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ज्येष्ठ - तपन, त्याग और वैश्विक जल संस्कृति

ज्येष्ठ - तपन, त्याग और वैश्विक जल संस्कृति

सत्येन्द्र कुमार पाठक
प्रकृति का प्रचंड तेज और ज्येष्ठ का उद्भव का भारतीय कालगणना के अनुसार ज्येष्ठ मास केवल एक महीना नहीं, बल्कि मानवीय सहनशक्ति और प्रकृति के अंतर्संबंधों की एक महान व्याख्या है। हिंदू पंचांग के इस तीसरे मास में सूर्य अपनी पूर्ण ऊर्जा के साथ पृथ्वी का अभिषेक करता है। 'ज्येष्ठा' नक्षत्र से युक्त पूर्णिमा के कारण इसका नाम 'ज्येष्ठ' पड़ा। शाब्दिक अर्थ में भी यह 'श्रेष्ठ' और 'बड़ा' है। यह वह समय है जब आकाश से अग्नि बरसती है और धरती जल के एक-एक बिंदु के लिए लालायित रहती है। इसी भीषण परिस्थिति में भारतीय मनीषियों ने 'जल संस्कृति' के उन सूत्रों को जन्म दिया, जो आज के वैश्विक जल संकट के दौर में भी एक प्रकाश स्तंभ की तरह हैं।: 'ज्येष्ठो' ब्रह्म वेदों और पुराणों में ज्येष्ठ को सृष्टि की 'ज्येष्ठता' (सर्वोच्चता) से जोड़ा गया है। अथर्ववेद में 'ज्येष्ठो ह ब्रह्म' कहकर परमात्मा को सबसे बड़ा माना गया है। ज्येष्ठ मास की प्रचंड सौर ऊर्जा उस ब्रह्म तेज का प्रतीक है जो अशुद्धियों को जलाकर सृजन का मार्ग प्रशस्त करता है। ऋग्वेद में सूर्य की रश्मियों को 'जीवन का रस' खींचने वाला बताया गया है, जो बाद में 'पर्जन्य' (वर्षा) बनकर लौटता है। भगवान विष्णु का त्रिविक्रम रूप: इस मास के अधिपति भगवान विष्णु का 'त्रिविक्रम' स्वरूप है। वामन अवतार में जब भगवान ने तीन पगों में संपूर्ण ब्रह्मांड को नाप लिया था, वह घटना ज्येष्ठ की अनंत व्यापकता को दर्शाती है। देवी ज्येष्ठा और अलक्ष्मी: पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन में लक्ष्मी से पूर्व 'ज्येष्ठा' प्रकट हुईं। वे सागर की पुत्री और मुनि दुसह की पत्नी मानी जाती हैं। इनका स्वरूप हमें सिखाता है कि वैभव से पहले संघर्ष और तपन (ज्येष्ठा) का आना अनिवार्य है।
ज्येष्ठ में 'जल संस्कृति' का दार्शनिक आधार में जब सूर्य वृषभ राशि में प्रवेश करता है और 'नौतपा' का प्रारंभ होता है, तब भारतीय समाज जल को संसाधन नहीं, बल्कि 'देवता' मानकर पूजता है। गंगा दशहरा: ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को माँ गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। यह पर्व केवल एक तिथि नहीं, बल्कि नदी संरक्षण और जल की पवित्रता का वैश्विक घोषणापत्र है। निर्जला एकादशी: भीषण गर्मी में बिना जल के उपवास रखना आत्म-संयम की पराकाष्ठा है। स्मृतियों और पुराणों (जैसे स्कंद पुराण) में इस दिन 'उदक कुंभ' (जल से भरे कलश) के दान को सौ अश्वमेध यज्ञों के समान बताया गया है। विविध योनियों का संरक्षण: भारतीय मनीषा ने ज्येष्ठ में केवल मानवों की प्यास की चिंता नहीं की। इस मास में नागों के लिए पाताल की शीतलता, गंधर्वों के लिए जलाशयों की निकटता और वनों में रीक्ष (भालू) व अन्य वन्यजीवों के लिए प्याऊ की व्यवस्था को 'धर्म' से जोड़ा गया। ज्येष्ठ मास का स्वरूप कालचक्र के साथ विकसित होता रहा है: सत्ययुग और त्रेता: यह 'तप' का युग था। भगीरथ की तपस्या और सावित्री-सत्यवान का संघर्ष (वट सावित्री व्रत) इसी मास की उपलब्धियाँ हैं, जो मृत्यु पर विजय और प्रकृति के संरक्षण का संदेश देती हैं। द्वापर युग: भगवान कृष्ण ने 'ब्रज' में ग्रीष्म ऋतु को उत्सव बना दिया। 'जल विहार' और 'फूल बंगला' की झांकियों के माध्यम से उन्होंने सिखाया कि ईश्वर को शीतलता प्रदान करना ही भक्त की सच्ची सेवा है। ऐतिहासिक काल (मुगल और ब्रिटिश): मुगल काल में 'खस' के पर्दे और नहरों का स्थापत्य ज्येष्ठ की तपन से बचने का भौतिक प्रयास था। ब्रिटिश काल में 'हिल स्टेशन्स' की अवधारणा विकसित हुई, लेकिन भारतीय जनमानस ने अपने 'घड़ा दान' और 'शरबत वितरण' की परंपरा को जीवित रखा।
ज्येष्ठ की गर्मी भौगोलिक सत्य है, इसलिए इसका प्रभाव सभी धर्मों और वैश्विक क्षेत्रों पर पड़ता है: सिख पंथ: ज्येष्ठ में गुरु अर्जुन देव जी का शहीदी पर्व आता है। तपते तवे पर बैठकर उन्होंने जो धैर्य दिखाया, उसकी याद में सिख समाज 'छबील' (मीठे पानी का वितरण) लगाता है। यह ज्येष्ठ की 'सेवा संस्कृति' का वैश्विक उदाहरण है इस्लाम और कुरान: कुरान में 'सब्र' (धैर्य) को सर्वोपरि माना गया है। ज्येष्ठ की तपन में रोजा रखना और 'सबील' (प्याऊ) लगाना मानवता की सबसे बड़ी इबादत मानी गई है। ईसाई और यहूदी परंपरा: बाइबल में 'आत्मा की प्यास' बुझाने के लिए ईश्वर की ओर मुड़ने का आह्वान है। मई-जून के महीने में 'पेंटेकोस्ट' जैसे उत्सव नई फसल और पवित्र आत्मा के अवतरण का स्वागत करते हैं। जैन और बौद्ध: जैन धर्म में ज्येष्ठ की गर्मी 'कायक्लेश' (तप से शरीर शुद्धि) का अवसर है, जबकि बौद्ध धर्म में यह काल करुणा और शांति के संदेश का विस्तार करता है।
सौर: सूर्य इस मास के प्रत्यक्ष देवता हैं। उनकी प्रचंडता अहंकार को नष्ट करने वाली मानी जाती है। शैव: शिवलिंग पर निरंतर जल की धारा (अभिषेक) ज्येष्ठ में शांति और कल्याण का प्रतीक है। वैष्णव: भगवान जगन्नाथ की 'स्नान यात्रा' ज्येष्ठ पूर्णिमा को होती है, जो प्रभु के मानवीय स्वरूप और लोक-रंजन को प्रकट करती है।शाक्त: इसी मास में 'धुमावती जयंती' मनाई जाती है, जो ज्येष्ठ के 'शुष्क' और 'कठोर' पक्ष की आध्यात्मिक व्याख्या करती है।
आज के वैज्ञानिक युग में ज्येष्ठ मास 'ग्लोबल वार्मिंग' के विरुद्ध एक चेतावनी है। भारत और वैश्विक क्षेत्र: जहाँ भारत में यह 'लू' और सूखे का समय है, वहीं उत्तरी गोलार्ध के अन्य देशों में यह 'समर सोल्स्टिस' (ग्रीष्म संक्रांति) का समय है। यह मास हमें याद दिलाता है कि यदि हमने जल और वनों का संरक्षण नहीं किया, तो ज्येष्ठ की यह तपन प्रलयकारी हो सकती है। जल ही जीवन है: आधुनिक काल में ज्येष्ठ का संदेश 'नदी पुनर्जीवन' और 'वृक्षारोपण' से जुड़ गया है। यह वह समय है जब हमें धरती के घटते जलस्तर को बचाने के लिए 'प्राचीन जल संस्कृति' की ओर लौटना होगा।
शास्त्रों के गहन अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि ज्येष्ठ मास केवल एक 'महीना' नहीं है, बल्कि यह तप से तृप्ति की यात्रा है। यह हमें सिखाता है कि जब तक हम सूर्य की तरह तपेंगे नहीं, तब तक वर्षा (सुख) का आगमन नहीं होगा। ज्येष्ठ का 'जल दर्शन'—चाहे वह गुरुद्वारों की छबील हो, मंदिरों का अभिषेक हो, या निर्जला एकादशी का त्याग—सबका मूल उद्देश्य 'परोपकार' है। यह महीना मनुष्य को अपनी सीमाओं को पहचानने, प्रकृति के प्रति उत्तरदायी होने और 'सर्वजन सुखाय' के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। ज्येष्ठ का सूर्य हमारे अहंकार को जलाकर हमें निर्मल जल की तरह शीतल और पारदर्शी बनने का संदेश देता है। अंततः, ज्येष्ठ की तपन ही वह भट्टी है जिसमें तपकर मानवता का स्वर्ण और अधिक है।


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