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"निस्तब्धता का अंतराल"

"निस्तब्धता का अंतराल"

पंकज शर्मा
निशा—
अब केवल आकाशीय घटना नहीं,
वह भीतर उतर आई है—
रक्त की धमनियों में
धीमे, अनाम अंधकार की तरह।


शरीर—
अपनी ही उपस्थिति का भार लिए
स्वयं पर झुका हुआ,
जैसे अस्तित्व
अपने ही प्रश्न का उत्तर खोजते-खोजते
थक गया हो।


समय—
अब गतिशील नहीं,
वह ठहरा है—
किसी अदृश्य केंद्र पर,
जहाँ गति और विराम
एक ही बिंदु में विलीन हो जाते हैं।


यह जो व्याप्त है—
उसे सन्नाटा कहना
उसका लघुकरण है;
वह तो एक अखंड सत्ता है—
अनाम,
अनावृत्त,
जो रिक्तियों के बीच नहीं,
रिक्तियों के रूप में विद्यमान है।


दीवारों की दरारों में
जो पसरा है—
वह बाहर से नहीं आया,
वह भीतर से प्रस्फुटित हुआ है—
जैसे चेतना
अपने ही अंधे कुओं में
प्रतिबिंबित हो उठी हो।


हवा—
अब स्पर्श नहीं,
एक अनकहा उच्चारण है;
पत्तियों के काँपते हुए अधरों पर
ठहरी हुई कोई आदिम स्मृति—
जिसे भाषा
अब तक छू नहीं सकी।


वह ध्वनि—
जो सुनाई नहीं देती,
किन्तु व्याप्त है—
जैसे अस्तित्व का प्रथम कंपन,
जिसे काल ने दबा दिया था,
और अब—
अंधकार की शिराओं में
फिर से प्रवाहित हो रहा है।


मन—
न कोई केंद्र,
न कोई सीमा;
वह ढीली रस्सी नहीं,
एक अवरोह है—
अपने ही गर्भ में,
जहाँ ‘मैं’
धीरे-धीरे विलीन होता है।


गहराइयाँ—
अब भय का पर्याय नहीं,
वे एक स्वीकृति हैं;
जैसे कोई पुरातन सखा—
जो बिना स्पर्श किए
तुम्हें पूर्णतः ग्रहण कर ले।


यह डूबना—
विलुप्ति नहीं,
एक उद्घाटन है;
जहाँ आवरण गिरते हैं,
और जो शेष बचता है—
वह न नाम है, न रूप।


बाहर का कोलाहल—
अब समझ आता है—
वह केवल एक युक्ति थी,
स्वयं से बचने की।


अंततः—
जो रह जाता है,
वह शून्य नहीं—
एक परिपूर्णता है;
जहाँ अभाव ही
अस्तित्व का अंतिम रूप बन जाता है।


वहीं—
मुक्ति है,
क्योंकि वहाँ
कोई ‘द्वार’ नहीं,
कोई ‘प्रवेश’ नहीं—
केवल होना है,
निर्विकल्प,
निर्व्याज।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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