सामान्य श्रेणी के लोगों का क्या कर्तव्य है
प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
ज्योतिबा फुले की आरती भारत सरकार दो वर्ष उतारेगी। उन्होंने संकल्प ले लिया है और यह कोई अलग थलग संकल्प नहीं है। ये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के अभी के नेतृत्व द्वारा सुनियोजित एक दिशा चल रही है। जिसमें पहले भीमराव अंबेडकर आदि को महान कहा, तो वह समझ में आता है, क्योंकि उन्हें तो गांधी जी-नेहरू जी आदि ने भी महत्व दिया था। फिर अन्य बहुत बड़े-बड़े लोगों को भी कहा। ताकि समाज नाराज नहीं हो। सोचे कि सबको कह रहे है और फिर धीरे से उन्हीं को बढ़ा दिया, जो सनातन धर्म के भीषण निंदक और ईसाई मिशनरियों के पक्के सेवक है- पेरियार नायकर, ज्योतिबा फुले, राममोहन राय आदि। राममोहन की तो कब्र ही लंदन की एक चर्च से जुडी क्रिश्चियन कब्रगाह में है। पेरियार, फुले आदि हिन्दू धर्म को घिनौनी और आपत्तिजनक गालियां देने के लिए कुख्यात है। संघ - भाजपा का नेतृत्व इन सब को महान बताने लगा।
छल पूर्ण राजनीति
तो यह क्या है? सबको बराबरी से बढ़ाते तो समझ में आता। पर आपने जब से 2014 से सत्ता सम्हाली,आज तक 12 वर्षों में किन-किन हिन्दू महापुरूषों और विचारकों के आयोजन किए हैं, अपने पंथ के सिवाय, यह बताइए। किन-किन का दो वर्षों तक सरकार की ओर से आयोजन घोषित हुआ है। उसकी लिस्ट निकलवाइए।
यह मान लीजिए कि यह बहुत बड़ा संगठन है। बहुत बड़ी पार्टी है। इसमें जो कुछ होता है, व्यवस्थित होता है। जैसा मैंने अपने कई भाषणों में बताया है कि जो मॉडर्न स्टेट है वो बहुत शक्तिशाली संस्था है। तो इसमें आप रोष क्षोभ जो करेंगे वह व्यर्थ है। इसकी काट तो वैचारिक और तथयात्मक स्तर पर ही करनी होगी।
मॉडन पार्टियों का चरित्र समझे
पहले ये समझ लीजिए कि ऐसे होता है। तो फिर इसके पक्ष में और विपक्ष में जो तर्क है उनको समझदारी से रखिए और एकदम बैर विरोध भी नहीं करें तो जो इनके गुण है उनको भी गिनाइए। जैसे इन्होंने क्या किया है सारे महापुरुषों को रखा है और धीरे से भीमराव और ज्योतिबा फुले और राममोहन राय घुसेड़ के फिर उनहीं को प्रोजेक्ट कर दिया। ऐसे ही हम इनके गुण भी गिनाए और दोष भी गिनाए। दोष पर जरा ज्यादा फोकस करें।
तो दोष क्या है? पहला दोष यह है कि यह भारतीय राष्ट्र या हिंदू समाज के प्रतिनिधि नहीं है। उस समय ये हिंदू मुसलमान ईसाई सबके प्रतिनिधि हो जाते हैं और राष्ट्र के बाहर से नियंत्रित समुदायों के भी प्रतिनिधि बन जाते है। जैसे यूरोप के पचासों चर्चों से अनुशासित समूहों के और मुस्लिम देशों से नियंत्रित समूहों के भी। उसके लिए नागरिकता का गलत तर्क देते है। जबकि संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्तव्य स्पष्ट परिभाषित है - राष्ट्र की एकता और अखण्डता की रक्षा में सहयोग करना तथा देश के भीतर बंधुता को बढाना। बाहर से शासित और नियंत्रित समूह तो बंधुता को खुले आम खंडित ही करते रहते है। उनके भाषण, लेख, पुस्तक-पुस्तिकाएं सब इसके प्रमाण है।
ठीक है। लेकिन हिंदू समाज को सम्पूर्ण संरक्षण ये नहीं देते। हिंदू समाज के संदर्भ में भी ये सिलेक्टिव है। ये तय करते हैं कि हम किसको महत्व देंगे। बाकी को नहीं देंगे। भले उन्हें हिंदू समाज मानता है। पर ये चयनात्मक है, अपने मन से चुनते हैं। ये चुनना इनके मन का है। तो एक तो ये आपत्तिजनक है। ये अलोकतांत्रिक है। असत्यपूर्ण है। झूठ से भरा प्रोपगेंडा है।
दूसरी बात ये है कि आप अपने मन से एक दिशा विशेष में समाज को ले जा रहे हैं। चुनाव के समय आप यह बात नहीं कहते कि हम भारत को बदल डालेंगे और इसे एससी, एसटी और ओबीसी का देश बना देंगे और ब्राह्मणों, क्षत्रियों और उच्च वैश्यों को या अनारक्षित वैश्यों को धीरे-धीरे भारत से निकाल बाहर करेंगे। दम है तो आप घोषित करिए। पर नहीं करेंगे। क्यों नहीं कर रहे हैं? तो हमें यह भी जानना चाहिए। ऐसे समय हमको इनकी सच्चाई बताना चाहिए और एक दीर्घकालिक योजना बनानी चाहिए।
पहली बात तो यह कि कांग्रेस का भी यही तरीका था। अंग्रेजों की खुशामद कर गद्दी ट्रांसफर करा ली और तब कहा कि हम देश को सोशलिस्ट बनाएंगे। भाई, किसने कहा था सोशलिस्ट बनाने ? बाहर की संस्कृति, रिलिजन, रीति-रिवाज लाने किसने कहा था? आपने तो बाहरी, अजनबी अंग्रेजों को पहले देश की समस्याएं बताने के लिए, निवेदन के लिए कांग्रेस पार्टी बनायी थी। फिर धीरे-धीरे उसमें राष्ट्र भक्त नेता आये- लोकमान्य तिलक, लाला लाजपतराय, विपिन चन्द्र पाल, देशबंधु चितरंजन दास, श्री अरविन्द, नेताजी सुभाष आदि। तब अंग्रेजों ने गांधी, नेहरू आदि को आगे किया। गांधीजी को महात्मा कहा। गांधी-नेहरू मण्डली को ढेरो सुविधाएं दी। त्यागी-बलिदानी भी उन्हीं को प्रचारित किया। फिर पॉवर का ट्रांसफर कर गये ।तो इसमें ससुरा सोशलिज्म- चोचलिज्म कहा से आ गया? तो आधुनिक पॉलिटिकल पार्टियों का यही चरित्र है। ऊंची बातों से शुरू कर नीचे-नीचे जाते रहना। छल, वचन भंग, बात पलटना, अपनी मनमानी चलाना, उसे ही राष्ट्र की बात बताना। यह जानेगें तभी आप पार्टियों का चरित्र समझेगें। कांग्रेस हो या भाजपा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना परम देश भक्त डॉक्टर हेडगेवार ने की। उन्होंने पूर्णतः संगठित हिन्दू समाज में एक विशेष प्रयोजन- मजहबी उग्रवाद और आतंकवाद के एक लक्ष्यीय प्रयोजन से एकता का आव्हान किया। हिन्दू संस्कारों और ज्ञान परम्पराओं का पूर्ण सम्मान किया। अंग्रेजों के जाने पर हिन्दू राष्ट्र अपनी ही श्रेष्ठ परम्पराओं और संस्कारों से संचालित हो, ऐसा परिवेश बनाने के लिए संगठन का विस्तार किया। स्वाभाविक ही हिन्दू समाज ने उन्हें भरपूर आशीर्वाद दिया। उसकी बड़ी हुई शक्ति देखकर नेहरू ने गांधीवध को एक बढिया मौका पाकर संघ का दमन कर दिया। हजारों ब्राह्मणों को मरवाया और उनके घर जलवाये। इसमें मराठों और मुसलमानों का साथ लिया। तब चिंतित होकर एक पार्टी बनाने की भी जरूरत समझी गई और जनसंघ बनी। बनते ही हिन्दुओं में लोकप्रिय होने लगी। इससे कांग्रेस, कम्यूनिस्ट, सोशलिस्ट सब उसे प्रतिस्पर्धी मानने लगे और आक्रामक हो गये। केवल डॉ राममनोहर लोहिया ने उसे साथ लिया, और साथ मिलकर कांगरेस को हटाने का अभियान छेडा। फिर कांग्रेस के भ्रष्टाचार के विरूद्ध जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन छेडा और कांग्रेस दरक गई। तब सोवियत संघ के निर्देश पर मधु लिमये आदि ने दोहरी सदस्यता का निराधार और निरर्थक मुद्दा उछाल कर इंदिरा गांधी की सेवा की। तब अटल जी आदि ने रणनीति अपनाते हुए जनसंघ का शुद्ध भारतीय मार्ग त्यागकर समाजवाद की खिचडी पकाई और भाजपा बनाई। इसके बाद गद्दी पर कब्जा एक मात्र ध्येय बन गया। लाज-शरम में और अपने संगठनात्मक आधार का ध्यान रखते हुए पुरानी बातें भी जारी रखी। तब तक संघ का नेतृत्व सच्चे हिन्दुत्व निष्ठ हाथों में था। अतः विवेकवान हिन्दुओं का समर्थन पार्टी को मिला। फिर राजीव गांधी की मृत्यु के बाद विदेशी ईसाई मिशनरियों ने कांग्रेस पर नियंत्रण कर लिया। सोनिया गांधी ने हिन्दुओं के सर्वनाश की योजना बनायी।
तब हिन्दू जागा और एक कुशल प्रशासक के रूप में तथा संगठन कर्ता के रूप में नरेन्द्र भाई मोदी को नेता के रूप में रखकर कांग्रेस को अपदस्थ किया। परन्तु मोदीजी में कोई व्यक्तिगत कुंठा पल रही थी और वे डॉ. लोहिया की मृत्यु के बाद बचे समाजवादियों के अराजक जमावडे़ के आत्मीय बन गये थे। उन्होंने सोचा कि संघ के शीर्ष नेतृत्व को अपनी रणनीति का साझीदार बनाया जाये और मजहबी उग्रवादियों तथा मिशनरी विस्तारवादियों से रणनैतिक रिश्ता बनाया जाये। इसी रणनीति के तहत सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को एस सी-एस टी एक्ट के मामले में पलटकर विचित्र कानून बनाया गया और इसी की अगली कडी नया यू.जी.सी एक्ट है। सामान्य वर्ग के हिन्दुओं को सहसा दिख गया कि खेल क्या चल रहा है और कैसे उनका जीवन असंभव बनाया जा रहा है। इसी बीच हिन्दू परिवारों को तोड़ने की कांग्रेस की उस नीति का और विस्तार किया गया जो हिन्दू परिवार को एक सामाजिक राजनैतिक इकाई न मान कर व्यक्तियों को ही इकाई मानती है तथा राज्य और बाजार की शक्तियों का व्यक्तियों पर पूर्ण नियंत्रण विधि के द्वारा स्थापित करती है। इस तरह हिन्दू समाज को विखंडित करने के लिए चौतरफा कार्य नीति में कांग्रेस और भाजपा सहित सभी प्रमुख पार्टियां सहभागी बने और केवल वैयक्तिक लडाइयां पार्टी नेताओं में चलती रही। इसे ही वैचारिक लडाई के रूप में प्रचारित किया गया।
इस प्रकार स्पष्ट है कि आधुनिक पार्टियां जहां से चलती है, वहां से कैसे नीचे उतरती जाती है। कांग्रेस ने समाजवाद से शुरू किया और सामाजिक विषमता बढ़ती चली गई। भारत की जनता से सोशलिस्ट के नाम पर ये बता दिया कि सब का भला ही समाजवाद है। यह नहीं बताया कि सोशलिज्म का अर्थ होता है भारत की संस्कृति का नाश, परंपरा का नाश, ज्ञान का नाश। हम जो शिक्षा व्यवस्था लाएंगे उसमें सनातन धर्म की जो भी ज्ञान परंपरा है, जो विश्व विख्यात थी, उसको किसी को नहीं पढ़ाएंगे। ये कहा था क्या? नहीं कहा। उस समय कह दिया समाजवाद यानी संपूर्ण समाज का विकास तो हिंदुओं ने सोचा अच्छा हमारा भी होगा, फिर मुसलमान ईसाई का भी होगा। आपने ये नहीं कहा कि समाजवाद का अर्थ होता है कि हम जो शासन कर रहे हैं वो जो चाहेंगे वो शिक्षा के नाम पे फैलाएंगे और उसमें हम मुसलमान ईसाइयों का महत्व बढ़ाते जाएंगे और हिंदुओं को नीचे गिराते जाएंगे। ये तो नहीं कहा था।
इसी प्रकार भाजपा ने राष्ट्रवाद और सबका साथ, सबका विकास का नारा दिया। पर अब दिख रहा है कि आप को सबका साथ नहीं चाहिए और सबका विकास भी नहीं चाहिए। आपने तो जो नया यूजीसी एक्ट लाए हैं उसमें ब्राह्मणों, क्षत्रियों और अनारक्षित वैश्यों के बच्चों का विश्वविद्यालयों में पढ़ना मुश्किल कर दिया है।
जब इन्होंने आरक्षण के नाम पर जो 10 वर्ष के लिए कुल आरक्षण था उसको जब बढ़ाते गए बढ़ाते गए तो बहुत से ब्राह्मण क्षत्रिय और अनारक्षित वैश्यों के बच्चे ये सोचने लगे कि चलो भाई, कुछ प्राइवेट सर्विसेज करेंगे, जॉब करेंगे, जिनके लिए संभव होगा, वे विदेश में जाकर प्राइवेट सर्विसेज करेगें। पर उसके लिए भी पढ़ाई जरूरी है। पढ़ने में वो लोग मेहनत करते थे। मेरिट स्टूडेंट थे तो उनको प्राइवेट जॉब भी जल्दी मिलने लगा। अब इस नये एक्ट से इनको परेशानी हो गई है कि शिक्षा ही मुश्किल है तो इनको प्राइवेट जॉब भी नहीं मिलेगा। विश्वविद्यालयों में इनका जाना ही मुश्किल कर दिया है। तो ये क्या है?
ये सरल नहीं है
लेकिन ये सरल नहीं है, इसमें घबराने की बात नहीं है। इस समय विश्व में बहुत से नियम हैं, उनका सहारा सामान्य वर्ग को लेना पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र संघ जो है उसने मानवाधिकारों को मान्यता दी है और मानवाधिकार घोषणा पत्र पर भारत के भी हस्ताक्षर है। तो ब्राह्मणों, क्षत्रियों और उच्च वैश्यों को एक संगठन बनाकर इस विषय पर एक समन्वित रूप से संयुक्त राष्ट्र संघ जाना पड़ सकता है। वहां बताना पड़ेगा कि हमारे मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। अगर यह चाहते हैं कि सरकारी विश्वविद्यालय आदि में हम लोग नहीं पढ़े तो ठीक है।
विदेशों के विश्वविद्यालय को आने दीजिए। हम वही पढ़ लेंगे मेहनत करके और ब्राह्मण क्षत्रियों और वैश्यों को इकट्ठा भी संगठन बनाना चाहिए और अपनी जाति के संगठन बनाए और उसमें जो धनी ब्राह्मण है धनी क्षत्रिय हैं धनी वैश्य हैं वे सबसे पहले तो अपनी जाति के जो गरीब बच्चे हैं उनके लिए इस तरह के जो विदेशी विश्वविद्यालय आएंगे उनमें पढ़ने की व्यवस्था सुनिश्चित करें। फिर ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य तीनों जो जनरल कैटेगरी है सबके लिए एक फंड जमा करें। हो सके तो ज्यादा। इसकी मांग करनी चाहिए और मांग करेंगे तो उन्हें करना पड़ेगा सरकार को। घबराइए मत। ये कह दीजिए कि अगर विश्वविद्यालयों में ब्राह्मणों क्षत्रियों और अनारक्षित वैश्यों के बच्चों को पढ़ने नहीं दिया जाएगा ये कहा जाएगा कि हमारे बच्चे अर्थात ओबीसी शेड्यूल कास्ट और शेड्यूल टाइप के बच्चे अगर कोई भी आरोप लगा देते हैं तो तुम्हारे बच्चे को पढ़ने नहीं दिया जाएगा, जांच की एक ड्रामेबाजी पूरी करके। आरक्षित वर्ग के कुछ प्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से घोषण कर रहे है कि जांच में इनको सत्य से कोई मतलब नहीं तो जांच के नाम पर हम आपके बच्चे को कॉलेज से निकलवा देंगे।
तो ठीक है भाई हम पहले ही छोड़ देते हैं। आप विदेशी विश्वविद्यालयों को यहां आने दीजिए और ध्यान रहे अगर हम संगठित रूप से मांग करेंगे इस समय जो मानवाधिकार को मान्यता दी है स्वयं कांग्रेस सरकार ने और बाद में भाजपा सरकार ने भी उसका अनुमोदन किया है तो उसके चलते आप रोक नहीं सकेगें। विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में आने दीजिए। हम वही पढ़ लेंगे। हमारे मानवाधिकारों का आप सम्मान नहीं कर सकते।
नेताओं की चालों का इतिहास
जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि हम समाजवाद ला रहे हैं और फिर बैंकों का राष्ट्रीयकरण तो बाद में इंदिरा गांधी ने किया लेकिन पहले से ही जवाहरलाल जी ने कुछ धनियों का जो उनकी पार्टी के समर्थक धनी थे उनका पक्ष लेना शुरू किया। बैंकों से उनको लोन देना, इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम से उन्हें सस्ती बिजली और पानी की सुविधाएं देना और साधारण आदमी जो है वो राशन के लिए लाइन में लगा है। कपड़े के लिए लाइन में लगा है। चीनी के लिए लाइन में लगा है। उसको यहां विवश कर दिया। यानी विषमता बढ़ाने को विषमता मिटाना कहा। जवाहरलाल नेहरू के समय भारत में बहुत विषमता बढ़ी। उसको विषमता मिटाना कहा गया। इंदिरा गांधी ने नारा दे दिया गरीबी हटाओ। फिर अब उनका जो पोता है राहुल वो कहता है कि गरीबी बढ़ी है। तुम्हारे नारे को तुम्हारा पोता ही नहीं मानता। वो कहता है कि इंदिरा गांधी के समय से लेके आज तक लगातार गरीबी बढ़ी है। तो स्पष्ट है कि तुम्हारा झूठा नारा था।
अब इसके बाद राजीव गांधी कुछ समय रहे। उन्होंने सोवियत संघ का विघटन हो गया था तो अमेरिका से दोस्ती की इजराइल से दोस्ती की। उनका भी यही था। नेताओं का कोई भरोसा नहीं। पहले राम मंदिर के लिए कहा अशोक सिंघल जी से खुद कहा कि भाई ऐसे करो कि राम मंदिर का शिलान्यास मैं कर देता हूं जिससे कांग्रेस पार्टी को श्रेय मिल जाए तो सिंघल जी ने कहा कि नहीं नहीं इससे कांग्रेस सारा श्रेय ले जाएगी। हम लोगों ने बड़ा संघर्ष किया है। तुमको शिलान्यास नहीं करने देंगे। तुम तो वो हो ना जिसने शाहबानों केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया संसद से तो हम इसका तुमको शिलान्यास नहीं करने देंगे, तुम दुष्ट हो, पापी हो, धर्म विरोधी हो। तो उन्होंने बोला - अच्छा। तो फिर वो नागालैंड गये और वहां बाइबल हाथ में लेकर कहा कि हम यहां बाइबल का राज्य स्थापित करेंगे। तो नेताओं का कोई धर्म नहीं है। फिर इसके बाद नेपाल चले गए पशुपतिनाथ के मंदिर के दर्शन करने। ईसाई पत्नी को ले गये तो पुरोहितों ने कहा कि भाई यहां ईसाइयों का प्रवेश नहीं है तो राजीव चिढ़ गए और उस दिन से नेपाल से संबंध कटु कर लिए। ये तो नेताओं का हाल है। कहते कुछ है, करते कुछ हैं।
इंदिरा गांधी से जब एक बार एक विदेशी संवाददाता ने पूछा कि आपको ईश्वर में विश्वास है? उन्होंने कहा आई नीड नो क्लचेस। मुझे बैसाखी नहीं चाहिए, सहारा नहीं चाहिए। इसके बाद खुद सनातन धर्म पर किसी से पुस्तक लिखा के अपने नाम पे छापी। शायद वो यशपाल कपूर ने लिखी थी या कोई धवन जी ने। मतलब कोई विस्थापित आए थे पंजाब से जो इनके साथ रह रहे थे दो तीन लोग थे एक कपूर था, एक धवन जी, जब वहां से आये तो हिंदू महासभा के भवन में ही रुके थे और उसी से जीवित बचे थे। लेकिन बाद में वो कांग्रेस में चले गये। तो उसने एक पुस्तक लिखवाई थी हिंदू धर्म की महिमा बताते हुए इंदिरा गांधी के नाम से। इंदिरा जी फिर बड़े-बड़े आश्रमों में जाती। माँ आनंदमयी की भक्त भी बन गई।
राहुल का तो कहना ही क्या है? समाज में आग लगाना चाहता है। कहता है मैं दियासलाई लिए फिरता हूं। बस दियासलाई फेंकने की देर है और पेट्रोल बिछा दिया है मैंने सारे देश में आग लग जाएगी। इस तरह से विदेशों में ऐसा आश्वासन देके वो विदेशी शक्तियां जो भारत को तोड़ना चाहती है उनसे सहायता लेता है। नहीं तो ऐसी फालतू बात कोई क्यों करेगा? और बातें करेगा मोहब्बत प्रेम मोहब्बत प्रेम मोहब्बत प्रेम और जिस गति से वो मोहब्बत प्रेम रटते है, उसी गति से मोदी जी गांधी बुद्ध, गांधी बुद्ध रटते है। कहा था सबका साथ सबका विकास और हालत यह है कि ब्राह्मणों का नाश, क्षत्रियों का नाश, वैश्यों का नाश और केवल एससी, एसटी और ओबीसी का विकास। अब जिस व्यक्ति में इतना द्वेष है, ब्राह्मणों से द्वेष है मोदी जी को, क्षत्रियों से द्वेष है मोदी जी को और मोदी जी के शासन को और अनारक्षित वैश्य से द्वेष है मोदी जी को और मोदी जी के शासन को।
जातिसमूह-वार राज्य रचना हो
जिसके मन में द्वेष है वो कहां से अच्छा शासन लायेगें। तब क्या किया जाये? अगर आप हजारों वर्षों से आरक्षित और अनारक्षित वर्ग में विद्वेष है तो फिर एकता का आधार क्या हो? विद्वेष क्या विद्वेष को बढ़ाने से मिटेगा? आप तो बुद्ध के भक्त बनते है। भगवान बुद्ध ने कहा था - ‘‘वैर से वैर नहीं बुझता। प्रज्वलित आग और धधकती जाती है।’’ तो अलग-अलग रहकर एक राष्ट्र के भीतर आधारभूत बातों में एकमत रखते हुए का ही करना होगा। जाति समूहवार राज्य रचना नये रूप में करनी होगी। एक नया राज्य पुनर्गठन आयोग बनाकर इसका मार्ग बनाईयें।
एक भारत राष्ट्र रहेगा लेकिन राज्य अलग-अलग हो जाएगा। ऐसे राज्य बनते रहते हैं। यह हो सकता है। राष्ट्र में नए राज्यों के पुनर्गठन की मांग कीजिए कि एक राज्य ऐसा हो जहां केवल सामान्य श्रेणी के लोग रहे। उनको पूरा अधिकार हो। विदेशी मामले और सुरक्षा केंद्र के अधीन रहे, जैसा रहती है और बाकी अपने राज्य का स्वयं सभांल करें। वैसे तो ममता बनर्जी खुद ही मनमानी कर रही है। हम लोग मनमानी ना करके मांग करेंगे कि आप शिक्षा संस्कृति सभ्यता और बाकी उन्नति के लिए राज्य को जो अधिकार संविधान ने दे रखे हैं वो दे दो और सामान्य श्रेणी के लिए एक अलग राज्य बना दो।
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, बंगाल, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश भी मिला के एक क्षेत्र यहां बना दो, एक दक्षिण में बना दो जनरल कैटेगरी के लिए। देश भर में दो राज्य सामान्य वर्ग के लिए एक उत्तरी सामान्य श्रेणी राज्य। उसका कुछ नाम दे देंगे नॉर्दन जनरल कैटेगरी स्टेट एनजीसीएस और एक एसजीसीएस सदर्न जनरल कैटेगरी स्टेट। ऐसे बना देंगे। अंतरराष्ट्रीय मामले, विदेश, संचार, रक्षा आदि केंद्र के अधीन रहे और बाकी अपना अपना शासन करते रहे। अलग-अलग राज्य बन जाए। ये हो सकता है। अगर आप यही करते रहे तो सामान्य श्रेणी वालों का अलग राज्य बन जाए और आरक्षित श्रेणी वालों का अलग राज्य बन जाए। हिन्दी क्षेत्र में सामान्य श्रेणी के लिए दो विशाल राज्य बन जायेगें और आरक्षित श्रेणी के लिए दो अलग विशाल राज्य बन जायेगें। राज्यों का पुनर्गठन नये आधारों पर होगा। इसी प्रकार दक्षिण में चार-चार अलग-अलग राज्य क्रमशः सामान्य श्रेणी और आरक्षित श्रेणी के लिए हो जायेगें। सब अपना विकास करके दिखाएं। अपनी-अपनी मर्यादा में रहे और प्रेम से रहे। परस्पर गाली-गलौच अपराध घोषित हो।
सम्पूर्ण प्रजा से प्रेम राजा का कर्तव्य है
सबका साथ सबका विकास का तो आपने नाश कर दिया और प्रजा के प्रति प्रजा के एक हिस्से के प्रति विद्वेष रच दिया। ब्राह्मणों क्षत्रियों और अनारक्षित वैश्यों के प्रति मोदी जी और उनकी टीम को विद्वेष है। इसके इतने प्रमाण मिल रहे हैं। बहुत चिंता की बात है। अगर यही बना रहा तो कुछ दिनों में लोगों को नेहरू जी और इंदिरा जी का राज्य अच्छा लगने लगेगा क्योंकि नेहरू जी और इंदिरा जी की दिशा तो यही थी लेकिन उन्होंने होशियारी से काम लिया। धीरे-धीरे चले। अब चाहे इसका कारण ये हो कि जवाहरलाल नेहरू जैसे भी हो, ब्राह्मण घर में जन्म तो लिया ही था तो उनको एक इतना संस्कार था कि कैसे एक सीमा से आगे उग्रता नहीं दिखाई जाये। सबको साथ लेकर चलो। इंदिरा जी ने विवाद तो अपनी पार्टी में पैदा किया लेकिन थी तो ब्राह्मण की ही बेटी। शायद उन्हें भी ये संस्कार मिले हों। तो कांग्रेस शासन में नेहरू और इंदिरा की दिशा यही थी लेकिन उन्होंने सबको साथ ले चलने का प्रयास किया। अटल जी ने भी वही किया। लेकिन अब मोदी जी जो कर रहे हैं वो तो साफसाफ भारतीय नागरिकों, भारतीय प्रजा में से ब्राह्मणों क्षत्रियों और अनारक्षितों से द्वेष दुर्भाव है। ये तो अच्छी बात नहीं है। भारत में राजा को संपूर्ण प्रजा से स्नेह और प्रेम करना चाहिए। ब्राह्मणों क्षत्रियों और अनारक्षित वैश्यों से द्वेष रखना, विद्वेष रखना, दुर्भाव रखना, मोदी जी को शोभा नहीं देता। इस बात को हमें उठाना चाहिए कि भाई, आप सबके नेता हैं। आप केवल शेड्यूल कास्ट, शेड्यूल ट्राईब और ओबीसी और मुसलमानों और ईसाइयों के नेता ही नहीं है। आप उन हिंदुओं के भी जो ब्राह्मण क्षत्रिय और अनारक्षित है, सनातन धर्मी उनके भी आप नेता हैं और उनको भी संरक्षण दीजिए। मांग उठानी पड़ेगी।
क्या सामान्य वर्ग विदेशी विश्वविद्यालयों में ही जाये?
आप अगर इन विश्वविद्यालयों में हम लोगों के बच्चों का पढ़ना मुश्किल कर देंगे तो फिर हम संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार संगठन में भी जाएंगे और विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में आने के लिए दबाव बनाएंगे। दबाव बनाने पर इन्हें देना पड़ेगा। चिंता मत कीजिए। बहुत सारी संधियों से बंधे हैं। फिर यही करना पड़ेगा कि जो सरकारी विद्यालय विश्वविद्यालय है, उनको हम लोग स्वेच्छा से त्याग दे। विदेशी विश्वविद्यालयों में हम प्रवेश ले।
अब जरा शांतचित्त से राजनीति को देखना शुरू किया जाए। जब हम शांतचित्त से देखेंगे तो हमको दिखेगा कि इन्होंने लगातार पैतरे चले। केवल ब्राह्मणों, क्षत्रियों और अनारक्षित वैश्यों के बीच यह प्रचार किया कि जाति की भावना गलत है। और उधर अनुसूचित जाति के अलग-अलग जातियों के संगठन बनते रहे। बहुजन के नाम से ओबीसी के संगठन बनते रहे। शेड्यूल ट्राइब संगठित है ही। उसमें भी ईसाई शेड्यूल ट्राइब में जो ईसाई बन गए उन्होंने अपने अलग संगठन बनाए हैं। जो हिंदू है उनको दुत्कार देते है। आपने जाति नाश का एक भ्रामक नारा देकर ब्राह्मणों, क्षत्रियों और अनारक्षित वैश्यों में जाति का जो सहज स्वाभिमान है उसको समाप्त करने की कोशिश की। उसके प्रति विमुख करने की, उदासीनता फैलाने की कोशिश की और अन्य जातियों के संगठन और अन्य जातियों की जातिगत भावना को उभारा।
जाति और बच्चों को लेकर भी दोमुहापन
आपने आरक्षित जातियों की जाति भावना को बढ़ने दिया और बढ़ाया और केवल ब्राह्मणों, क्षत्रियों और अनारक्षित वैश्यों के जातिगत संगठन की निंदा की। हालांकि वो पूरी तरह लोगों ने छोड़ा नहीं लेकिन आपने ऐसा किया। इसका मतलब ये जाति की निंदा भी ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के भीतर जाति से उदासीनता पैदा करने की एक रणनीति है। ये इधर उदासीन होते रहे। उधर वे आरक्षित समूह अपने जातिगत संगठन बनाते रहे। ये बसपा है तो ये नव बौद्ध संगठन है तो ये ये है तो वो वो है। हम उदासीन हो जाए। वे जातिगत संगठन बना लें।
हम दो हमारे दो का नारा भी इन्हीं ब्राह्मणों क्षत्रियों वैश्यों के बीच ज्यादा लोकप्रिय किया। तुम बच्चे मत पैदा करो। हम 12-13 या चार पांच, छ सात बच्चे पैदा करेंगे। तो अब ये समझना चाहिए कि ये कोई एक योजना है कि जो यह नारा दिया भारत के शासकों ने कि हम दो हमारे दो, उसके पीछे ये था कि ये जो ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य हैं, ये ज्यादा बच्चे नहीं पैदा करें। ऐसा वातावरण बना दो कि बच्चे पैदा करना इनको खलेे। तो इनके बच्चे कम हो और मुसलमानों के और ओबीसी के और एससी एसटी के खूब बच्चे हो। तो धीरे-धीरे ये शासन द्वारा इस तरह का दबाव आता है।
सत्य को शांतचित्त से देखना लेकिन अभी भी देर नहीं हुई है। सत्य को सत्य की तरह देखना शुरू करिए। नेताओं के आचरण को देखकर उन पर राय बनाइए। इनकी फालतू की जो भाषण बाजी होती है, उसमें नहीं पड़ना चाहिए। ये कर क्या रहे हैं? इसको देखें और यह देखें कि यह तो जाति का विरोध करते हुए ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को अपनी-अपनी जाति से विमुख करके शेष जातियों को संगठित होने का मौका देते हैं। और ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों में तीन से अधिक बच्चे पैदा नहीं करने का उत्साह जगाकर बाकी सब में तीन से अधिक बच्चे पैदा करने का उत्साह जगाते हैं। तो यह जो छल है इसको जब हम पहचानेंगे तब सत्यमेव जयते- सत्य की ही विजय होगी। झूठ नहीं। लेकिन हम लोग इसको देखना शुरू करें। सत्य क्या है इसे देखें। सत्य यह है कि भारत के नेता या तो अपने विचार यानी अपने दिमाग की खुजली को आगे बढ़ाते हैं या जो उनके अपने वोटर की जाति आदि है उसके प्रति कुछ विशेष पक्षपात करते हैं। सारी प्रजा के प्रति इन्हें प्रेम नहीं है। सबका साथ सब सबका विकास केवल नारा है। व्यवहार में सबसे प्रेम नहीं है। प्रेम इनका सशर्त है और वो है कि आप ओबीसी है कि नहीं। शेड्यूल कास्ट, शेड्यूल ट्राइब है कि नहीं तभी हम प्रेम करेंगे। नहीं तो हम आपसे प्रेम नहीं करेंगे। तो इस सबको सत्य को सामने लाना चाहिए। राजनीति ऐसे चल रही है और इस पर दबाव बनाना चाहिए। निराश नहीं होना है। बहुत सारे ऑप्शन है आजकल की स्थिति में। यह बाहर के प्रभाव से ही यह मनमानी कर रहे हैं। बाहर के प्रभाव से ही ये ठीक होंगे। तो इसलिए सत्य को जानिए। उस तरीके को जानिए जिससे इन पर दबाव पड़े और शांतचित्त से धर्ममय आचरण करते हुए धार्मिक संगठन बनाएं। सामान्य श्रेणी के लोगों को अपने अधिकार की मांग करनी चाहिए। अधिकारों के प्रति आग्रह होना चाहिए। अन्यथा तो मनमानी होती दिख रही है।
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