पुंडलिक और भगवान विठ्ठल की अमर पौराणिक कथा

आनन्द हठीला
प्राचीन भारत की पुण्यभूमि में, भीमा नदी के तट पर एक छोटा-सा ग्राम था, जहाँ भक्ति, सेवा और संस्कारों की सुगंध चारों ओर फैली रहती थी। उसी ग्राम में पुंडलिक नाम का एक युवक निवास करता था। बाल्यकाल में पुंडलिक अत्यन्त उग्र स्वभाव का था। उसे संसारिक सुखों का मोह अधिक था और माता-पिता की सेवा में उसका मन नहीं लगता था। वह व्यापार और भोग-विलास में लिप्त रहता था, और वृद्ध माता-पिता की पीड़ा को समझ नहीं पाता था। माता-पिता मौन रहकर उसके व्यवहार को सहते रहते, पर उनके हृदय में पीड़ा का सागर उमड़ता रहता। समय बीतता गया और पुंडलिक का जीवन मार्ग भटकता चला गया, परंतु भाग्य को कुछ और ही स्वीकार था।
एक दिन पुंडलिक किसी तीर्थ यात्रा पर निकला। मार्ग में उसे एक साधु मिले जिनके मुख पर दिव्य तेज था। पुंडलिक ने देखा कि वे साधु अपने वृद्ध माता-पिता को अपने कंधों पर बैठाकर ले जा रहे थे। जब भी माता-पिता को प्यास लगती, साधु स्वयं दौड़कर जल लाते, जब थकान होती तो उन्हें सुलाकर अपने शरीर को कष्ट देते। यह दृश्य पुंडलिक के हृदय में तीर की भाँति लगा।
उसने साधु से पूछा — “आप इतना कष्ट क्यों सहते हैं?”
साधु मुस्कराए और बोले — “माता-पिता ही मेरे साक्षात भगवान हैं। उनकी सेवा में ही मोक्ष छिपा है।” यह वाक्य पुंडलिक के जीवन की दिशा बदलने वाला सिद्ध हुआ।
पुंडलिक का अंतःकरण काँप उठा। उसे अपने पुराने व्यवहार पर लज्जा आई। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने वहीं प्रण लिया कि अब जीवन भर माता-पिता की सेवा ही उसका धर्म होगा।
वह तुरंत अपने ग्राम लौटा और माता- पिता के चरणों में गिर पड़ा। उसने उनसे क्षमा माँगी और बोला — “आज तक मैं अंधा था, अब मुझे सत्य दिखाई दे रहा है।” माता-पिता का हृदय भर आया। उन्होंने पुत्र को आशीर्वाद दिया। उसी दिन से पुंडलिक का जीवन बदल गया। वह स्वयं भोजन कराने लगा, स्नान कराता, सेवा करता और दिन-रात माता-पिता के चरणों में ही अपनी भक्ति खोजने लगा।
एक प्रातःकाल का समय था। भीमा नदी शांत बह रही थी। सूर्य की किरणें मंदिरों की दीवारों से टकराकर स्वर्णिम आभा फैला रही थीं। उसी समय पुंडलिक अपने माता-पिता को शय्या पर लिटाकर उनके चरण दबा रहा था। माता-पिता वृद्ध थे, शरीर दुर्बल था और नींद में भी उनके मुख पर संतोष की झलक थी। पुंडलिक की आँखों में करुणा थी और हाथों में सेवा का ताप। तभी उस पावन घाट पर स्वयं भगवान विठ्ठल प्रकट हुए। उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकल रहा था, मुकुट दमक रहा था, कंठ में पुष्पमाला और पीताम्बर लहरा रहा था। पूरा वातावरण जैसे साक्षात वैकुण्ठ बन गया।
भगवान विठ्ठल पुंडलिक के सामने खड़े हुए। उन्होंने कोमल स्वर में कहा — “पुंडलिक, मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं आया हूँ। उठो, मेरा दर्शन करो।” परंतु पुंडलिक उस समय माता-पिता के चरण दबा रहा था। उसने सिर उठाकर देखा, पर हाथ नहीं हटाए। विनम्र स्वर में बोला — “हे प्रभु, आप आए यह मेरा सौभाग्य है, पर अभी मेरे माता-पिता विश्राम कर रहे हैं। उनकी सेवा अधूरी छोड़कर मैं उठ नहीं सकता।” कहते हुए पुंडलिक ने पास पड़ी हुई एक ईंट भगवान की ओर सरका दी और बोला — “प्रभु, कृपया इस पर खड़े होकर प्रतीक्षा करें।”
यह दृश्य देखकर स्वयं भगवान विठ्ठल मुस्कुरा उठे। संसार में जहाँ लोग भगवान को बुलाने के लिए तप करते हैं, वहाँ पुंडलिक ने भगवान को प्रतीक्षा करवा दी, वह भी अहंकार से नहीं बल्कि सेवा-भाव से। भगवान ने उस ईंट को स्वीकार किया और उस पर खड़े हो गए। उनके हाथ कटि पर टिके और मुख पर वात्सल्य का प्रकाश फैल गया। चारों ओर देवताओं ने पुष्पवर्षा की। आकाश से स्वर गूंज उठा — “धन्य है पुंडलिक की भक्ति।”
भगवान ने कहा — “पुंडलिक, आज तुमने सिद्ध कर दिया कि माता-पिता की सेवा ही सच्ची पूजा है। जो माता-पिता को प्रसन्न करता है, वही मुझे प्रसन्न करता है।”
कुछ समय बाद जब माता-पिता जागे, पुंडलिक उनके चरणों में बैठा था और सामने स्वयं भगवान विठ्ठल खड़े थे। माता-पिता चकित रह गए। उन्होंने काँपते स्वर में भगवान को प्रणाम किया।
भगवान विठ्ठल ने उन्हें आशीर्वाद दिया और बोले — “तुम्हारा पुत्र संसार के लिए आदर्श बनेगा।” भगवान ने पुंडलिक से वर माँगने को कहा। पुंडलिक ने हाथ जोड़कर कहा — “हे प्रभु, आप यहीं इस भीमा तट पर निवास करें ताकि हर भक्त को यह शिक्षा मिले कि भक्ति पहले कर्तव्य है।” भगवान विठ्ठल ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और उसी स्थान पर पांडुरंग विठोबा के रूप में स्थिर हो गए।
तभी से पंढरपुर धाम की महिमा फैली। लाखों भक्त वहाँ जाते हैं और कहते हैं — “पुंडलिक वरदा हरि विठ्ठल।” भगवान आज भी ईंट पर खड़े हैं, यह संकेत देते हुए कि वे अपने भक्तों की सेवा-भावना के आगे स्वयं झुक जाते हैं। पुंडलिक की कथा केवल एक कहानी नहीं, बल्कि जीवन का सत्य है कि भगवान मंदिरों में नहीं, बल्कि माता-पिता की सेवा में बसते हैं। जिसने माता-पिता को सुख दिया, उसने संसार के समस्त तीर्थों का फल पा लिया।
पुंडलिक के जीवन से यह संदेश मिलता है कि भक्ति केवल मंत्रों से नहीं होती, बल्कि त्याग, करुणा और कर्तव्य से होती है। भगवान विठ्ठल आज भी अपने भक्तों को यही सिखाते हैं कि पहले मानव धर्म निभाओ, फिर देवत्व अपने आप प्राप्त होगा। भीमा नदी आज भी उस दिन की साक्षी है, मंदिरों की दीवारें आज भी पुंडलिक की कथा सुनाती हैं और विठोबा आज भी अपने भक्तों के लिए ईंट पर खड़े प्रतीक्षा करते हैं।〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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