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“वंशज” का भ्रम और समाज की सच्चाई

“वंशज” का भ्रम और समाज की सच्चाई

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

भारतीय समाज में एक अजीब सी प्रवृत्ति चली आ रही है-अपने अस्तित्व को महान बनाने के लिए उसे किसी दिव्य या ऐतिहासिक व्यक्ति से जोड़ना। कोई स्वयं को भगवान परशुराम का वंशज बताता है, तो कोई भगवान श्री कृष्ण से अपनी रक्त-रेखा जोड़ता है। सुनने में यह गर्व का विषय लगता है, लेकिन जब इसे तर्क और इतिहास की कसौटी पर परखते हैं, तो कई सवाल उठ खड़े होते हैं।

इतिहास बनाम आस्था

सबसे पहले ही एक स्पष्ट विरोधाभास दिखता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान परशुराम आजीवन ब्रह्मचारी रहे—तो उनके “वंशज” होने का दावा जैविक रूप से कैसे संभव है?

इसी तरह भगवान श्री कृष्ण के संदर्भ में महाभारत के बाद यादव वंश के विनाश का वर्णन मिलता है, जिसे गांधारी के श्राप से जोड़ा जाता है। अगर वंश समाप्त हो गया, तो फिर आज के “वंशज” कहाँ से आए?

स्पष्ट है-यहां “वंशज” शब्द का उपयोग तथ्यात्मक कम, प्रतीकात्मक ज्यादा है।

वंशज या विचारधारा के उत्तराधिकारी?

वास्तव में, लोग जैविक वंशज होने का दावा नहीं कर रहे, बल्कि एक परंपरा, एक विचारधारा, एक गौरवशाली छवि से स्वयं को जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

ब्राह्मण या भूमिहार जब स्वयं को परशुराम से जोड़ते हैं, तो वे उनके तेज, तप और धर्मरक्षा के प्रतीक को अपनाना चाहते हैं।

इसी तरह यादव समुदाय जब कृष्ण से जुड़ाव व्यक्त करता है, तो वह नीति, नेतृत्व, कूटनीति और लोककल्याण की उस विरासत को अपना मानता है।

लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब यह प्रतीकात्मक संबंध अहंकार और श्रेष्ठता के दावे में बदल जाता है।

जब “मैं अमुक भगवान का वंशज हूँ” जैसी बातें कही जाती हैं, तो यह अनजाने में समाज में ऊँच-नीच की भावना को जन्म देती हैं। यह प्रवृत्ति सामाजिक समरसता के बजाय विभाजन और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देती है।

भारतीय संस्कृति का मूल संदेश तो यही रहा है-“वसुधैव कुटुम्बकम्” - अर्थात पूरा विश्व एक परिवार है।

यदि हम सभी एक ही परमात्मा की संतान हैं, तो फिर यह वंश और उपवंश का विभाजन क्यों?

मिथक, मनोविज्ञान और पहचान

मनुष्य स्वभाव से अपनी पहचान को मजबूत करना चाहता है। जब उसे अपने वर्तमान में कोई विशेष गौरव नहीं दिखता, तो वह अतीत में गौरव खोजता है-चाहे वह ऐतिहासिक हो या पौराणिक।

यह प्रवृत्ति केवल भारत तक सीमित नहीं है; विश्व के अनेक समाजों में लोग स्वयं को किसी राजा, योद्धा या देवता का वंशज मानते हैं।

लेकिन आधुनिक युग में, जहां विज्ञान, तर्क और समानता की बात होती है, वहां इस तरह के दावे आत्ममंथन की मांग करते हैं।

सत्य क्या है?

सत्य यह है कि

* हममें से अधिकांश का कोई प्रमाणित दिव्य वंश नहीं है,

* और यदि होता भी, तो उसका आज के जीवन में कोई व्यावहारिक महत्व नहीं होता।

मनुष्य की पहचान उसके कर्म, चरित्र और योगदान से बनती है-न कि उसके कथित वंश से।

विरासत को समझें, अहंकार को नहीं|

जरूरत इस बात की है कि हम

* परशुराम से धर्म और साहस सीखें,

* कृष्ण से नीति और करुणा सीखें,

परंतु उनके नाम पर श्रेष्ठता का दावा न करें।

“वंशज” होने का दावा अक्सर एक सामाजिक भ्रम है, जो व्यक्ति को क्षणिक गर्व तो देता है, परंतु समाज को विभाजित भी करता है।

आज आवश्यकता है कि हम अपने अतीत का सम्मान करें, परंतु उसमें उलझे नहीं—और अपने वर्तमान को इतना श्रेष्ठ बनाएं कि आने वाली पीढ़ियाँ हमें अपना आदर्श मानें, न कि हम किसी और के नाम पर अपना अस्तित्व सिद्ध करने का प्रयास करें। हमारा स्पष्ट मानना है :-“अगर वंश पर गर्व करना ही है, तो अपने कर्मों से ऐसा वंश बनाइए, जिस पर भविष्य गर्व करे।”

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