तार के पेंड़(मगही कहानी )
लेखक श्री चितरंजन 'चैनपुरा'
तार तर उपरे से गिरल एगो
फेद्दा । दउड़ल उघारहीं निकालले सब लेद्दा । लइकन लुझ गेल । लुटा-लुटी होयबे कयल । छीना-झपटी होबे लगल । ओहे घड़ी ओहिजे एगो
आउ गिरल ---- धब्ब से । ध्यान ओने जइसहीं बँटल सबकोई के हीरालाल के बेटा हिरंगबा
चल जाइत हे लेले भागल । ऊ जे टिकिया उड़ान भागल उहाँ से त का कउनों से पकड़यबो कयल !
फेद्दा लेले हाँहें-फाँफे धाने-धान-धाने-धान भागिते-भागिते टिल्हा पर जाके ऊ
पाँकरे तर रुकल । पीछे देखलक त कोई न हल भीरी में । सब लजायल रह गेल हल ओनहीं । हे
बाकी वीर एहो हिरंगबा । ताल ठोक के जोर से चिचिआ के कहलक , "आजो बेट्टा ! नS
न लेबे देलिअउ फेद्दा कोई के !"
दुसरका फेद्दा ला तो
मंगरुआ आउ झगरुआ झगड़इते हल दूनों । कादो में लेटल फेद्दा झगरुआ जइसहीं झपटलक , मंगरुआ में - में करे लगल । रोइत देख के बकरियो मेंमिआइये
देलक ---- मेंS
मेंS
मेंS
मेंS
---- ।
बिलास सिंह के दूरा, पर बाप रे ! ओड़िया के ओड़िया फेद्दा फेंकल हल । कोई पूछइत न
हे घर के अदमी । बचना बट्टे के बट्टे ढो के रखले हे मालिक भिर । गनउरिया गोरकी
मट्टी के टाल लगयले हे । चनेसरा चोभा मार-मार के तीनों आँठी रख देलक ओहिजे ।
"
का रे ! खूब खयलहीं फेद्दा ? चोभलहीं न खूब ?
" बिलास बाबू पुछलन ।
"
हाँ मालिक ! आज पेट भर गेलइ ।" चनेसर बोललक ।
भादो आसिन में गोरकी मट्टी
से झाँपल आउ गनउरा से तर कयल फेद्दा के आँठी कातिक में कबारल गेल त गुदड़ा गँड़ासी
से लगल काट-काट के कोबा निकाले ।
सुमिरन बाबू के बेटा-बेटी
जब खा के अघयला तब गुलटेनियाँ भी गुटुर-गुटुर दू कोबा खा गेल । एतने में दुलरिया
दइबा के देखइते बिलास बाबू बोलला ---
" ले जो फेद्दा के आँठी । बोरसी भरे ला होयतउ ।"
नन्हकू नउआ कहलक कि आय
मालिक ! जाड़ा में एकरा जरा के लइकन के सेंके से सब रोग-दुख भाग जा हे ।
सुनिते बिलास बाबू बोलला
कि दुर्र रे मरदे ! ले न जो तुहूँ हो ! "कुबड़ी कुम्हइन कोबा के नीचे जमल जड़ी
के खुरपी से खोद के कबारे लगल ---- "जानS हहू मालिक ! एकर खूब नीमन तरकारी होबS हइ ।" हँसे लगल सबकोई ---- "हाँ ! हाँ ! ले जो बड़ी सबदगर लगतउ ! बना
के खिया दिअहीं खदेरना के त फिर से जमान हो जयतउ !" छेंकुनी लेले ऊ लगल सबके खदेरे । लइकन तो लगलन गाबे -----
काटो रे ! बरखाजा !
हाँथी पर के घुंघरू
चमक चले राजा !
हो गेलो हँसी आउ का !
बलेसर सिंह के बेटी के
बियाह हल । बरियाती आबे में बहुत दिन बाकी भी न हल । तिलेसरा तार के पेंड़ पर चढ़
-चढ़ के मार पँसुली-मार पँसुली खगड़ा काट के ढेर लगा देलक । कहलक कि मालिक ! एकरा से
जादे जरना न लगतो ! एतना में मड़बा आउ भतमान दुनों पार लग जयतो ! खगड़ा फरका के छोड़
देल गेल -- सुखे ला । सुखला पर सजीवना जब जउरी खोजे लगल खगड़ा के बान्हे ला त कहलन
बिटेसर बाबा कि बोझा बान्हे ला जउरी के कउन काम हे रे ! हरियरका खगड़बा में से
पत्ता तोड़ के बान्हें नS
!
कइला भी कई तार पर खगड़ा
काटलक ऊ दिन । मटुक मढ़को बनयलन बगइचा में आम अगोरे ला । कल्टू कोइरी कोलसार बनयलन
केतारी पेरे ला । छठ्ठू छप्पर छाबे ला छौ खगड़ा ले गेल । रामखेलावन खोदइया के सब
खेत आउ खँढ़ी खगड़े से हर साल घेर दे हथ । चनेसर चकाचक चटाई बिनलक बाबा के बइठे ला
आउ सुपना ससुरार में सास के सुते ला बड़का चटाई भेजलक । तनी गो गो लइकन खगड़ा के घड़ी
,
चश्मा आउ अंगूठी बिन बिन के बनयलक । कमाल तो मनेसर मलिया
कयलक । ऊ जानS
हे कि दुल्हा के माथा पर पेन्हे ला मउरी खगड़े के बनS हे । बण्ड बुण्ड के लोग परतुक भी दे हे कि देखS नS
? एहे से माथा पर खगड़ा भी न चढलो ! खेसड़िया तो खगड़ा के केतना
तरह-तरह के खेलौना आउ रंग-बिरंग के झुनझुन्ना बना-बना के बाले-बच्चे बेंचS हे ।
बरसात में बाध में बिजली गिरS हे इया ठनका ठनकS हे त जादे तर सुनबS
कि तारे के पेंड़ पर गिरS हे आउ कउनो पेंड़ पर न । वैज्ञानिक लोग एकरे आधार पर तड़ितचालक के आविष्कार कयलन
। ठनका ठनके में आस पास के सबसे ऊँचाई वाला सुचालक चीज ओकरा अप्पन ओर खींचS हे । तार के पेंड़ आस पास के सब पेंड़ से ऊँचा होबS हे । इहे से ठनका एकरे पर गिरS हे ।
मंदिर पर त्रिशूल, कलश इया अन्य नुकीला आकृति, मस्जिद पर चांद सितारा,
गुरुद्वारा पर के गुम्बद इया चर्च पर पर के जोड़ के चिह्न के
धार्मिक मान्यता चाहे जे भी रहे बाकि वास्तविक में ऊ हे तड़ितचालक ही । पता न ओकरा
से ताम्बा के तार धरती तक केतना लोग जोडले रहS हे !
बरसात में पानी परे लगS हे त सब मजदूर आउ किसान छाता इया बरसाती तो लेले न रहे । आस
पास के तरबाना इया आरी पर के खगड़ी में से हँसुआ से काट के खगड़ा के छाता माथा पर धर
लेलक । अब केतनो परइत रहS
पानी । भींजे के कोई डर न । मकई के खेत में मचान खगड़े के न
बनS
हे ! जने से झटास आबे लगल ओनहीं मोंहें दूगो खगड़ा टांग दS । बुन्नी बयार सबसे बचाबS हे खगड़ा ।
केतारी कोड़े में कुदार से कट जा हे
कोई किसान इया मजदूर के गोड़ चाहे फसल काटे में हँसुआ से हाथ कटा गेल इया चले में
लग गेल ठेंस आउ बहे लगल खून त के जा हे दउड़ के डॉक्टर भिर लेबे ला दबाई ? बगले में तार के पेंड़ इया छोटे-छोटे खगड़ी हइये हे । खगड़ा के
फुल्ली ----- जे पत्ता आउ काँप के साथे लाल-लाल , भूरा-भूरा रंग के रुआ जइसन रहS हे ओहे फुल्ली कटल पर लगा द । खून बहे ला तुरत रुक गेल । जेकर देह में विटामिन
के•
के भी कमी रहS हे ओकरो खून के तुरत थक्का जमा दे हे
तार के फुल्ली । गाँव में सुनS ह कोई के
टेटभैक के सूई लेइत ?
कटला पर खून रोके ला तार के फुल्ली चढ़ा द । ऊ जखम के ठीक
होयले पर अपने आप उखड़त ।
जरना के तो राजा हे तार के पेंड़ ।
खगड़ा,
खँउका आउ बलुरी जइसन जारन के जोड़ लगा के देखाबे तो कोई । अब
तो गाँवों में गैसे चुल्हा पर खाय बनबइत हे तइयो गरीब के घर में तारे के पेंड़ के
बल पर चुल्हा जरS
हे ।
डोमन डोम डमको से रेसा निकाल-निकाल
के सालों मोट-पातर रस्सी बाँटइत रहS हे । तार के रस्सी अजबे मजबूत न होबS हे ! तार के बट्टा मउनी तो मने मोह ले हे । खगड़ा के काँप से बीनल झरेलिया के
झारू दूरा-दलान,
गउशाला, खरिहान सगरो
बहारे के काम आबS
हे ।
इमारती लकड़ी में सखुआ, शीशम आउ सागवान के बाप हे तार के लकड़ी । धरमदेव बाबू हीं
धरन आउ बँड़ेरी आल औलाद से तारे के चलल आबित हे । कन्हाई काका के कोठा के सब सहतीर
आउ बरोगा तो तारे के देल हे । कै पीढ़ी बीत गेलइन, होलइ हे आज तक कुछो ?
धरती के बचाबे वाला आउ पेंड़ भले
होयता कोई बाकि तार के उतारे । तार के जड़ी तो एतना मजबूत होबS हे कि बितना बेलदार बाप-बेटा बेदम हो गेल कबारित-कबारित
बाकि दू दिन में ओकरा से एगो तार के पेंड़ न गिरल ।
हमर गाँव के नदी पाँच दने धारा बदल
लेलक हमरे देखित-देखित । पुरबारी बगइचा में दिनों में अंधार रहS हल । अइसन घना बिरिछ -- अह रे अह ! देखित मन मोहS हल । आम के ऊँचा-ऊँचा पेंड़ आउ बर के बड़ा-बड़ा दरखत
देखित-देखित साफ हो गेल नदी में कट के । आज ऊ जगह केतना बड़का खार हे ! बाकि ओकरे
से सटले तीन सौ तार के तरबाना में ताड़ी के आजो राम राज हे । ऊ न कटल । हमर बाबा के
बाबा के परबाबा के छरबाबा के लकड़बाबा बताबS हलन कि बाबू ! बबे आदम से एकरा गङ्गा जी भी कुछो न बिगाड़लन ।
पदना पासी के पुतोह आउ पोता-पोती पटना
में ताड़ी के दोकान खोल देलक । मिलाबट आउ संकरण के जुग में सब चीज प्रदूषित हो गेल
। फल शब्जी दूध दबाई अनाज आउ कउची में न रसायन के प्रयोग होबे लगल ? का रह गेल शुद्ध ? बाकि तार के पेंड़ में न कोई सूई भोंकलक न फेद्दा आउ बलुरी पर दबाई छींटलक ।
छींटत भी कइसे ?
छींटथ नS ! उनको
मुँहें पर छिंटा जयतइन । एतने न उँच्चे होबS हे एकर पेंड़ कि सब हार जयता । लउका के लत्तर आउ पपीता के पेंड़ में सुई घोंपे
वाला भोंक के देखथ तनी तार के पेंड़ में । भोंकाS जयतइन का ?
सुइये टुट जयतइन ।
इहे गुने कहS ही कि भगवान के बनबल सबसे शुद्ध रस हे ई । धुरियो गरदा ओतना
ऊँचाई पर न जाये एकरा में । तन-मन के तरो
ताजा कर दे हे तार के ताड़ी । जेई पीलक सेई कहलक कि अह रे अह ! चना के चखना न त
ललका मिचाई देल आलू के चोखा में टेस निमक दे के चटखारा लेके गट-गट पीयS न ताड़ी ! ताड़ी पीये ला भी लोटा गिलास मग आउ जग के जरूरत न
परे । खगड़े के दोना से खड़े-खड़े पी लS । पहिले एकरा पर ट्री टैक्स लगS हल । अब फ्री टैक्स हे । धरती पर के असली सोमरस ईहे हे ।
तार के भी दू गो किस्म हे --- 1 फेदहा आउ 2 बलुरी । बलुरी तार के ताड़ी खाली पेटे मुँहलुकाने में दू दोना सालो पीये वाला
के कोई बेमारी न होबे । केश न पके न झरे । दाँत से तो तार के पेंड़ में छेद कर देत
। फेदहा तार के फेद्दा गरमी के दुफरिया में घउद के घउद काट के कोबा खाय में जे मजा
मिलS
हे कि अह रे अह !
तार के तना आउ जड़ी भईंस नियन करिया भुट
भुट होबS
हे । तार के खगड़ा होबS हे हरियर चुह-चुह । पेंड़ लम्मा तो एतना कि अकासे छू देत । पर्यावरण के प्रहरी
पेंड़ तार के निर्विवाद मानल जा हे । अइसन सब गुण से भरल तार के पेंड़ के राष्ट्रीय
पेंड़ घोषित करबा देबे के चाही ।
तार के पेंड़ रोप के पटबइत सुनलS हे आज तक कोई के ? अइसहीं अँउड़ेरल रहला में ही ई एतना थेथर होबS हे कि कबारले न कबरे ।
सरकार के रोज बढ़इत बिजली के दर
आउ बिजली विभाग के बदहाली के तार के पंखा पर कोई प्रभाव न परे । केतनो बिजली संकट
रहे,
खगड़ा के बेना डोलाबे से के रोकS हे तोरा ? तार के पंखा
लेके हउँकइत रहS
हाथ से । ओकरा में न बिजली के खपत न बिल भरे के झमेला
गरीब गुरबा आउ गाँव में तनी गो -
गो लइकन जब बड़कन इया सियान लोग के पान खयले देखS हे त ओकरो मन ललक जा हे । पइसा न हे त का होयल ? पान खाय ला तो मन लिलकइते हे । चलS कोई बात न हे । खगड़ा के पत्ता में शीशो के चार-पाँच पत्ता रख के लगS हे चिबाबे । देखS अब ओकर मुँह लाल-लाल । लार टपकाबइत बार-बार थूकइत हे ई देखे ला कि थुकबा लाल
बिगा हे कि नS
! बैल नियन जीभ निकाल के बार-बार आँख नीचे कर के देखइत हे कि
केतना लाल होयल हे जिभिया । मिलतो ई मजा मुम्बइया आउ बनारसी पान में ? मगहिया पान के पक्कल पत्ता से जादे मजा न मिलS हइ तार के ई लइकइया पान में ?
पान खा के फेद्दा गाड़ी लगत चलबे ।
ओहे तो लइकन के जान हे । दू गो फेद्दा के बीच में रहेठा के एगो गुल्ली डाल के बना
लेलक गाड़ी आउ चल जाइत हे ओकरा चलबइत बिना सड़के के । आरिए-पगारिए, छउर पर मोंहें, पइन पर,
नदी के ऊ पट्टी, बल्ला पर --- सगरो घूमिए लाबत कि ! समाजोपयोगी कार्य (SUPW) तो शहरे के लइकन जानS हथ । गाँव में तो हस्तकर्म खगड़ा के चटाई , काँप के झारू आउ डमको के रसिये रहS हल । आज से नS
दद्दे राज से ।
जमींदारी प्रथा के जमाना में धार
सहिंत्ते डमको से अदमी पिटा हल पाया में बान्ह के । अब तो थाना में सिपाहियो के ऊ
अधिकार न हे । आज तो आजाद भारत में सबकोई आजाद हे । ई खुशकिस्मती हे देश के हर
नागरिक के लिए ।
तार के पेंड़ एकपोर्रा होबS हे । तीस-चालीस हाथ के इया कोई-कोई ओकरो से उँच्चा । एतना
लम्बा होयला पर भी तार के पेंड़ एकपोरे रहS हे । एकरा में कोई डाली इया शाखा न निकले । तार हर महीने एक पत्ता दे हे । एकर
माने ई होयल कि एक तार में हर साल बारह खगड़ा निकलS हे । तार के पत्ता के खगड़ा कहल जा हे । खगड़ा के डण्ठल वाला हिस्सा के डमको कहल
जा हे । डमको के जउन भाग तार के पेंड़ से सट्टल रहS हे जे बाद में उखड़ भी जा हे ओकरा खउँका कहल जा हे । तार के फर दू रंग के होबS हे । नर तार में लम्बा-लम्बा फर के बलुरी कहल जा हे । मादा
तार में गोल-गोल फल लगS
हे ओकरा फेद्दा कहल जा हे । फेद्दा हरदम घउद में रहS हे । एक घउद में दर्जनों फेद्दा रहS हे । एक पेंड़ में दर्जनों घउद होबS हे जे साल में एक्के बार फरS हे लगभग माघ-फागुन में । यानि कि तार के एक पेंड़ में सैंकड़ो फेद्दा होबS हे । तार के फल के रस के ताड़ी इया तरकुल इया तरकुलारिष्ट भी
कहल जा हे । ताड़ी तो नर आउ मादा दुनों अर्थात बलुरी आउ फेद्दा दुनों में से चूअ हे
। फेद्दा के कच्चे में काटला पर ऊ में से कोबा निकलS हे जे खाये में बड़ी सबदगर आउ हलका मीठा लगS हे जेकरा में अपार पाचन शक्ति रहS हे । कच्चा फर चइत आउ बइशाख में रहS हे । कोवा में के पानी पीये में बहुत नीमन लगS हे । एक फेद्दा में तीन कोबा रहS हे । जादे जोबाS गेला पर कोबा तनी कड़गर हो जा हे जेकरा खयला पर पेट पिराय के डर लगल रहS हे जे लगभग जेठ में रहS हे । ई गुने कोबा खिंच्चे में खाय के चाही आउ ओहे बढ़ियाँ भी लगS हे । बड़ी जादे जोबा गेला पर इहे कोबा आँठी बन जा हे । बरसात
में यानि अंतिम अषाढ़ से शुरू आसिन तक तार के फेद्दा पक के अपने चुअ हे । एक-एक कर
के ऊ नीचे टपकS
हे जेकरा गाँव के लोग खास करके गरीब परिवार बड़ी चाव से खा
हे ।
तार के पक्कल फेद्दा खाय में
उत्तम स्वास्थ्य लागी बड़ी फायदेमंद हे । एक फेद्दा समुच्चे खाय में तो नीमन नीमन
के पेट भर जा हे । जादे तर लोग एक फेद्दा
के फार के ओकरा में के तीनों आँठी अलगे-अलगे करके एक-एक आँठी तीन आदमी खा
हे । अइसे जे हहिया होयता ऊ तो एक से जादे फेद्दा अकेलहीं खा जयता । कोई-कोई
फेद्दा दुअँठिया होबS
हे । ओकरा में दुइये
आँठी रहS हे । फेद्दा चोभ के ओकर आँठी लोग अप्पन खँढ़ी-कोला में फेंक
दे हे इया मट्टी-गनउरा तर झाँप दे हे जेकरा में नीचे जड़ी निकल जा हे ।
कातिक महीना में दिवाली-छठ के समय
ऊ
जमल आँठी कबार के ओकरा गँड़ासी इया पँसुली से काटS हे त ओकर भितरे से उज्जर कोवा निकलS हे । ओहो खाय में बड़ी सबदगर आउ हल्का मीठा लगS हे ।
आँठी के नीचे जमल जड़ी जे
उज्जर हल्का भूअर रंग के होबS हे ओकरा परम्
कहल जा हे । परम् पानी में उसिन के सकरकन जइसन खायल जा हे । एकर सबाद भी ओइसने
लगतो । परम् के खूब नीमन तरकारी बनS हे जे खाय में बड़ी सबदगर आउ सेहत लागी बड़ी फायदेमंद होबS हे । कोबा के ओहे आँठी यदि न कबारलS त जम के तार के पेंड़ हो गेलो आउ का !
सुखल फेद्दा के फेदउड़ी कहल
जा हे । क्रिकेट आउ हॉकी खेल के उत्पत्ति फेदउड़िए के खेल से हे । गाँव में लइकन
सुक्खल फेद्दा के डमको से मार-मार के खेल खेला हे । एकरा फेदउड़ी के खेल कहल जा हे
। ई आज से न सदियों से, वर्षों से चलल
आबित हे । जब अंग्रेज इहाँ आयल त फेदउड़ी के खेल देख के दंग रह गेल । ई खेल ओकरा
बड़ी आकर्षित कयलक । बाकि इहाँ के अलावे हर जगह तो तार के पेंड़ होबे न । त इंगलैंड
में डमको आउ फेद्दा तो मिलल न । साथहीं सालो ई उपलब्ध रहे न । ओहे डमको के बदले
लकड़ी के चौड़ा पट्टी बना के आउ सुक्खल फेदउड़ी के जगह लकड़ी के गेंदा बना के खेले लगल
।
बाद में ईहे खेल के नाम
क्रिकेट पर गेल । दुनिया मे जहाँ-जहाँ अंग्रेज के राज हल उहाँ-उहाँ इ फेदउड़ी के
खेल क्रिकेट बन के पसर गेल । समय के अनुसार खेल के नियम कानून विकसित होइत गेल ।
आज दुनिया के मशहूर खेल क्रिकेट वास्तव में भारत के देहाती खेल फेदउड़िये के विकसित
रूप हे । फेदउड़ी तो भारत के गाँव-गाँव के खेल शुरुए से रहल हे । ई तो लोक जन मानस
में शदियों से रचल-बसल हइये हल । इहे कारण हे कि भारत में क्रिकेट सबसे जादे
लोकप्रिये होयल हे । अंतर एतने हे कि मंगनी के डमको के बदले लकड़ी के हजारों रुपया
के बल्ला आ गेल आउ सुक्खल फेद्दा के जगह सैंकड़ो रुपया के गेंद अपना लेलक । ईहे
डमको आउ फेदउड़ी के दुसरका खेल हे हॉकी जेमें भारत के दबदबा बीसवीं सदी तक रहल ।
का करबS ? ई बाजारवाद के युग हे । आज कोई अप्पन
चांदी के रुपइया गगरा में बंद करके धरती में गाड़ के थोड़िये रखित हे ! रखहूँ के न
चाही । धरती में गाड़ल रुपइया देश के पूंजी के रीढ़े तोड़ दे हे । बाकि ई बात सिखयबS केकरा ? आज तो लूट-पाट
के नयकन अमीर बनल लोग बोंड़े के बोंड़े रुपइया गोबरे आउ गनउरा में गाड़ देइत हे । आम अदमी न अपन पइसा रोज के काम
में लाबS
हे ! जादे होयला पर बैंक इया पोस्टऑफिस में जमा करS हे । बाकि देश के तथाकथित करणधार तो विदेशे में भेज दे हथ
सब पइसा । उनका पर जब कानून के शिकंजा कसS हे इया अपने मर गेलन त ऊ सब रुपइया विदेशे के हो जा हे । इहे में तो अपन देश
कंगाल होयल हे । पहिले विदेशी इहाँ आके लूटS हल । आज अपन देश के आका लोग अपने से लूट-लूट के विदेश ओलन के दे आबइत हथ । बात
करित हलिओ पहिले जमाना में रुपइया धरती में गाड़ के रखे के । त ऊ सहचार तो आझो हे ।
जब विदेश में जमा निकासी में कानून के शिकंजा कसला पर दिक्कत होबे लगS हे त आजकल तो रुपइया लोग गोबरे में गाड़ देइत हथ । गनउरा तर
घूँसेड़ देइत हथ । लS
कहला पर चेहाय लगलS ? न का सुनलS
हे ?
आयकर के छापा परला पर
केतना बोंड़ा नोट तो गंगा जी में डला गेल । केतना तो बोंड़े के बोंड़े नोट के
जरा देलन । केतनन ट्रक के ट्रक जब्त होयल नोट के कोई लेताहरे न हे । केतनन लॉकर
में भरल हीरा जवाहरात आउ नगदी तो बैंके के हो गेल काहे कि ओकरा लेबे वाला कोई
मालिके न हे । देवाल गिराबे में केतना सोना के बिस्कुट,गुल्ली आउ ईंटा लूट के तो मजदूर मालेमाल हो गेल । बाप दादा
धन दबा देलन आउ बेटा पोता के पते न हे । चलS फेदउड़ी के साथे क्रिकेट आउ हॉकी के बाजारबाद से संबंध जोड़े के बहाने हमहूँ देश
के अर्थव्यवस्थे सुधारे में लग गेली हल । हटाबS ऊ सब बात ।
हाँ, त तार के पेंड़ में बहुत गुण हे । आंधी तूफान में किसिम-किसिम के बहुते पेंड़
उखड़ जा हे बाकि तार के पेंड़ आज तक सुनलS है गिरित ?
इहे गुने सरकार से जब बिजली के तार ले जाये ला खम्हा न जुटे
तब गाँव के अदमी सब तारे के पेंड़ में खूँटी गाड़-गाड़ के तार तान दे हे । ई एकदमे
अनुचित बात हे । एकरा से अदमी इया जानवर के करेंट मारे के डर रहS हे । आजकल तो डिश टी• वी•
के जमाना में केबुल ऑपरेटर के खूबे रामराज हे । पेंड़े-पेंड़
तारे-तार ई गाँव से ऊ गाँव तक अपन कनेक्शन झट से पहुँचा देइत हे । तार के पेंड़ न
रहला पर ऊ केतना खम्हाँ-पोल गाड़त हल बेचारा !
तार के तीन गो जाति संसार के सब
हिस्सा में मिलS
हे । तीनों प्रजाति के फल ओतने महत्वपूर्ण हे । तीनों के रस
भी ओतने चाव से लोग पीय हथ । जइसे तीन लोक ------ आकाश लोक, पाताल लोक आउ भू लोक हे । ओइसहीं तार के तीनों प्रजाति हे ।
काल,
परिवेश आउ भौगोलिक परिस्थिति इया जलवायु के भिन्नता के कारण
बनाबट में अंतर के चलते एकर नाम तीन गो पर गेल हे ------1 तार 2 नरियर आउ 3 खजूर । तीनों के पत्ता के चटाई, बट्टा, मउनी, टोकरी, रस्सी से लेके
साज-सजावट के अनेकों सामान संसार भर में अलग-अलग तरीका से बनाबल जा हे । तार के
पत्ता के बनाबल कलाकृति ! बाप रे ! देखबS त आँख फटल के फटले रह जयतो !
तार भारतीय अर्थव्यवस्था के रीढ़ हे ।
रीढ़ के हडिये नियन ई मजबूत भी होबS हे आउ सोझ भी । तार तो एतना मजबूत होबS हे कि एकरा सामने लोहा आउ स्टील सब फेल ।
तार के खगड़ा खँउका फेद्दा
।
झरे न, केतनों फेंक लबेद्दा ।।
तार में गुण बहुत हे
जीये बरिस हजार ।
तार बिना संसार में
सब हे तारे तार ।।
हमरा तो बस तारे पर गड़ल रहS हे नैन ।
तरबाना में तार तर मिलS हे चितचैन ।।
त तार के पेंड़ के जल्दीये
राष्ट्रीय महत्व के पेंड़ घोषित करबाबS !
दिव्य रश्मि केवल समाचार पोर्टल ही नहीं समाज का दर्पण है |



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