युवा नेतृत्व से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा-संस्कृति की दिशा में नई पहल की आशा जागी
- 36 वर्षों से सूख रही शिक्षा-संस्कृति की धारा के पुनः सिंचित होने की उम्मीद
हृदय नारायण झा
पटना। बिहार की राजनीति में जब भी युवा नेतृत्व को अवसर मिला है, तब समाज में एक नई ऊर्जा और नई दिशा का संचार हुआ है। वर्तमान परिदृश्य में जब राज्य की सत्ता की बागडोर ऊर्जावान युवा नेता सम्राट चौधरी के हाथों में आई है, तब आम जनमानस में आशा की एक नई किरण जागृत हुई है। यह विश्वास प्रबल हुआ है कि युवा नेतृत्व न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता को बढ़ावा देगा, बल्कि राज्य को समग्र और सतत विकास की दिशा में भी अग्रसर करेगा।
इसी संदर्भ में राज्य के सुप्रसिद्ध योगदर्शन साधक, गीतकार एवं चिंतक हृदय नारायण झा ने ‘दिव्य रश्मि’ से विशेष बातचीत में अपने विचार साझा करते हुए कहा कि बिहार, जो कभी शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित रहा है, विगत लगभग 36 वर्षों से इन मूलभूत क्षेत्रों में पिछड़ता चला गया है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि शिक्षा और संस्कृति—जो किसी भी समाज की आत्मा होती हैं—आज अपने मूल स्वरूप से भटक चुकी हैं।
हृदय नारायण झा ने आशा व्यक्त की कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साथ-साथ उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी एवं बिजेन्द्र कुमार यादव के समन्वित और दूरदर्शी नेतृत्व में राज्य की शिक्षा एवं सांस्कृतिक व्यवस्था पुनः पटरी पर लौट सकती है। यदि ऐसा संभव हुआ, तो बिहार एक बार फिर अपनी प्राचीन गौरवशाली पहचान को पुनः स्थापित कर सकेगा और राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराएगा।
उन्होंने कहा कि बिहार की पहचान केवल भौतिक विकास से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं से रही है। संस्कृत, मैथिली, भोजपुरी, मगही, अंगिका, बंगला जैसी भाषाओं के विद्वानों, साहित्यकारों, कवियों, लेखकों एवं शोधकर्ताओं ने इस धरती को ज्ञान और रचनात्मकता से समृद्ध किया है। किंतु दुर्भाग्यवश, बीते दशकों में इन प्रतिभाओं को अपेक्षित सम्मान और अवसर नहीं मिल पाया। इससे न केवल इन क्षेत्रों में निराशा का वातावरण बना, बल्कि कई नवोदित प्रतिभाएं भी उपेक्षा का शिकार हुईं।
झा ने स्पष्ट रूप से कहा कि नई सरकार से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह इन उपेक्षित वर्गों को उनका अधिकार दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाएगी। इसके लिए आवश्यक है कि राज्य की प्रमुख सांस्कृतिक संस्थाओं—बिहार संगीत नाटक अकादमी एवं बिहार ललित कला अकादमी—का विधिवत गठन या पुनर्गठन किया जाए और उन्हें अनुभवी एवं विशेषज्ञ व्यक्तियों के मार्गदर्शन में संचालित किया जाए। इससे न केवल सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलेगा, बल्कि कला और साहित्य के क्षेत्र में नई प्रतिभाओं को भी मंच प्राप्त होगा।
इसके अतिरिक्त, उन्होंने देश के गौरवशाली संस्थान भारतीय नृत्य कला मंदिर के पुनरुत्थान पर भी विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि इस संस्थान को उसके मूल उद्देश्यों के अनुरूप पुनर्जीवित किया जाना चाहिए, ताकि यह पुनः राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिष्ठा को प्राप्त कर सके और नई पीढ़ी को भारतीय शास्त्रीय एवं लोक कलाओं से जोड़ सके।
हृदय नारायण झा ने यह भी कहा कि बिहार की लोक सांस्कृतिक विरासत, जो कभी गांव-गांव में जीवंत रूप से विद्यमान थी, आज विलुप्ति के कगार पर है। लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक उत्सव और रीति-रिवाज धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि सरकार इन धरोहरों के संरक्षण और संवर्धन के लिए योजनाबद्ध प्रयास करे। विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी सांस्कृतिक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए, ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रह सके।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। केवल भवन निर्माण और आधारभूत संरचना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षण की गुणवत्ता, शिक्षकों का प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम की प्रासंगिकता और तकनीकी समावेशन पर भी ध्यान देना आवश्यक है। यदि इन पहलुओं पर गंभीरता से कार्य किया गया, तो बिहार पुनः शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी राज्य बन सकता है।
अंततः, हृदय नारायण झा ने अपने वक्तव्य को आशावादी स्वर में समाप्त करते हुए कहा कि नई सरकार से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में बीते 36 वर्षों के सूखे को समाप्त कर एक नई हरियाली लाएगी। यदि यह संकल्प साकार होता है, तो बिहार न केवल अपने अतीत के गौरव को पुनः प्राप्त करेगा, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी एक उज्ज्वल मार्ग प्रशस्त करेगा।
हृदय नारायण झा द्वारा रचित (विस्तारित संस्करण)
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