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ब्रह्मांडीय चेतना, स्मृति ग्रंथ

ब्रह्मांडीय चेतना, स्मृति ग्रंथ

: सत्येंद्र कुमार पाठक
शाश्वत मर्यादा बनाम संवैधानिक अधिकार का भारतीय वांग्मय में समाज का संचालन 'धर्म' (कर्तव्य) के आधार पर होता आया है, जबकि आधुनिक भारत का संचालन 'विधि' (संविधान) के आधार पर हो रहा है। आज जब हम मनुवाद, दैत्यवाद, वायुवाद, जलवाद और स्वर्ण-दलित-आदिवासी जैसे सामाजिक वर्गीकरणों की बात करते हैं, तो वास्तव में हम उस 'ब्रह्मांडीय व्यवस्था' और 'संवैधानिक न्याय' के बीच के सेतु की तलाश कर रहे होते हैं।
स्मृति ग्रंथों में वर्णित वायुवाद, जलवाद, अग्निवाद, खगवाद और वृक्षवाद केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि प्राचीन भारत के वैज्ञानिक और पारिस्थितिक शोध के परिणाम हैं। जलवाद और भू-वाद: मनुस्मृति और अन्य ग्रंथों में जल को 'जीवन' और भूमि को 'माता' माना गया। शोधपूर्ण दृष्टि से देखें तो यह 'सतत विकास' (Sustainable Development) का आदि-सिद्धांत है। वर्तमान संविधान के अनुच्छेद 48A और 51A (g) इसी प्राचीन 'वाद' का आधुनिक कानूनी रूप हैं। खगवाद और वृक्षवाद: जैव विविधता (Biodiversity) का संरक्षण हमारे संस्कारों में 'वृक्षारोपण' और 'जीव दया' के रूप में निहित था। आज जब हम ग्लोबल वॉर्मिंग की चर्चा करते हैं, तो समाधान उन्हीं स्मृतियों के 'प्रकृतिवाद' में मिलता है।
स्मृति ग्रंथों में दो गुरुओं का उल्लेख है— देव गुरु बृहस्पति (विवेक और नियम) और दैत्य गुरु शुक्राचार्य (नीति और शक्ति)। आधुनिक मनुवाद: आज 'मनुवाद' शब्द का प्रयोग अक्सर जातिगत संकीर्णता के लिए किया जाता है। किंतु, वास्तविक शोध बताता है कि 'मनु' का अर्थ है 'मनुष्यता का विधान'। यदि हम जन्म-आधारित भेदभाव (जिसे संविधान के अनुच्छेद 17 ने प्रतिबंधित किया है) को हटा दें, तो मनुवाद का 'अनुशासन' पक्ष समाज के लिए आज भी प्रासंगिक है। दैत्यवाद का राजनीतिक रूपांतरण: वर्तमान राजनीति में 'दैत्यवाद' का प्रभाव वोट बैंक की कूटनीति में दिखता है। सत्ता प्राप्त करने के लिए समाज को जातियों (अति-पिछड़ा, महादलित) में बांटना शुक्राचार्य की उस कूटनीति का हिस्सा है जहाँ 'साध्य' (सत्ता) के लिए 'साधन' (नैतिकता) की बलि दी जाती है।
संविधान ने प्राचीन श्रेणियों को आधुनिक न्याय के ढांचे में ढाला है।।आरक्षण और प्रतिनिधित्व: यह केवल नौकरी का साधन नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन की पुनर्स्थापना है। समाज के वे अंग (दलित, आदिवासी, पिछड़ा) जो सदियों से निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर थे, उन्हें मुख्यधारा में लाना ही वास्तविक 'लोकतंत्र' है।
SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम: यह कानून समाज के लिए एक संदेश है कि किसी भी व्यक्ति की मानवीय गरिमा का उल्लंघन 'अधर्म' और 'अवैध' दोनों है।
UGC एक्ट और शिक्षा का लोकतंत्रीकरण: प्राचीन काल में ज्ञान (महासरस्वती का आशीर्वाद) कुछ वर्गों तक सीमित था। UGC एक्ट ने ज्ञान के द्वार हर उस युवा के लिए खोल दिए हैं जो मेधावी है, चाहे वह स्वर्ण हो या महादलित।
राजनीति का 'वोट बैंक' और बुद्धिजीवियों का निर्वासन सबसे संवेदनशील और शोधपूर्ण हिस्सा है। वर्तमान राजनीति ने संविधान की दुहाई देते हुए एक नया संकट पैदा किया है: बुद्धिजीवियों को किनारा: जब राजनीति 'तर्क' के बजाय 'तुष्टीकरण' पर चलती है, तो बुद्धिजीवी (Intellectuals) हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं। यह समाज के 'मस्तिष्क' को सुन्न करने की प्रक्रिया है। जातीय विखंडन: स्वर्ण, पिछड़ा, अति-पिछड़ा, दलित और महादलित—नेताओं ने इन शब्दों को 'सुरक्षा' के बजाय 'विभाजन' का हथियार बना दिया है। 'हम' (The People) होने का भाव अब 'मेरी जाति' के भाव में दब गया है। ऐतिहासिक भूमि से एक नए जन-आंदोलन की आवश्यकता है। जब तक महादलित या आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा का दीप नहीं जलेगा, तब तक संविधान के प्रावधान अधूरे हैं । स्वर्ण वर्ग को 'त्याग और जिम्मेदारी' और वंचित वर्ग को 'शक्ति और गरिमा' के साथ एक-दूसरे का पूरक बनना होगा।
ब्रह्मांड में सूर्य और चंद्र मार्गदर्शक हैं, वैसे ही समाज में 'विवेक' (बुद्धिजीवी) और 'शक्ति' (जनशक्ति) को मिलकर चलना होगा। संविधान की रक्षा केवल वकीलों या नेताओं का काम नहीं है, बल्कि यह 'हम' सबका दायित्व है। जाति के घेरे से निकलकर 'संवैधानिक नागरिक' बनना ही वह सांस्कृतिक पुनर्जागरण है, जिसकी प्रतीक्षा में बुद्ध और गांधी की यह भूमि आज भी खड़ी है।
संदर्भ मनुस्मृति: सामाजिक विधान और आधुनिक कानून की तुलना। भारत का संविधान: प्रस्तावना, मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 14-21) और निर्देशक तत्व। शुक्रनीति: दैत्य गुरु शुक्राचार्य की कूटनीति और वर्तमान राजनीति।UGC अधिनियम 1956: उच्च शिक्षा और सामाजिक समावेश का अध्ययन। लोकनायक जयप्रकाश नारायण: 'संपूर्ण क्रांति' के वैचारिक सूत्र।
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