समाज का हाल
संजय जैनगूँगे बहरों की बस्ती में
एक वक्ता पहुँच गया।
क्या-क्या उसने बोला
समझ कुछ भी नही आया।
बस हो हल्ला करके उसने
खूब तालिया बजबाया।
मन माने ठंग से उसने
अपनी बातें मनवाया।।
चारों तरफ हाल यही है
बस बने रहो गूँगे बहरे।
अब तो देर हो गई यारों
बनना पड़ेगा अंधा भी।
न कुछ देखो न कुछ सुनो
और न ही कुछ बोलो तुम।
तीनों चीजों को बंद करके
सिर्फ तमासा देखो तुम।।
इंसानी महत्वकांक्षाओं के चलते
सब कुछ नष्ट कर रहे।
हिटलर शाही अंदाज में
देखो कैसे बदल रहे।
राज पाठ और सर्व सम्मति का
अब देखो कहा दौर रहे।
अनपढ़ होकर तुम देखो
कैसे बातें मनवा रहे।।
अपनी हरकतों के कारण
समाज को ही बाँट दिया।
एक सूत्री समाज का अब
देखो क्या हाल किया।
बिना नियोजन के कारण ही
सब कुछ कैसे बिखर रहा।
अपनी जिद्द के कारण ही
समाज का सत्यानाश किया।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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