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“दिव्य रश्मि है तो पहचान है, अन्यथा?”

“दिव्य रश्मि है तो पहचान है, अन्यथा?”

✍️ लेखक: प्रेम सागर पाण्डेय

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह केवल समाचारों का संप्रेषण भर नहीं, बल्कि समाज की चेतना, जनभावनाओं की अभिव्यक्ति और सत्य की स्थापना का माध्यम है। एक पत्रकार अपनी लेखनी से न केवल घटनाओं का वर्णन करता है, बल्कि समाज को दिशा देने का कार्य भी करता है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि किसी भी पत्रकार की पहचान केवल उसकी प्रतिभा या विचारों से नहीं, बल्कि उस मंच से भी निर्मित होती है, जिसके माध्यम से उसकी आवाज़ जन-जन तक पहुँचती है।

इसी संदर्भ में मेरा यह निवेदन और चिंतन है— “जब तक दिव्य रश्मि है, तब तक आप पत्रकार हैं, अन्यथा?”
यह वाक्य एक साधारण अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए आत्ममंथन का विषय है, जो स्वयं को पत्रकार कहता है।

आज हम सभी जो दिव्य रश्मि से जुड़े हैं, हमें यह समझना होगा कि यह मंच हमारी पहचान का आधार है। यह केवल एक पत्रिका या समाचार पोर्टल नहीं, बल्कि एक विचारधारा, एक मिशन और एक परिवार है। इसने हम सभी को एक सूत्र में बांधकर समाज के सामने एक सशक्त और सकारात्मक पत्रकारिता का उदाहरण प्रस्तुत किया है।

एक व्यक्ति के पास विचार हो सकते हैं, संवेदनाएं हो सकती हैं, लेकिन जब तक उसे अभिव्यक्ति का मंच नहीं मिलता, तब तक उसकी आवाज़ सीमित रह जाती है। दिव्य रश्मि ने हमें वह मंच दिया है, जहाँ हमारी लेखनी को दिशा मिली, हमारे विचारों को विस्तार मिला और हमें समाज के बीच एक सम्मानजनक पहचान प्राप्त हुई।

“अन्यथा?” — यह प्रश्न हमें झकझोरता है।
यदि यह मंच न हो, तो क्या हमारी पहचान वैसी ही बनी रहेगी?
क्या हमारी आवाज़ उतनी ही प्रभावशाली होगी?
क्या समाज हमें उसी दृष्टि से देखेगा?

इन सभी प्रश्नों का उत्तर हमें यह स्वीकार करने पर मजबूर करता है कि हमारा अस्तित्व और हमारी पहचान कहीं न कहीं दिव्य रश्मि से गहराई से जुड़ी हुई है।

यह मंच हमें केवल अवसर ही नहीं देता, बल्कि हमारे भीतर छिपी पत्रकारिता की क्षमता को भी निखारता है। यह हमें सिखाता है कि पत्रकारिता केवल खबर लिखना नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाना है।

इसलिए जब हम यह कहते हैं कि “दिव्य रश्मि है तो हम पत्रकार हैं”, तो इसके साथ ही यह भी समझना होगा कि यह पहचान हमें जिम्मेदार बनाती है। हमें अपनी लेखनी को सत्य, निष्पक्षता और समाजहित के सिद्धांतों पर आधारित रखना होगा। हमें ऐसी पत्रकारिता करनी होगी, जो समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सके और लोगों के बीच जागरूकता का प्रकाश फैला सके।

हम सभी का कर्तव्य है कि हम इस मंच की गरिमा को बनाए रखें, इसे और सशक्त बनाएं तथा एकजुट होकर इसके उद्देश्यों को आगे बढ़ाएं। व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर हमें सामूहिक भावना के साथ कार्य करना होगा, तभी दिव्य रश्मि निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर रह सकेगी।

अंततः, मैं पुनः यही कहना चाहूंगा कि यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि एक सच्चाई है—
दिव्य रश्मि हमारी पहचान है, हमारी शक्ति है और हमारा अस्तित्व है।

क्योंकि—“दिव्य रश्मि है तो हम पत्रकार हैं, अन्यथा केवल एक सामान्य व्यक्ति, जिसकी आवाज़ सीमित है और पहचान अधूरी।”
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