भटकते हुए मजदूरों की ओर से---------
बडे सपने सजाकर आए थे
एक दिन तुम्हारे द्वार ,
सुना था कि शहर में मिल रहा
बिन मांगे हीं रोजगार ।
हमारे हीं पशीने से तुम्हारा
बढ गया व्यापार ,
आज तेरे हीं कारण हो गये
हम सब बहुत लाचार ।
सोंचा था कि अपने बच्चों को
रखेगे नहीं अनपढ़,
पढायेगे- लिखायेगे
होगा सपनों का संसार ।
भयंकर त्रासदी में तुमने अपना
दिखा दिया औकात,
न कोई राह दिखता है
न दिखता कोई भी आसार ।
भूखे- प्यासे हैं बच्चे
सभी के पाँव में छाले,
मन में दृढ़ है संकल्प
पहुँचेगे हम अपने द्वार ।
खाते रहें राहों में ठोकर
आज हम मजदूर,
यादो में बस अब रह गया है
अपना हीं घर-द्वार ।
उषा किरण श्री,मुजफ्फरपुर,बिहार ।
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