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LPG, भू-राजनीति और भारत की सामाजिक-आर्थिक स्थिरता की चुनौती

LPG, भू-राजनीति और भारत की सामाजिक-आर्थिक स्थिरता की चुनौती
दिव्य रश्मि के उपसंपादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से।

भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे देश में रसोई का चूल्हा केवल खाना पकाने का साधन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक स्थिरता, आर्थिक संतुलन और जीवन की सामान्य गति का प्रतीक है। भले ही एलपीजी (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) तकनीकी रूप से प्रोपेन और ब्यूटेन जैसी गैसों को उच्च दबाव में तरल रूप में परिवर्तित कर तैयार की जाती हो, लेकिन इसके पीछे केवल विज्ञान नहीं बल्कि राजनीति, अर्थव्यवस्था और वैश्विक कूटनीति की लंबी कहानी छिपी होती है। जब किसी भारतीय घर में गैस का चूल्हा जलता है, तो वह केवल एक सिलेंडर से निकलती गैस नहीं होती है, बल्कि उसमें वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार मार्ग, तेल उत्पादक देशों की नीतियां, और भारत सरकार की आर्थिक रणनीति का भी योगदान होता है। यही कारण है कि जब भी दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतें बढ़ती हैं, या ऊर्जा आपूर्ति में बाधा आती है, तो उसका सीधा असर भारतीय रसोई तक पहुंचता है।आज की परिस्थितियों में दुनिया के कई हिस्सों में संघर्ष, राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक अनिश्चितता के कारण ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल दिखाई दे रही है। भारत जैसे देश के लिए यह केवल आर्थिक चुनौती नहीं बल्कि सामाजिक चुनौती भी बन सकती है, क्योंकि देश की लगभग 75 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में एलपीजी पर निर्भर है।

एलपीजी यानि लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस मुख्य रूप से दो गैसों, प्रोपेन और ब्यूटेन, का मिश्रण होती है। इन गैसों को उच्च दबाव में तरल रूप में बदलकर सिलेंडर में भरा जाता है, जिससे उनका परिवहन और उपयोग आसान हो जाता है। भारत में एलपीजी का उपयोग मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में होता है। पहला घरेलू रसोई गैस सिलेंडर, दूसरा छोटे उद्योग और व्यावसायिक प्रतिष्ठान के लिए और तीसरा ऑटोमोबाइल और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत के लिए। हालांकि इनमें सबसे बड़ा हिस्सा घरेलू उपयोग का है। पिछले एक दशक में भारत सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में भी एलपीजी की पहुंच बढ़ाने के लिए कई योजनाएं चलाईं। इससे करोड़ों परिवारों को धुएं से भरे चूल्हों से राहत मिली। लेकिन यह भी सच है कि एलपीजी का अधिकांश हिस्सा भारत को विदेशों से आयात करना पड़ता है। यही कारण है कि वैश्विक बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव सीधे भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर असर डालता है।

ऊर्जा संसाधन हमेशा से वैश्विक राजनीति के केंद्र में रहा है। इतिहास उठाकर देखें तो कई युद्ध, गठबंधन और अंतरराष्ट्रीय समझौते ऊर्जा संसाधनों के कारण ही हुए हैं। मध्य-पूर्व, रूस, अमेरिका और कुछ अन्य देशों के पास विशाल तेल और गैस भंडार हैं। इसलिए इन क्षेत्रों की राजनीतिक स्थिति का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। उदाहरण के लिए अगर किसी तेल उत्पादक देश में युद्ध शुरू हो जाए, समुद्री व्यापार मार्ग बाधित हो जाए और तेल निर्यातक देशों का संगठन उत्पादन घटा दे, तो तेल और गैस की कीमतें तुरंत बढ़ जाती हैं। भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाती है। क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इसका मतलब यह है कि वैश्विक बाजार में थोड़ी-सी भी हलचल भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

पश्चिम एशिया दुनिया का सबसे बड़ा तेल और गैस उत्पादक क्षेत्र है। सऊदी अरब, कतर, ईरान, इराक और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि इस क्षेत्र में राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो उसका असर तुरंत वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। हाल के वर्षों में कई घटनाओं ने ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव। इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष। यमन युद्ध और समुद्री मार्गों पर हमले। इन घटनाओं के कारण ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ जाती है। भारत के लिए यह चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि उसका बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात होता है।

भारत की लगभग 75 प्रतिशत आबादी मध्यम और निम्न आय वर्ग में आती है। इन परिवारों के लिए एलपीजी सिलेंडर की कीमत सीधे उनके मासिक बजट को प्रभावित करती है। यदि गैस सिलेंडर की कीमत बढ़ती है, तो उसका असर कई स्तरों पर दिखाई देता है। घरेलू खर्च बढ़ जाता है। खाद्य पदार्थों की कीमतों पर असर पड़ता है। छोटे व्यवसायों की लागत बढ़ जाती है। इसका मतलब यह है कि एलपीजी केवल एक ईंधन नहीं बल्कि सामाजिक-आर्थिक संतुलन का महत्वपूर्ण स्तंभ है।

2016 में शुरू की गई प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने भारत में ऊर्जा पहुंच को एक नई दिशा दी। इस योजना के तहत करोड़ों गरीब परिवारों को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिया गया। इस योजना के तीन बड़े प्रभाव हुए पहला, ग्रामीण महिलाओं को धुएं से राहत मिली। दूसरा, जंगलों से लकड़ी काटने की जरूरत कम हुई। तीसरा, ग्रामीण जीवन में आधुनिक ऊर्जा की पहुंच बढ़ी। लेकिन एक चुनौती अभी भी बनी हुई है। कई गरीब परिवारों के लिए सिलेंडर की कीमत अभी भी एक बड़ा खर्च है। यदि वैश्विक परिस्थितियों के कारण कीमतें और बढ़ती हैं, तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है।

आज महंगाई केवल गरीब वर्ग की समस्या नहीं रही। मध्यम वर्ग भी धीरे-धीरे इसकी चपेट में आ रहा है। रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने से मध्यम वर्ग का बजट भी प्रभावित हो रहा है। यदि ऊर्जा संकट और गहरा हुआ तो इसका असर इन क्षेत्रों पर पड़ सकता है, परिवहन लागत, खाद्य उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन, घरेलू बजट। यही कारण है कि ऊर्जा सुरक्षा किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक होती है।

2014 के बाद भारत सरकार ने कई आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना किया। इनमें सबसे बड़ी चुनौती कोविड-19 महामारी थी। महामारी के दौरान सरकार ने कई राहत योजनाएं लागू कीं और देश को आर्थिक संकट से बाहर निकालने की कोशिश की। लेकिन अब एक नई चुनौती सामने खड़ी दिखाई दे रही है, ऊर्जा और महंगाई का संकट। यदि वैश्विक परिस्थितियां खराब होती हैं, तो यह चुनौती और बड़ी हो सकती है। हालांकि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा के लिए कई कदम उठाए हैं। तेल आयात के स्रोतों में विविधता, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार। इन प्रयासों से भारत भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार होने की कोशिश कर रहा है।

भारत ने इतिहास में कई कठिन परिस्थितियों का सामना किया है। चाहे वह युद्ध हो, आर्थिक संकट हो या महामारी। भारतीय समाज ने हमेशा धैर्य और एकजुटता के साथ इन चुनौतियों का सामना किया है। कोविड-19 महामारी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उस कठिन समय में सरकार, प्रशासन और आम नागरिकों ने मिलकर स्थिति को संभाला। इसी अनुभव के आधार पर यह उम्मीद की जा सकती है कि यदि ऊर्जा संकट या महंगाई जैसी चुनौतियां सामने आती हैं, तो भारत उन्हें भी पार कर लेगा।

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