागण कार्यकुशल और कर्त्तव्यनिष्ठ हैं। अन्यथा
पत्र-पत्रिकाओं की बाढ़ में कौन कब कहाँ बह जायेगा—कहा नहीं जा सकता।
पत्रकारिता को लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ कहा
जाता है। मेरे विचार से इसे सर्वाधिक महत्त्व और दायित्व पूर्ण स्तम्भ कहना चाहिए। हालांकि इसका ये अर्थ
कदापि न लगा लिया जाए कि शेष तीन स्तम्भों का दायित्व इससे किंचित न्यून है।
शैय्या के चार पायों की तरह सुव्यवस्थित राष्ट्र की सम्यक् गतिशीलता और विकास हेतु
इन चारों पायों का संतुलन अनिवार्य है। कोई एक पाया भी डगमग होगा, तो उस शैय्या
पर सुखचैन की नींद ले पाना दुष्कर होगा। पत्रकारिता तो सिरहाने का पाया है। फलतः वो
ज्यादा व्यथित करेगा, यदि जरा भी दुर्बल होगा। अतः इसे सुदृढ़ और
निर्भीक होना चाहिए। परमुखापेक्षी होना तो इसके लिए सर्वाधिक घातक सिद्ध होता है। मौलिक
स्वतन्त्रता इसके कर्तव्यपथ का अनिवार्य शर्त है। किन्तु स्वतन्त्रता की भी अपनी
मर्यादा है, जिसका सम्यक्
निर्वहण होना भी अनिवार्य शर्तों में ही शामिल है।
वर्तमान विकट परिस्थिति में जहाँ मर्यादायें
और निष्ठायें निरन्तर दाव पर लगी हुयी हैं, ईमानदारी पूर्वक पत्रकारिता
धर्म का निर्वहण अति कठिन कार्य है। हालांकि सत्य का निर्वहण हर युग में कठिन रहा
है। विशेषकर कलियुग में तो सत्य का मार्ग सर्वाधिक दुर्गम है। ऐसे में स्वच्छ पत्रकारिता कितना दुरुह और
दुर्गम है—सोचने वाली
बात है।
अर्थप्रधान युग में प्रायः सबकुछ विकाऊ हो गया
है— यहाँ तक कि
धर्म भी व्यापार बन गया है। ऐसे में पत्रकारिता भी इस बाजारवाद से अछूता नहीं रह
पाया है। टी.आर.पी. और विज्ञापनों के मोल-जोल के बीच सत्य और तथ्यनिष्ठ पत्रकारिता
बहुत दुर्लभ हो गया है। बाजार में भीड़ भी बहुत है। अपने अस्तित्व को बचाये रखना, सम्हल कर खड़े
रह पाना,कार्यक्षेत्र
की सुदीर्घ यात्रा कर पाना बहुत कठिन हो गया है।
ऐसी विकट घड़ी में,“दिव्यरश्मि ” जैसी छोटी पत्रिका का जन्म लेना, अपने
जीवन के पाँच मनोहर वसंत गुजारते हुए छठे वर्ष में प्रवेश कर जाना, अपने आप में इसके संस्थापक, सम्पादक,
संरक्षण मण्डल तथा सहयोगियों और कार्यकर्ताओं की अटूट लगन, दूरदर्शिता
और कर्मनिष्ठा का निष्पक्ष प्रमाण है। ऐसा नहीं कि विगत पाँच वर्षों में सिर्फ
वसन्त ही वसन्त रहा। निश्चित ही शिशिर और हेमन्त भी आए। फिर भी श्लाघ्य और
अनुकरणीय ये है कि प्रकाशन-यात्रा बाधित नहीं हुयी।
भगवान भुवन भास्कर से मेरी यही प्रार्थना है कि ये
कदमसदा अपने विकासपथ पर अग्रसर रहें—अपना धर्मध्वज लेकर।जयभास्कर ।


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