Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

तीसरा विश्व युद्ध और अमेरिका की परिणति

तीसरा विश्व युद्ध और अमेरिका की परिणति

डॉ राकेश कुमार आर्य
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के विशेषज्ञों की बात यदि मानी जाए तो उनका स्पष्ट मानना है कि सारा विश्व जितना पिछले वर्ष विश्व युद्ध के संकटों को अनुभव कर रहा था, उससे अधिक इस वर्ष के प्रारंभ में ही कर रहा है। अमेरिका इसराइल और ईरान के बीच जो कुछ हो रहा है, उसको लेकर संवेदनशील लोगों के हृदय की धड़कनें बढ़ चुकी हैं । कब क्या हो जाएगा और कब किस व्यक्ति के मस्तिष्क में इस युद्ध में परमाणु हथियारों का प्रयोग करने की जिद सवार हो जाएगी ? - इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। जिस समय युद्ध राष्ट्रीय हितों के दृष्टिगत लड़े जाते हैं अर्थात जब यह देखा जाता है कि यदि मैं एक शासनाध्यक्ष के रूप में अपने देश का वर्तमान समय में अपमान सहन कर गया तो इससे भविष्य में मेरे देश के अस्तित्व के लिए कई प्रकार के संकट खड़े हो सकते हैं ? इसलिए युद्ध मेरे लिए आवश्यक हो गया है, तब युद्ध का उद्देश्य धर्म के अनुकूल होता है। इस प्रकार के युद्ध में सात्विकता और मन्युभाव रहता है। मन्युभाव का अर्थ है कि ऐसी स्थिति में मनुष्य अपना विवेक नहीं खोता है। उसका क्रोध सात्विकता की सीमाओं तक रहता है । जिसमें उसका विवेक उसे स्पष्ट बताता रहता है कि दंड केवल दोषी को देना है, निर्दोष को नहीं। ऐसे युद्ध भारत ने प्राचीन काल से परंपरागत रूप में लड़े हैं। इसलिए भारत की इस परंपरा को ही युद्ध के क्षेत्र में धर्म युद्ध के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि महाभारत जैसे भयंकर और विनाशकारी युद्ध को भी हमने धर्म युद्ध की संज्ञा दी थी। परंतु आजकल इस प्रकार के युद्धों का लगभग निषेध हो गया है। अब व्यक्ति क्रोध के भाव के वशीभूत होकर युद्ध में उतरता है । वर्तमान में जितने भर भी देश युद्ध में अपने देश की शक्ति का विनाश कर रहे हैं, ये सभी एक दूसरे की जान के दुश्मन बन चुके हैं । वे क्रोध के वशीभूत होकर तामसिक वृत्ति का शिकार हो गए हैं। निश्चय ही युद्ध की यह शैली मानवता के लिए सबसे अधिक खतरनाक होती है।
आप अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप को देखिए। वह क्रोध में लगभग पगलाए से दिखाई देते हैं। हर व्यक्ति और हर शक्ति को वह धमका कर अपने वशीभूत करने पर तुले हुए हैं। अमेरिका की यह शैली उसे तीसरे विश्व युद्ध का विलेन सिद्ध करने जा रही है और यही शैली यदि निरंतर जारी रही तो अमेरिका ही वह देश होगा, जिसे भावी तीसरे विश्व युद्ध के सबसे भयंकर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। पगलाई हुई मानसिकता में व्यक्ति विवेक का संतुलन खो बैठता है। उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए ? - इन दोनों के बीच वह निर्णय नहीं ले पाता है। लगभग ऐसी ही मानसिकता का शिकार होकर रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था। रूस के राष्ट्रपति पुतिन को भी तब लगता था कि यूक्रेन को वह बहुत जल्दी अपने कदमों में झुकता हुआ देखेंगे।परंतु ऐसा हुआ नहीं। अमेरिका ने रूस की गलती से कुछ सीखा नहीं और उसने भी ईरान को झुका कर अपने कदमों में लाने के लिए उस पर हमला कर दिया। रूस जिस प्रकार यूक्रेन में जाकर उलझा है ,उसके बाद अपुष्ट खबरों पर यदि विश्वास किया जाए तो उसे लाखों की संख्या में अपने नागरिकों की प्राणहानि झेलनी पड़ी है। इससे भी बुरी स्थिति यूक्रेन की है। सारी दुनिया के युद्ध विशेषज्ञ भली प्रकार जानते हैं कि युद्ध में उलझी हुई दुनिया के देशों ने अपने-अपने देश में कितने निर्दोष लोगों की हत्याओं का पाप अपने सिर पर ले लिया है, परंतु इसके उपरांत भी सब चुप्पी साधे हुए हैं। लगता है ' पूर्ण विनाश ' की प्रतीक्षा की जा रही है। युद्ध में लाखों लोगों का मर जाना अभी तक भी विश्व के नेताओं और युद्ध के विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय नहीं है। लगता है शायद उनके भीतर से मानवता पलायन कर चुकी है। इसका कारण यह भी है कि संयुक्त राष्ट्र जैसी विश्व संस्था अमेरिका के न्यूयॉर्क में स्थित होने के कारण अपनी उत्पादक क्षमता खो चुकी है अर्थात वह नपुंसक हो चुकी है। उसकी चुप्पी उसकी कायरता का प्रतीक है।
नाटो जैसे सैन्य गठबंधन से अमेरिका ने दूरी नहीं बनाई है, बल्कि अमेरिका से नाटो संगठन के देशों ने ही दूरी बना ली है। बहुत देर बाद जाकर उनको यह आभास हुआ है कि अमेरिका का नेतृत्व उनके लिए संकट उत्पन्न कर सकता है। अब अमेरिका जिस प्रकार नाटो जैसे बड़े सैन्य संगठन को धमकाने की स्थिति में आ रहा है,उससे उसके विनाशकारी भविष्य की तस्वीर साफ उभरती हुई दिखाई दे रही है। अमेरिका तीसरे विश्व युद्ध की केंद्रीय भूमिका में आ चुका है।
उसने अपने आप ही ऐसे हालात पैदा कर लिए हैं जिससे वह अब दूरी नहीं बना सकता।
इस समय की वैश्विक परिस्थितियों पर यदि दृष्टिपात किया जाए तो पता चलता है कि रूस इस समय अमेरिका से भय मुक्त है और अमेरिका रस से भय मुक्त है। यही वह स्थिति है जो वर्तमान विश्व की परिस्थितियों को अत्यधिक भयावह बना रही है। जब रूस किसी देश के साथ युद्धग्रस्त नहीं होता था और अमेरिका कहीं उत्पात करता था तो अमेरिका को यह डर होता था कि कहीं रूस उसके खिलाफ कोई बड़ी साजिश न रच डाले और जब अमेरिका किसी देश के साथ युद्धरत होता था तो उसे रूस का डर रहता था कि कहानी रूस उसके विरुद्ध कोई बड़ी कार्यवाही न कर दे। दुर्भाग्य से इस समय दोनों ही युद्धरत हैं। अब इनको एक दूसरे से कोई चिंता नहीं है। इसीलिए युद्ध की विभीषिका बढ़ती जा रही है। इस स्थिति में ये दोनों देश कमजोर हो रहे हैं और चीन इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपनी ताकत बढ़ा रहा है।
ऐसे में चीन की संभावित चाल भारत के लिए खतरनाक हो सकती है। जिससे भारतीय सेना और राजनीतिक नेतृत्व को सावधान और सजग रहने की आवश्यकता है। विशेष रूप से तब जबकि चीन और पाकिस्तान दोनों ही भारत के विरुद्ध इस समय संयुक्त रणनीति पर काम कर रहे हैं।
मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूं। परन्तु वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के दृष्टिगत और मानवीय स्वभाव को समझकर यह कहा जा सकता है कि अमेरिका की शक्ति अब अपने चरम पर है। इसके बाद उसका ढलान निश्चित है। क्योंकि वह अपनी उस ऊंचाई पर पहुंच चुका है जहां उसे पहुंचना चाहिए था। इस ऊंचाई पर जाकर उसके पापों को घड़ा भर चुका है। जिसके फूटने का अर्थ होगा अमेरिका का टूटना। चीन अपनी चालों में अपने आप फंस जाएगा और भारत अपने संयम और धैर्य से वैश्विक नेतृत्व के लिए उभर कर सामने आएगा। भौतिक उन्नति का अंतिम परिणाम सारा विश्व भुगतेगा और उस कराहते श्मशान बने विश्व को भारत की शांति ही सही मार्ग दिखाएगी। परंतु उससे पहले हमें यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हम किसी भी प्रकार के विनाश को देखने के साक्षी न बनें।



( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ , https://www.facebook.com/divyarashmimag

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ